पूर्व बाल्यावस्था की विशेषता

Poorv Balyavastha Ki Visheshta

Gk Exams at  2018-03-25


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GkExams on 13-01-2019

परिचय

सामाजिक विकास का आरंभ यद्यपि शैवशवास्था से होता है, परन्तु सामाजिक व्यवहारों के संरुपों की अभिव्यक्ति एवं व्यवहारों के प्रकार में वृद्धि क्रमशः आयु वृद्धि के साथ दृष्टिगत होती है| बालक के समाजीकरण का आरम्भ परिवार से होता है| परिवार में माता-पिता, भाई-बहन तथा अन्य सदस्यों के साथ बच्चा अन्तः क्रिया करता है, इससे उसके सामाजिक विकास की प्रक्रिया आरम्भ होती है| बच्चे का सामाजिक विकास उसकी परिवार में स्थिति, पालन पोषण की शैली तथा सामाजिक समायोजन से निर्धारित होती है|


पूर्व बाल्यावस्था बालक की ‘टोली पूर्व अवस्था’ कहलाती है| बच्चे स्वतंत्र खेल प्रदर्शित करते है| ये वयस्कों के साथ अधिक संतुष्ट रहते हैं तथा उनके साथ सामाजिक सम्पर्क रखने के प्रति अधिक रूचि दर्शाते हैं| पूर्व बाल्यावस्था के आरम्भ में, बच्चे समानांतर खेल का संरूप प्रदर्शित करते हैं अर्थात् दो बच्चे साथ रहकर भी स्वतंत्र रूप से (स्वान्तःसुखाय) खेल खेलते हैं| ‘स्वतंत्र खेल’ के पश्चात्’ सहचारी खेल’ का संरूप दिखता है तथा बालक में आधारभूत सामाजिक अभिवृत्ति याँ विकसित होती हैं| इस अवस्था के प्रमुख सामाजिक व्यवहार है- अनुकरण,प्रतिस्पर्धा, नकारवृत्ति, आक्रामकता, कलह, सहयोग, प्रभावित, स्वार्थपरता, सहानुभूति तथा सामाजिक अनुमोदन इत्यादि| बालक में प्रसामाजिक तथा समाज विरोधी दोनों प्रकार के व्यवहार परिलक्षित होते हैं| धनात्मक सामाजिक अभिवृतियाँ समाजोपयोगी व्यवहारों जैसे- अनुकरण,प्रतिस्पर्धा, सहयोग, प्रभाविता तथा सामाजिक अनुमोदन आदि के विकास में सहयोगी होती हैं जबकि ऋणात्मक सामाजिक अभिवृत्तियाँ समाज विरोधी व्यवहारों जैसे- नकारवृत्ति, आक्रामकता, कलह, स्वार्थपरता आदि को बालकों में उत्पन्न करती है| बालक में सामाजिक व्यवहारों के विकास में परिवार की भूमिका के अतिरिक्त उनकी मित्र मण्डली तथा उनके साथ अन्तःक्रिया का महत्वपूर्ण योगदान होता है| खेल तथा नाटकीय (जीववाद) के माध्यम से बालक सामाजिक व्यवहार सीखता है| खेल में उपयोग होने वाले निर्जीव खिलौने को सजीव मानकर व्यवहार प्रदर्शित करते हैं तथा नाटकीकरण के दौरान वास्तविक जीवन की घटनाओं की नकल कर सामाजिक व्यवहार प्रदर्शित करते हैं|

सामाजिक व्यवहार

पूर्व बाल्यावस्था में बालकों में विभिन्न सामाजिक व्यवहार जैस नेतृत्व शैली, पठन-पाठन, मनोरंजन (सिनेमा, रेडियो तथा टेलीविजन) इत्यादि प्रविधियों के माध्यम से प्रदर्शित होते हैं| सामाजिक व्यवहारों के विकास का क्रम उत्तर बाल्यावस्था में भी जारी रहता है| इस अवस्था में बालक प्रायः समूहों का निर्माण करते हैं तथा समूह में अपनी अन्तः क्रिया करते हैं जिससे उनकी विकास गति अबाध रूप से चलती रहती है| इस अवस्था को ‘टोली अवस्था’ भी कहते हैं| इस अवस्था में बालक सभी सामाजिक व असामाजिक व्यवहार जैसे- खेल, आपसी सहयोग प्रदर्शित करना, लोगों को तंग करना, तम्बाकू खाना, भद्दे या गंदे वार्तालाप करना इत्यादि|


समूह से ही सीखते हैं| बच्चे टोली के अन्य बच्चों के सुझावों तथा व्यवहारों के प्रति अत्यधिक ग्रहणशील होते हैं तथा टोली के व्यवहार के अनुसार अपने अहं का विकास करते हैं| ये बालक मित्रों के व्यवहारों से अत्यधिक प्रभावित रहते हैं तथा अपने सामाजिक स्वीकृति को मित्र की स्वीकृति से जोड़ कर देखते हैं| इसी अवस्था में नेतृत्व के गुण का विकास होता है| टोली में जो बालक अत्यधिक प्रभुत्व प्रदर्शित करता है उसे सभी अपने टीम का नेता स्वतः चुन लेते हैं तथा वह समूह का नायक बन जाता है| वह समूह के अन्य सदस्यों से अधिक लोकप्रिय होता है|





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