आधुनिक भारत का इतिहास-पिट्स इण्डिया एक्ट का महत्व Gk ebooks


Rajesh Kumar at  2018-08-27  at 09:30 PM
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पिट्स इण्डिया एक्ट का महत्व
पिट्स इण्डिया एक्ट भारत के संवैधानिक इतिहास में बहुत महत्व है। इसने कम्पनी के मौलिक हितों पर आघात किए बिना उसे दृढ़ता प्रदान की और एक ऐसी शासन पद्धति का सूत्रपात किया, जो 1858 ई. तक प्रचलित रही। बर्क ने इस एक्ट के बार में लिखा था, अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए इससे अधिक अच्छा तथा दक्ष उपाय सम्भवत: मनुष्य द्वारा नहीं बनाया जा सकता है।

(1) कम्पनी के प्रशासन पर संसदीय नियंत्रण की स्थापना-
इस एक्ट के द्वारा पहली बार कम्पनी के भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजी राज्य का प्रदेश कहा गया और उन पर ब्रिटिश सरकार का वास्तविक नियंत्रण स्थापित करने के लिए बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल की स्थापना की गई। इस बोर्ड का काम भारत में सैनिक तथा असैनिक प्रशासन का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण करना था। इस बोर्ड में मंत्रिमण्डल के सदस्य भी थे। संचालक मण्डल के बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल के आदेशों का पालन करना अनिवार्य कर दिया गया। कम्पनी की कार्यकुशलता को बढ़ाने के लिए गुप्त समिति का गठन किया गया इस एक्ट के द्वारा बम्बई तथा मद्रास की सरकारों पर बंगाल सरकार का वास्तविक नियंत्रण स्थापित कर दिया गया। इससे कम्पनी की नीतियों का इन सरकारों की नीतियों से मेल आसानी से होने लगा।

इस एक्ट के द्वारा कम्पनी के समस्त सैनिक और असैनिक मामलों पर ब्रिटिश संसद का अन्तिम नियंत्रण स्थापित हो गया। इल्बर्ट ने लिखा है, कम्पनी को ब्रिटिश सरकार की प्रतिनिधि संस्था के प्रत्येक, तथा स्थायी नियंत्रण में रखने के सिद्धान्त को अपनाया। एस.आर. शर्मा के शब्दों में, पिट्स इण्डिया एक्ट ने इंग्लैण्ड में भारतीय मामलों के निर्देशक के मौलिक सिद्धान्त को ही बदल दिया। स्वामी मण्डल शक्तिहीन हो गया तथा संचालक मण्डल ब्रिटिश सरकार के पूर्णत: अधीन हो गया। लायल ने लिखा है कि, पिट्स के इण्डिया एक्ट का तात्कालिक प्रभाव बहुत अधिक था और इसके स्पष्ट रूप से भारत सरकार के ढाँचे में सुधार हो गया। इस एक्ट ने उन सब गलत नियंत्रणों और बाधाओं को दूर कर दिया, जिनके कारण वारेन हेस्टिंग्स का अपनी कौंसिल तथा अधीनस्थ बम्बई और मद्रास की सरकारों में झगड़ा हुआ। इस एक्ट के द्वारा उन दोषों को दूर कर दिया गया था, जो उसने भारत सरकार के ढाँचे में बताये थे और उन उपायों को अपनाया गया, जो उसने बताये थे।

इस प्रकार, इस एक्ट के द्वारा कम्पनी पर ब्रिटिश संसद का वास्तविक नियंत्रण स्थापित हो गया, जिसके कारण रेग्यूलेटिंग एक्ट का एक बहुत बड़ा दोष भी दूर हो गया। इल्बर्ट ने लिखा है कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री पिट ने कम्पनी के संविधान में परिवर्तन किए बिना ही, कम्पनी पर ब्रिटिश सरकार का वास्तविक नियंत्रण स्थापित कर दिया।

(2) स्वामी मण्डल की शक्तियों पर आघात-
इस एक्ट द्वारा स्वामी मण्डल को शक्तिहीन बना दिया गया। वह भारत के सैनिक तथा असैनिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता था। वह संचालकों के किसी ऐसे निर्णय का, जिसे बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल ने स्वीकृति दे दी हो, नहीं बदल सकता था।

(3) कम्पनी के भारतीय प्रदेशों का एकीकरण का प्रयास-
इस एक्ट ने कुशल प्रशासन तथा कम्पनी के भारतीय प्रदेशों के एकीकरण के लिए सपरिषद् गवर्नर जनरल के हाथों में समस्त शक्तियों को केन्द्रित कर दिया। प्रादेशिक सरकारों के लिए गवर्नर जनरल के आदेशों का पालन करना अनिवार्य कर दिया गया। इस एक्ट की धारा 31 में स्पष्ट कहा गया था कि यदि प्रादेशिक सरकारें आज्ञाओं का उल्लंघन करेंगी, तो गवर्नर जनरल उन्हें निलम्बित कर सकेगा। इस प्रकार, इस नई नीति से कम्पनी के भारतीय प्रशासन में बहुमूल्य सुधार हुआ और एकीकरण की नीति को प्रोत्साहन मिला।

(4) भारतीय शासन में सुधार-
लायल ने लिखा है कि पिट्स इण्डिया एक्ट ने भारत सरकार की कार्यप्रणाली में आवश्यक तथा महत्वपूर्ण सुधार किए। कौंसिल के सदस्यों की संख्या 4 से घटाकर 3 कर देने से गवर्नर जनरल और गवर्नरों की स्थिति दृढ़ हो गई। अब वे कार्यपालिका के वास्तविक प्रधान बन गए। उनके लिए अपनी कौंसिल पर नियंत्रण बनाए रखना आसान हो गाय। परिणामस्वरूप शासन प्रबन्ध की कार्यकुशलता में वृद्धि हुई।

(5) गवर्नर जनरल की स्थिति का सुदृढ़ होना-
गवर्नर जनरल के पद का महत्व पहले से अधिक बढ़ गया, क्योंकि उसका इंग्लैण्ड के मंत्रिमण्डल के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित कर दिया। इससे ने केवल उसकी स्थिति ही सुदृढ़ हुई, अपितु उसकी प्रतिष्ठा में भी वृद्धि हुई।

(6) अहस्तक्षेप की नीति का उद्घाटन-
इस एक्ट द्वारा भारतीय राजाओं के प्रति एक नई नीति अपनाई गई। धारा 34 के अनुसार यह घोषणा की गई थी कि भारत में साम्राज्य विस्तार की नीति ब्रिटिश राष्ट्र के नीति, सम्मान और इच्छा के विरूद्ध है। अतः गवर्नर जनरल और उसकी परिषद् संचालकों या गुप्त समिति की आज्ञा के बिना भारतीय राजाओं से युद्ध नहीं कर सकते थे। प्रादेशिक सरकारों पर भी इसी प्रकार का प्रतिबन्ध लगाया गया। भारत सरकार ने इस नीति का दृढ़ता से पालन किया। अहस्तक्षेप की नीति से भारतीय राजनीति में एक नये युग का आरम्भ हुआ और 1765 ई. जब अंग्रेजों के मित्र हैदराबाद के निजाम को मराठों ने खरदा के युद्ध में पराजित किया, तो अंग्रेजों ने उसकी सहायता नहीं की। परिणामस्वरूप उन्हें काफी हानि भी उठानी पड़ी।

(7) सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना-
भारत में अंग्रेजों द्वारा किए गए अपराधों की सुनवाई करने के लिए इंग्लैण्ड में एक विशेष न्यायालय की स्थापना की गई। यह निश्चित रूप से एक अच्छा सुधार था।

(8) उपहारों को लेने की मनाही-
भारतीयों के दृष्टिकोण से यह एक्ट इसलिए भी महत्वपूर्ण था कि इसके द्वारा कम्पनी के पदाधिकारियों के लिए उपहार आदि लेना अपराध घोषित कर दिया गया और इस नियम की अवहेलना करने वालों के लिए कठोर दण्ड निश्चित किए गए।

(9) इंग्लैण्ड में कम्पनी का दोहरा शासन-
इस एक्ट के अनुसार कम्पनी के शासन पर दोहरा नियंत्रण स्थापित कर दिया गया। कम्पनी के राजनीतिक व शासन सम्बन्धी कार्यों पर नियंत्रण बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल का था तथा व्यापारिक कार्यों पर संचालकों का था। यद्यपि यह व्यवस्था त्रुटिपूर्ण थी, तथापि 1858 ई. तक कम्पनी के भारतीय प्रशासन की आधारशिला बनी रही। एस.आर. शर्मा के शब्दों में, इस शासन पद्धति को 70 वर्ष से अधिक समय तक प्रचलित रहने का श्रेय अंग्रेज जाति की चारित्रिक उदारता को दिया जा सकता है, जिसने पद्धति के दोनों पक्षों को मिलकर काम करने में अधिक सहायता दी।

(10) 1858 ई. तक भारतीय संविधान का आधार-
यह एक्ट 1858 ई. तक भारतीय संविधान का आधार बना रहा। इल्बर्ट ने लिखा है कि, एक्ट के द्वारा जो नियंत्रणों की पद्धति कायम हुई, चाहे उसको कुछ बाद में सुधार भी किया गया है, परन्तु वह किसी न किसी रूप में 1858 ई. तक चलती रही।

पिट्स के जीवन चरित के लेखक श्री जे. हॉलैण्ड ने इस एक्ट का महत्व इन शब्दों में व्यक्त किया है, भारत में निरंकुश अधिकार रखते हुए भी नया वायसराय ब्रिटिश संवैधानिक मशीन का केवल एक अनुबन्ध मात्र था। शायद यह पिट की सबसे बड़ी उपलब्धि थी कि उसने इस बात को समझ लिया कि शासन के प्राच्य और पाश्चात्य आदेशों को किस प्रकार इस ढंग से मिलाया जाए कि जिससे बंगाल में तो कार्यवाही जोर-शोर से चल सके और स्वदेश में लोकप्रिय शासन की प्रगति पर आँच न आए। उसने भारत के वास्तविक शासक को उससे भी कहीं अधिक शक्तियाँ सौंपी, जितनी कि वारेन हेस्टिंग्स को प्राप्त थी, पर साथ ही उसने उन्हें राजा और पार्लियामेंट की इच्छा के अधीन कर दिया.।

पिट्स इण्डिया एक्ट के अनुसार इंग्लैण्ड में द्वैध शासन की स्थापना-
पिट्स इण्डिया एक्ट द्वारा कम्पनी के कार्यों को दो भागों में विभक्त किया गया-प्रशासनिक तथा व्यापारिक। राजनीतिक व शासन सम्बन्धी कार्यों पर नियंत्रण रखने के लिए ब्रिटिश सरकार ने 6 सदस्यों का एक बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल स्थापित किया, जबकि कम्पनी के व्यापारिक कार्यों का संचालकों के अधिकार में ही रहने दिया गया। कम्पनी के राजनीतिक और सैनिक कार्यों का संचालन डायरेक्टर करते थे, परन्तु उन्हें बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल के निर्देशों का पालन करना पड़ता था। इस प्रकार, लन्दन में भारतीय मामलों की देखभाल के लिए 1784 ई. में दोहरी शासन व्यवस्था की स्थापना की गई। इसी को कीथ ने आपस का निबटारा कहा है। यद्यपि द्वैध शासन व्यवस्था त्रुटिपूर्ण थी, तथापि 1858 ई. तक कम्पनी के प्रशासन का आधार बनी रही।
प्रो. स्पीयर के शब्दों में, यह शासन पद्धति क्लाइव द्वारा स्थापित द्वैध शासन प्रणाली में भिन्न थी, क्योंकि इसमें दोनों शासकीय संस्थाओं की जिम्मेदारी निश्चित तथा स्पष्ट थी।

बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल का अधिक शक्तिशाली होना
इस शासन व्यवस्था में संचालक मण्डल की अपेक्षा बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल के पास प्रशासन सम्बन्धी शक्तियाँ बहुत व्यापक थीं। बोर्ड के पास यह शक्ति थी कि संचालकों के द्वारा नियुक्त किए हुए कम्पनी के किसी भी कर्मचारी को वापस बुला सके। इसका परिणाम यह हुआ कि संचालक सिर्फ ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करते थे, जिसे बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल चाहता था। बोर्ड ने कई बार इस शक्ति का प्रयोग भी किया। इस सम्बन्ध में दो घटनाओं का विवरण देना उपयोगी होगा। 1784 ई. संचालक मण्डल ने हालैण्ड को फोर्ट-सेण्ट जार्ज की सरकार का अध्यक्ष नियुक्त किया, परन्तु बोर्ड के अध्यक्ष डुण्डास ने इस नियुक्ति का विरोध किया। संचालक अपनी की हुई नियुक्ति पर अड़ गए और उन्होंने बोर्ड के अनुचित हस्तक्षेप का विरोध किया। बोर्ड के अध्यक्ष श्री डुण्डास ने संचालकों की इस बात को स्वीकार किया कि कानूनी दृष्टिकोण से उसे इन मामलों में हस्तक्षेप का अधिकार नहीं परन्तु उसने हालैण्ड को यह बात स्पष्ट कर दी कि वह ज्यों ही भारत पहुँचेगा, त्यों ही उसे वापस बुला लिया जाएगा। परिणामस्वरूप संचालकों को हालैण्ड के स्थान पर डुण्डास के एक मित्र को नियुक्त करना पड़ा। 1806 में भी ऐसी ही स्थिति उत्पन्न हो गई थी और अन्त में बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल के अध्यक्ष ने संचालकों द्वारा नियुक्त किए गए जार्ज बारलो को वापस इंग्लैण्ड बुला लिया। संक्षेप में, संचालक मण्डल किसी भी ऐसे व्यक्ति को नियुक्त नहीं कर सकते थे, जिसे बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल न चाहता हो। इस प्रकार व्यावहारिक रूप में बोर्ड का अधिकारियों की नियुक्ति में भी काफी हाथ था।

संचालक मण्डल के लिए बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल के आदेशों का पालन करना अनिवार्य था। इसके अतिरिक्त संचालकों द्वारा जो आदेश कम्पनी के अधिकारियों को दिए जाते थे, उनको तब्दील करने और अपनी इच्छानुसार आदेश जारी करने का अधिकार बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल को था। बोर्ड को कम्पनी के सैनिक तथा असैनिक प्रशासन को निर्देशन तथा नियंत्रण का अधिकार दिया गया था। इसलिए वह संचालक मण्डल द्वारा दिए जाने वाले आदेशों की जाँच-पड़ताल कर सकता था। एक्ट में यह भी व्यवस्था की गई कि संचालक जो भी संदेश और आदेश भारत भेजे, उनकी स्वीकृति बोर्ड ऑफ कंट्रोल से 15 दिन के अन्दर प्राप्त करना आवश्यक था। इस तरह से संचालकों को भारत से होने वाले पत्र-व्यवहार बोर्ड ऑफ कंट्रोल का नियंत्रण स्थापित हो गया। संचालकों का चेयरमैन अपनी सुविधा के लिए आदेशों को तैयार करने से पूर्व उन पर बोर्ड ऑफ कंट्रोल के अध्यक्ष की राय जान लेना था। यद्यपि आदेशों और निर्देशों को तैयार करने की शक्ति संचालकों के हाथ में थी, तथापि बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल का अध्यक्ष उनमें अपनी इच्छानुसार किसी प्रकार का संशोधन कर सकता था।

बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल संचालकों की इच्छा के विरूद्ध भी किसी प्रकार की तब्दीली भारत में भेजे जाने वाले आदेशों में कर सकता था। इसीलिए के.वी. पुन्निया ने लिखा है, नियंत्रण मण्डल के पास संशोधन करने की शक्ति इतनी व्यापक थी कि कई बार उसके द्वारा संशोधित पत्र वे अर्थ देने लगते थे, जो संचालकों द्वारा मौलिक रूप में प्रस्तुत किए गए पत्रों के अर्थों से सर्वथा भिन्न होते थे।

अत्यावश्यक मामलों में बोर्ड की शक्तियाँ और भी अधिक थीं। वह संचालकों को विशेष प्रकार का प्रलेख तैयार करने के लिए आदेश दे सकता था। उनके इनकार करने पर वह स्वयं प्रलेख तैयार कर सकता था और उसको भारत भेजने के लिए संचालकों को आदेश दे सकता था। अपने आदेशों का संचालकों से पालन कराने के लिए बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल ब्रिटिश न्यायालय से भी लेख जारी करवा सकता था। बोर्ड की इस शक्ति से परिचित होने के कारण संचालक मण्डल के सदस्य साधारणतया उसकी इच्छा के विरूद्ध चलने का साहस नहीं करते थे।

इस प्रकार संचालक मण्डल के लिए बोर्ड ऑफ कंट्रोल के आदेशों का पालन करना अनिवार्य हो गया था। बोर्ड को कम्पनी के सैनिक तथा असैनिक शासन प्रबन्ध के अधीक्षण, निर्देशन तथा नियंत्रण का अधिकार भी दिया गया था। संचालन मण्डल सिर्फ उसी व्यक्ति को गवर्नर जनरल के पद पर नियुक्त करता था, जिसे बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल चाहता था। अतः वह स्वाभाविक था कि भारत के गवर्नर जनरल संचालकों के आदेशों की अपेक्षा बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल के आदेशों को अधिक महत्व देते थे और कई बार संचालक मण्डल के आदेशों की अवहेलना करते हुए भी बोर्ड के आदेशों का पालन करते थे। धीरे-धीरे बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल ने पहले की अपेक्षा अधिक शक्ति प्राप्त कर ली। उसका भारतीय प्रशासन पर इतना प्रभाव बढ़ गया कि उसकी गुप्त समिति की सहायता से एक के बाद एक गवर्नर जनरल भारत में संचालकों की इच्छा के प्रतिकूल भी भारतीय रियायतों के प्रति आक्रामक नीति अपनाते रहे।

उपयुक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि ज्यों-ज्यों समय बीतता गया, त्यों-त्यों कम्पनी के शासन पर बोर्ड का प्रभाव बढ़ता गया और संचालक मण्डल का प्रभाव कम होता गया। संचालक मण्डल के अध्यक्ष हैनरी जॉर्ज टक्कर ने 1838 में ड्यूक ऑफ वेलिंगटन के नाम लिखे हुए एक पत्र में संचालकों की दुर्दशा के सम्बन्ध में यह शब्द लिखे, अब भी मैं बड़े कष्ट के साथ यह अनुभव करता हूँ कि हम डूबते जा रहे हैं। हमारा वजन और प्रभाव पिछले दिनों कम हुआ है और कम होता जा रहा है। जैसे-जैसे समय बीतता गया, वैसे-वैसे संचालकों के अधिकार कम होते गए। पुन्निया के शब्दों में, इस अनुभूति के कारण कि वे कष्ट में हैं, निदेशक समिति अपने वैध अधिकारों का भी पूरा प्रयोग करने की इच्छुक नहीं रही होगी, जबकि नियंत्रण बोर्ड का अध्यक्ष अपनी शक्तियों का प्रयोग पहले की अपेक्षा भी अधिक उत्साह के साथ करता होगा।

संचालक मण्डल का प्रभावशील न होना-
बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल के इतना शक्तिशाली होने से हम यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकते कि कम्पनी के शासन पर संचालक मण्डल का प्रभाव बहुत क्षीण हो गया था। संचालक मण्डल अब भी गवर्नर जनरल तथा बोर्ड के बीच पत्र-व्यवहार का एक महत्वपूर्ण साधन था। भारत भेजे जाने वाले सब पत्र और आदेश या तो उसकी या उसकी गुप्त समिति के द्वारा भेजे जाते थे। बोर्ड भारतीय मामलों के सम्बन्ध में संचालकों के परामर्श को बड़ा महत्व देता था, क्योंकि वे कम्पनी के शासन कार्य में बहुत अनुभवी होते थे। इसके अतिरिक्त शासक का बहुत सारा कामकाज व्यावहारिक रूप से उनके द्वारा होता था। इसलिए भी उनका शासन पर प्रभाव होना स्वाभाविक था। श्री ए.बी. कीथ लिखते हैं कि, यद्यपि द्वैध शासन व्यवस्था में संचालक मण्डल सैद्धान्तिक रूप से भारतीय प्रशासन से पृथक् था, तथापि उसका इसके संचालक पर काफी प्रभाव था। बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल के अध्यक्ष हैनरी जार्ज टक्कर के शब्दों में, यह सत्य है कि आपने भारतीय प्रशासन का नियंत्रण राष्ट्रीय सरकार को सौंप दिया है लेकिन इस पर भी हमारी ऐसी स्थिति है कि हम इस पर अपना प्रभाव डाल सकते हैं।

संचालकों के पास कर्मचारियों को नियुक्त करने का महत्वपूर्ण अधिकार भी था। भारत में गवर्नर जनरल से लेकर छोटे से छोटे कर्मचारी उनके द्वारा नियुक्त किए जाते थे। इससे उनका प्रभाव, प्रतिष्ठा और गौरव और भी बढ़ जाता था। निःसंदेह बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल संचालकों द्वारा नियुक्त किए गए लोगों को भारतवर्ष से वापस बुला सकता था, लेकिन इससे संचालक मण्डल का महत्व कम नहीं होता था। प्रथम तो इसलिए कि पदाधिकारीयों को भारत से बार-बार बुलाना सम्भव नहीं था। दूसरे, ऐसा करना प्रशासनिक दृष्टिकोण से भी अनुचित था। अतः बोर्ड ऑफ कंट्रोल व्यवहार में उस शक्ति का प्रयोग कुछ विशेष मामलों में ही करता था। इस प्रकार, संचालक मण्डल कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए पूर्णत: स्वतंत्र था। दैनिक मामलों में कम्पनी के भारतीय कर्मचारियों को हटाने की शक्ति संचालकों के पास ही थी। प्रो. स्पीयर लिखते हैं कि संचालकों की दृष्टि में कर्मचारियों की नियुक्ति का अधिकार इतना महत्वपूर्ण था कि उन्होंने अपनी राजनीतिक शक्तियों का बलिदान करके भी इसे अपने पास बनाए रखना उचित समझा। इसके अतिरिक्त संचालकों को अपनी इच्छा के विरूद्ध बोर्ड ऑफ कंट्रोल द्वारा नियुक्ति किए गए व्यक्तियों को भारत से वापस बुला लेने का भी अधिकार था। इस सम्बन्ध में दो घटनाओं का उल्लेख करना उपयोगी होगा। सन् 1825 ई. में संचालकों ने लार्ड एम्हर्स्ट को बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल की इच्छा के विरूद्ध भारत से वापस बुलाने की धमकी दी और 1844 ई. में एलबरो को वापस बुला लिया।

कम्पनी के संचालकों के अधीन हजारों अनुभवी अधिकारी काम करते थे और कम्पनी के कार्यालय, ईस्ट इण्डिया हाऊस के सभी रिकार्ड उनके अधिकार में थे। अतः भारत के शासन सम्बन्धी नई योजनाएँ बोर्ड की अपेक्षा वे अधिक सुगमता तथा योग्यता से तैयार कर सकते थे। इसके अतिरिक्त बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल की दिलचस्पी साधारणतया भारतीय अधिकारियों की विदेशी नीति निर्धारित करने तथा राजनीतिक मामलों को सुलझाने में होती थी, जिसके कारण संचालकों को कम्पनी के आन्तरिक शासन कार्य में महत्वपूर्ण भाग लेने का अवसर मिल जाता था। संचालकों को यह भी अधिकार था कि वे दूषित प्रशासन के उदाहरणों को जनता के सम्मुख खोलकर रख सके। संचालक मण्डल के अध्यक्ष श्री टक्कर के शब्दों में, जब तक इस समिति में स्वतंत्र और प्रतिष्ठित व्यक्ति रहेंगे, तब तक वे न केवल अपने ज्ञान और अनुभव द्वारा सरकार की मशीन को उचित निर्देश देने में सहायता दे सकते हैं, अपितु वे किसी बेईमान सरकार की मनमानी की रोकथाम करने में भी बड़ा स्वस्थ प्रभाव डाल सकते हैं।

उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट हो जाता है कि संचालक मण्डल का कम्पनी के मामलों पर अब भी काफी प्रभाव था। इसके अतिरिक्त व्यापारिक मामलों में संचालकों के हाथ में पूर्ण शक्ति थी। इसलिए यह कह सकते हैं कि बोर्ड ऑफ कंट्रोल की सर्वोच्चता के होते हुए भी संचालकों के हाथ में काफी शक्तियाँ रह गई थीं। सन् 1918 की संवैधानिक रिपोर्ट का उल्लेख करने वालों ने इस द्वैध शासन व्यवस्था का मूल्यांकन इन शब्दों में किया था- हमें वह परिणाम नहीं निकालना चाहिए कि नियंत्रण मण्डल के अध्यक्ष के सर्वाधिक महत्व ने संचालकों के हाथों में कोई वास्तविक नियंत्रण नहीं दिया था। वे अब भी शक्ति सम्पन्न थे। उनके पास अब भी कार्य को आरम्भ करने का अधिकार था। वे ब्रिटिश सरकार के पास भारतीय मामलों के सम्बन्ध में जानने के लिए ज्ञान का भण्डार थे। शासन की जिम्मेदारी बेशक मण्डल के कन्धों पर थी, लेकिन उसकी कार्य-विधि पर संचालकों का प्रभाव अवश्य था।

इस सब बातों के होते हुए भी यह स्वीकार करना पड़ेगा कि बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल ने संचालक मण्डल को शनै: शनै: उसकी शक्तियों से वंचित कर दिया। पुन्निया के शब्दों में, ज्यों-ज्यों इस शताब्दी के वर्ष बीतते गए, त्यों-त्यों उनसे एक के बाद एक शक्ति छिनती गई।



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