1857 की क्रान्ति-जोधा माणेक बापू माणेक भोजा माणेक रेवा माणेक रणमल माणेक दीपा माणेक Gk ebooks


Rajesh Kumar at  2018-08-27  at 09:30 PM
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जोधा माणेक बापू माणेक भोजा माणेक रेवा माणेक रणमल माणेक दीपा माणेक

12. जोधा माणेक
13. बापू माणेक
14. भोजा माणेक
15. रेवा माणेक
16. रणमल माणेक
17. दीपा माणेक

सौराष्ट्र में ओखा मंडल के रुप में एक अच्छा खासा राज्य था। उसके बेट स्थान पर ब्रितानियोें के साथ 1803 के झगड़े में वहाँ के राजा नाराणजी मारे गए। 1804 में यहाँ के वाघेरों ने ओखा के एक जहाज को लूट लिया था। ब्रितानियोें को बहुत क्रोध आया और उन्होनें एक युद्ध जहाज को लड़ाई के लिए भेजा, पर कोई नतीजा नहीं निकला। ब्रितानी इन वाघेरों से लड़ाई करते रहे और अंत में इन प्रदेश को राजा गायकवाड़ को सौंप दिया।

वाघेरों में पुराना असंतोष तो था ही उत्तर भारत में ब्रितानियोें को भगाने की बात यहाँ भी पहुंची और वाघेरों के राजा जोधा माणेक ने ब्रितानियोें के विरुद्ध लड़ाई छेड़ दी। ओखा मंडल के अनेक स्थानों पर लड़ाई शुरु हो गई। ब्रितानी फ़ौज उन्हें दबाने और मारने के लिए वाघेर लोग आस-पास के पहाड़ों और जंगलों में छिप गए। फ़िर 1848 में अलग- अलग गाँवों के वाघेर इकठ्ठा हुए। इन में जोधा माणेक, बापू माणेक, भोजा माणेक, रेवा माणेक, रणमल माणेक, दीपा माणेक आदि वीर उपस्थित थे। सबने निर्णय लिया कि लड़कर अपना प्रदेश जीत लेंगे। ब्रितानियोें की सेना ने अनेक बार आक्रमण किए पर वाघेरों पर विजय नहीं पा सकें। राजा गायकवाड़ ने उनसे सुलेह-संधि करनी चाही पर सुलेह नहीं हो सकी। मुलू माणेक ने द्वारका पर चढ़ाई की और जीत हासिल की। बेट द्वारका भी अगले सात दिनों में जीत लिया। इस तरह सारे ओखा मंडल पर वाघेरों का आधिपत्य स्थापित हो गया। ब्रितानी सेना और गायकवाड़ हार गए थे।



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