प्रवास के सिद्धांतों

Prawas Ke Siddhanton

Gk Exams at  2020-10-15

GkExams on 10-02-2019

आर्यन प्रवास सिद्धांत (English - Indo-Aryan Migration Theory) मुख्यतः ब्रिटिश-जर्मन इतिहासकारों की मान्यता थी कि भारतीय आर्य संबोधन का यूरोपीय आर्यन जाति से सम्बन्ध है। भारत में आर्यों का यूरोपीय देशों व मध्य-एशिया से आगमन हुआ और भारत में भी अपनी सभ्यता स्थापित की । स्टेपी देहाती, जो अफगानिस्तान के उत्तर में विशाल मध्य एशिया घास के मैदानों से भारत चले गए, उन्हें अनौपचारिक रूप से आर्य कहा जाता है।


उपरोक्त सिद्धांत का प्रतिपादन 19वीं शताब्दी के अंत में तब किया गया जब यूरोपीय भाषा-परिवार के सिद्धांत की स्थापना हुई । जिसके अंतर्गत, भारतीय भाषाओं में यूरोपीय भाषाओं से कई शाब्दिक समानताएं दिखीं । जैसे घोड़े को ग्रीक में इक्वस eqqus, फ़ारसी में इश्प और संस्कृत में अश्व कहते हैं । इसी तरह, भाई को लैटिन-ग्रीक में फ्रेटर (इसी से अंग्रेज़ी में फ्रेटर्निटी, Fraternity), फ़ारसी में बिरादर और संस्कृत में भ्रातृ कहते हैं। इस सिद्धांत की आलोचना-स्वीकार्यता दोनो हुई - उस समय अर्थात 1870 के समय भी । साथ ही इससे भारतीय-राजनीति में भाषा के आधार पर भेद आना शुरु हो गया - जो पहले भारतीय इतिहास में नहीं देखा गया था ।





Comments Priya on 25-12-2019

Duri apakashay niyam kisne diyA



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