आधुनिक भारत का इतिहास-रेग्यूलेटिंग एक्ट के दोष Gk ebooks


Rajesh Kumar at  2018-08-27  at 09:30 PM
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रेग्यूलेटिंग एक्ट के दोष
रेग्यूलेटिंग एक्ट का उद्देश्य कम्पनी के संविधान तथा उसके भारतीय प्रशासन में आवश्यक सुधार करना था अर्थात् इसका उद्देश्य उस बुराइयों को दूर करना था, जो कम्पनी के शासन में आ गई थीं। लार्ड नॉर्थ ने संसद में बिल पेश करते समय स्वयं कहा था, मेरे इस बिल की प्रत्येक धारा का उद्देश्य कम्पनी के प्रशासन को सुदृढ़, सुव्यवस्थित तथा सुनिश्चित बनाना है। अतः इस एक्ट का उद्देश्य स्तुति योग्य था। लार्ड चाथम के शब्दों में, इसका उद्देश्य कम्पनी के शासन का सुधार था।

इस एक्ट में अनेक दोष थे, जिसके कारण कम्पनी का शासन सुचारू रूप से संचालित नहीं हो सका। इसके पारित होने के पश्चात हाउस ऑफ कॉमन्स के स्पीकर ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा था, यह कानून एक कठिन समस्या को हल करने का सच्चा प्रयत्न था, लेकिन सुधार लेने के तरीके में पार्लियामेन्ट ने जल्दबाजी से काम लिया और लोगों ने असंयम से। वास्तव में जल्दबाजी में यह एक्ट पारित किया गया था, जिसके कारण इसमें अनेक दोष रह गए थे। 1773 ई. के रेग्युलेटिंग एक्ट को विद्वानों ने भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से देखा है। बाउटन Rouse के शब्दों में, इस अधिनियम का उद्देश्य उत्तम था, परन्तु इसके द्वारा जिस पद्धति की स्थापना की गई थी वह त्रुटिपूर्ण थी।

थॉमसन और गैरेट के मतानुसार, यह एक्ट असामयिक था और इसकी रचना करते समय बंगाल की परिस्थितियों को ध्यान में नहीं रखा गया था। इसकी वाक्य-रचना भी दोषपूर्ण तथा अस्पष्ट थी, जिसके कारण इसके द्वारा स्थापित की गई शासकीय संस्थाओं में झगड़े होने अनिवार्य थे। पुन्निया के शब्दों में, रेग्यूलेटिंग एक्ट भारतीय मामलों के विषय में अपने ढंग का पहला अधिनियम था, इसलिए इसमें जो त्रुटियाँ रही, उसका प्रमुख कारण इसके बनाने वालों की अनुभव शून्यता थी। रॉबर्ट्स ने इसे, एक अधूरा उपाय, जिसमें कई बातें अनर्थकारी रूप से अस्पष्ट थीं, बताकर इसकी निन्दा की। डोडेविल के शब्दों में, यह विरोधाभासों और अनभिज्ञता से भरा हुआ था।

श्री जी.एन. सिंह ने इसके बारे में लिखा है, इसकी अपूर्णता का मुख्य कारण यह था कि संसद के सामने जो समस्या हल करने की थी, वह नये ही ढंग की थी। वह अंग्रेजों का सौभाग्य था कि इसकी अनेक और गम्भीर त्रुटियाँ घातक सिद्ध नहीं हुई। 1818 के भारतीय संवैधानिक सुधारों की रिपोर्ट में इस एक्ट की आलोचना इन शब्दों में की गई, इसके (1773 के अधिनियम के) द्वारा एक ऐसा महाराज्यपाल बनाया गया, जो अपनी ही परिषद् के सम्मुख अशक्त थे, एक ऐसी कार्यपालिका बनाई गई, जो सर्वोच्च न्यायालय के सम्मुख अशक्त थी और यह सर्वोच्च-न्यायालय देश की शांति और कल्याण की जिम्मेदारी से मुक्त था...यह व्यवस्था एक महान् व्यक्ति की प्रतिभा और धैर्य के कारण ही काम दे पाई। वस्तुतः इन एक्ट में अनेक दोष रह गए थे, जो कि निम्नलिखित हैं-

गवर्नर जनरल का परिषद् की दया पर निर्भर होना-
रेग्यूलेटिंग एक्ट का प्रथम दोष यह था कि गवर्नर जनरल को अपनी परिषद् में बहुमत द्वारा लिए गए निर्णयों को रद्द करने का अधिकार नहीं था अर्थात् उस निर्णय को मानने के लिए वह बाध्य था। कौंसिल के चार सदस्यों में से तीन सदस्य हेस्टिंग्स के विरोधी थे, जो उसे शासन कार्य में सहयोग़ देने पर तुले हुए थे। बारवैल के अनुसार भारत में आने से पूर्व ही फ्रांसिस, क्लेवरिंग और मॉनसर गवर्नर जनरल के शासन के बार में अच्छी राय नहीं रखते थे और फ्रांसिस स्वयं गवर्नर जनरल बनने का महत्वाकांक्षी था। अतः इन तीनों व्यक्तियों ने भारत पहुँचने के पश्चात शीघ्र ही हेस्टिंग्स के विरूद्ध एक गुट बना लिया और शासन कार्य में बाधा डालने लगे। बारवैल के अनुसार, तीनों कौंसिलों ने प्रारम्भ से ही पूर्व से निश्चित तथा पूर्व नियोजित ढंग से विरोध प्रारम्भ कर दिया।

यही कारण था कि हेस्टिंग्स जो कार्य करना चाहता था, वे नहीं हो सके और जो-जो कार्य वह नहीं करना चाहता था, उन्हें करने के लिए विवश होना पड़ा। उन तीन परिषद् सदस्यों का विरोध इतना धृष्टतापूर्ण तथा अनमनीय था कि, 1776 ई. में हेस्टिंग्स को विवश होकर त्याग-पत्र देने की बात गम्भीरतापूर्वक सोचनी पड़ी। वारेन हेस्टिंग्स के शब्दों में, मेरी स्थिति सचमुच कष्टदायी और अपमानजनक है, मेरे पास एक्ट के कानून के अन्तर्गत कोई अधिकार नहीं, मेरी जगह पर काम करने वाले मेरे जैसे चरित्र वाले व्यक्ति को कोई आदर प्राप्त नहीं और मुझे उस उत्तरदायित्व के लिए, भी जिम्मेदारी लेनी पड़ती है, जिसको में स्वयं नहीं चाहता हूँ। लॉयल ने लिखा है, गवर्नर जनरल को एकदम प्रभावहीन बना दिया था। उसकी वैदेशिक नीति को कुसंगत बना दिया था तथा वारेन हेस्टिंग्स और पार्षदों के बीच संघर्ष पैदा कर दिया था।

एक्ट के इस गम्भीर दोष के कारण गवर्नर जनरल और उसकी कौंसिल के विरोधी सदस्यों के बीच चार वर्ष तक संघर्ष चलता रहा, जो शासन कार्य के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ। पी.ई. रॉबर्टस् के शब्दों में, सर्वोच्च कार्यालय में इस दीर्घकालीन तथा प्रबल संघर्ष के कारण ब्रिटिश सत्ता तथा कम्पनी के भारतीय प्रशासन को गहरी चोट लगी।

गवर्नर जनरल का बम्बई तथा मद्रास पर अपूर्ण नियंत्रण-
इस एक्ट द्वारा बम्बई तथा मद्रास की सरकारों पर गवर्नर जनरल और उसकी कौंसिल का पूर्ण नियंत्रण स्थापित नहीं किया गया। इसका कारण यह था कि एक्ट की धारा IX के अनुसार कुछ विकट परिस्थितियों में बम्बई तथा मद्रास की सरकारों को गवर्नर जनरल और उसकी परिषद् की आज्ञा लिए बिना ही भारतीय शासकों के साथ युद्ध अथवा सन्धि करने का अधिकार दिया गया था। बम्बई तथा मद्रास की सरकार ने इस अधिकार का दुरूपयोग किया और विकट परिस्थितियों का बहाना बनाकर बंगाल के गवर्नर जनरल को बिना सूचना दिए मराठों और हैदरअली के साथ युद्ध लड़े। इन युद्धों के परिणामस्वरूप जन तथा धन की हानि हुई और कम्पनी सरकार की प्रतिष्ठा को धक्का पहुँचा। अन्य मामलों में भी बम्बई तथा मद्रास की सरकारें कार्य करने के लिए स्वतंत्र थीं। इससे कालान्तर में कम्पनी को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

गवर्नर जनरल तथा सुप्रीम कोर्ट का झगड़ा-
गवर्नर जनरल और सर्वोच्च न्यायालय में सर्वोच्च कौन था। इसकी कोई स्पष्ट व्याख्या नहीं की गई थी। इस क्षेत्रीय अस्पष्टता के कारण दोनों में अधिकार क्षेत्र के लिए प्राय: झगड़ा हो जाता था। एक ओर, गवर्नर जनरल ने मुगल सम्राट से शक्तियाँ प्राप्त की थीं, जिसको ब्रिटिश संसद ठीक तरह से निर्धारित नहीं कर सकी। दूसरी ओर, सपरिषद् गवर्नर जनरल द्वारा बनाई गई विधियों को सर्वोच्च न्यायालय को रद्द करने का अधिकार प्रदान कर दिया गया। इस कारण गवर्नर जनरल और उसकी कौंसिल का सुप्रीम कोर्ट के साथ झगड़ चलता रहा। पुन्निया ने कहा एक्ट की धाराएँ अपनी कार्यशैली में अस्पष्ट और अपरिभाषित थीं एवं नकारात्मक के स्थान पर सकारात्मक ढंग पर कार्यरत थीं, जिससे उसके बनाने वाले भी भ्रमित हो जाते थे और उनके अनेक अर्थ निकलते थे, जिसके फलस्वरूप सुप्रीम कोर्ट और सुप्रीम कौंसिल में गम्भीर झगड़े प्रारम्भ हो गए।

कम्पनी के एक जमींदार कासिजोरा के राजा के केस में सुप्रीम कोर्ट और गवर्नर जनरल में प्रत्यक्ष रूप से झगड़ा छिड़ गया। सुप्रीम कोर्ट के जज श्री हाड़ा ने कासिजोरा के राजा के विरूद्ध एक आदेश जारी किया, लेकिन गवर्नर जनरल ने राजा को यह सूचना दी कि यह न्यायालय के अधिकार क्षेत्र के अन्तर्गत नहीं आता है। अतः वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश को न मानें। सुप्रीम कोर्ट ने जब राजा को गिरफ्तार करने के लिए अपने कर्मचारी भेजे, तो गवर्नर जनरल ने न्यायालय के इन अधिकारियों को पकड़कर लाने का आदेश दिया। इस तरह से गवर्नर जनरल और सुप्रीम कोर्ट के बीच प्रत्यक्ष रूप से झगड़ा चलता रहा, जिसका कम्पनी के प्रशासन पर हानिकारक प्रभाव पड़ा।

सर्वोच्च न्यायालय का अस्पष्ट क्षेत्राधिकार-
इस एक्ट का महत्वपूर्ण दोष यह था कि इसमें सुप्रीम कोर्ट की शक्तियों और अधिकार क्षेत्र की स्पष्ट रूप से व्याख्या नहीं की गई थी। कुछ और मौलिक बातें भी अस्पष्ट तथा अनिश्चित थी। उदाहरणस्वरूप, ब्रिटिश प्रजा की कोई निश्चित परिभाषा नहीं दी गई थी, यह स्पष्ट नहीं था कि इस शब्द से अभिप्राय केवल अंग्रेजों से है अथवा कलकत्ता निवासियों से है अथवा बंगाल, बिहार और उड़ीसा में रहने वाले समस्त भारतीयों से है। सुप्रीम कोर्ट का दावा था कि उसको देश के सारे निवासियों के नाम आदेश जारी करने तथा उनके मुकदमें सुनने का अधिकार है, जबकि गवर्नर जनरल और उसकी कौंसिल सुप्रीम कोर्ट के इस अधिकार को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी। सुप्रीम कोर्ट के जजों के लिए निश्चय की यह एक भारी समस्या थी।

विधि की अस्पष्टता-
इस एक्ट में यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि कौन-से कानून (हिन्दू कानून या मुस्लिम कानून या अंग्रेजी कानून) के आधार पर न्याय किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट के जज केवल अंग्रेज कानून जानते थे। हिन्दूओं तथा मुसलमानों के कानूनों तथा रीति-रिवाजों से अनभिज्ञ थे। अतः वे अंग्रेजी विधि से नागरिकों के मामलों की सुनवाई करते थे। इससे भारतीयों को बहुत अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। इस प्रकार, उन्हें वांछित न्याय नहीं मिल पाता था। जी.एन. सिंह ने लिखा है, इससे उनमें काफी विक्षोभ तथा शेष पैदा हुआ। इसका परिणाम बहुत गम्भीर होता अगर सपरिषद् गवर्नर जनरल ने हस्तक्षेप नहीं किया होता तथा संसद ने 1781 ई. संशोधन द्वारा अधिनियम पास नहीं किया होता।

सुप्रीम कोर्ट तथा प्रादेशिक न्यायालयों में झगड़ा-
इस एक्ट द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार की स्पष्ट रूप से व्याख्या नहीं की गई थी। अतः सुप्रीम कोर्ट तथा प्रान्तीय या प्रादेशिक न्यायालयों के बीच विवाद उत्पन्न हो गए।

कम्पनी के संविधान में दोषपूर्ण परिवर्तन-
इस एक्ट द्वारा एक हजार पौण्ड के हिस्सेदारों को ही संचालन मण्डल के सदस्यों के चुनाव में मतदान करने का अधिकार था। इससे 1246 हिस्सेदार, जिनके हिस्से एक हजार पौण्ड से कम मूल्य के थे, मताधिकार से वंचित हो गए। बड़े हिस्सेदारों को एक से अधिक मत देने का अधिकार दिया गया, जिसके कारण भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन मिला। परिणामस्वरूप, कम्पनी का संचालक मण्डल एक स्थायी अल्पतन्त्र में बदल गया। राबर्ट्स ने लिखा है, यह प्रावधान संचालक मण्डल के संविधान में परिवर्तन से सम्बन्धित अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में असफल रहा। इसके अतिरिक्त जी.एन. सिंह ने लिखा है, स्वामी मण्डल में मताधिकार योग्यताएँ बदलने से तत्कालीन स्थिति में कोई अन्तर नहीं आया क्योंकि कम्पनी के सेवानिवृत्त कर्मचारियों का कम्पनी में प्रभाव घटाने का महान उद्देश्य सिद्ध नहीं हुआ।

कम्पनी पर संसद का अपर्याप्त नियंत्रण-
इस एक्ट में यह व्यवस्था की गई थी कि भारत में कम्पनी की सरकार से संचालकों को जो भी पत्र व्यवहार होगा, 15 दिन के अन्दर उनकी कॉपियों (नकलें) मन्त्रियों के पास भेजी जाएँगी। कम्पनी अपने कार्यो की रिपोर्ट ब्रिटिश सरकार को भेजती थी, किन्तु सरकार ने उन रिपोर्टों की जाँच के लिए कोई व्यवस्था नहीं की। अतः कम्पनी पर संसद का नियंत्रण अपर्याप्त और प्रभावहीन री रहा।

कमजोर कार्यपालिका-
इस एक्ट के अन्तर्गत दुर्बल कार्यपालिका की रचना की गई थी। गवर्नर जनरल अपनी कौंसिल के सामने शक्तिहीन था। कौंसिल या कार्यकारिणी स्वयं भी सुप्रीम कोर्ट के सामने शक्ति हीन थी। वस्तुतः इस एक्ट में यह व्यवस्था करके गवर्नर जनरल द्वारा बनाए गए, कानूनों या अध्यादेशों पर सर्वोच्च न्यायालय की स्वीकृति प्राप्त की जानी चाहिए, कार्यपालिका को दुर्बल कर दिया।

इस एक्ट के दोषों के बारे में पुन्निया ने लिखा है, अधिनियम के उपबन्धों की भाषा इतनी अस्पष्ट तथा अनिश्चित थी और सकारात्मक शब्दों से भरी हुई थी कि इसके निर्माताओं का लक्ष्य दुर्बल हो गया तथा उपबन्धों की एक से अधिक व्याख्या दी जा सकती थी। संक्षेप में पी.ई. रॉबर्ट्स के मतानुसार, इस अधिनियम ने न तो राज्यों कम्पनी के ऊपर सुनिश्चित नियंत्रण प्रदान किया और न कलकत्ता को अपने कर्मचारियों पर, न महाराज्यपाल (गवर्नर जनरल) को अपनी परिषद् पर और न कलकत्ता प्रेसीडेन्सी को मद्रास और बम्बी प्रेसीडेंसियों पर सुनिश्चित नियंत्रण प्रदान किया। 1918 के भारतीय संवैधानिक रिपोर्ट में यह बात स्पष्ट रूप से स्वीकार की गई थी कि, इस एक्ट ऐसे गवर्नर जनरल की सृष्टि की, जो अपनी ही कौंसिल के समक्ष शक्तिहीन था और एक ऐसी कार्यपालिका बनाई, जो सुप्रीम कोर्ट के समक्ष शक्तिहीन थी और साथ ही स्वयं शान्ति के उत्तरदायित्वों और देश के हित का उत्तरदायित्व भी इस पर नहीं आया।

रेग्यूलेटिंग एक्ट के इन दोषों को दूर करने के लिए 1781 ई. में बंगाल न्यायालय एक्ट पास किया गया। इस एक्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को काफी सीमित कर दिया गया और गवर्नर जनरल तथा उसकी कौंसिल की शक्तियों में वृद्धि की गई। इसके बाद 1784 ई. में पिट्स इण्डिया एक्ट पास किया गया, जिसके अनुसार गवर्नर जनरल को अपनी कौंसिल के निर्णयों के विरूद्ध भी विशेष आवश्यकता पड़ने पर काम करने की आज्ञा दे दी गई। इसके पश्चात 1786 ई. में एमेण्डिंग एक्ट पास किया गया, जिसके द्वारा गवर्नर जनरल को महत्वपूर्ण मामलों में कौंसिल के निर्णयों को रद्द करने का अधिकार दिया गया।

रेग्यूलेटिंग एक्ट की अपूर्णताओं के कारण इस अधिनियम की अपूर्णताओं के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-

(1) ब्रिटिश पार्लियामेन्ट को एक ऐसी समस्या सुलझानी पड़ी, जो एकदम बिल्कुल नई थी। 1765 ई. तक कम्पनी मुगल सम्राट की दीवान बन चुकी थी। इस नाते पार्लियामेंट उसके भारतीय प्रदेशों पर अपनी प्रभुसत्ता घोषित करने से हिचकिचाती थी। यही कारण था कि पार्लियामेंट कम्पनी के मामलों में आवश्यकता से अधिक हस्तक्षेप नहीं करना चाहती थी। ऐसी परिस्थितियों में एक्ट की धाराओं का अस्पष्ट तथा दोषपूर्ण होना कोई बड़ी बात नहीं थी।

(2) ब्रिटिश पार्लियामेंट के सदस्यों को भारतीय मामलों के सम्बन्ध में विशेष ज्ञान नहीं था। ब्रिटिश सरकार को भी उस समय भारत की स्थिति और उसी समस्या के हल का ठीक तरह पता न था। उसके पास कुछ ऐसे विश्वसनीय व्यक्ति भी न थे, जो उसे इस विषय पर आवश्यक परामर्श दे सकते। कम्पनी के कर्मचारी सरकार को ठीक सलाह दे सकते थे, परन्तु वे रिश्वतखोरी के कारण इतने बदनाम थे कि ब्रिटिश राजनीतिज्ञ उनसे घृणा करते थे और उनसे परामर्श लेने के पक्ष में नहीं थे। अतः दक्ष-मंत्रणा के अभाव में इस अधिनियम बनाने वालों के लिए गलती करना स्वाभाविक था।

(3) इल्बर्ट ने लिखा है, एक्ट में दोषों का होना स्वाभाविक था। कुछ तो इसलिए की समस्या इस प्रकार की थी और कुछ इसलिए की पार्लियामेंट के सम्मुख एक कठिन संवैधानिक प्रश्न था। जी.एन.सिंह ने लिखा है, इस एक्ट के दोष चाहे जितने गम्भीर हो, परन्तु वे घातक सिद्ध नहीं हुए।

(4) लार्ड नॉर्थ जिसने यह बिल पेश किया, दृढ़ विचारों का व्यक्ति नहीं था। उसे निर्णायक कार्य करने की आदत बहुत कम थी। वह शासकीय क्षेत्र में अधिक परिवर्तन करने के पक्ष में नहीं था। इसलिए भी रेग्यूलेटिंग एक एक स्पष्ट तथा सुनिश्चित पग प्रमाणित न हुआ। ।



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