कार्ल मार्क्स द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत

Carl Marks Dwara Pratipadit Sidhhant

GkExams on 13-11-2018

मार्क्सवाद के प्रमुख सिद्धांत

1. द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का सिद्धांत

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद मार्क्स के विचारो का मूल आधार है मार्क्स ने द्वन्द्वात्मकप्रणाली को हीगल से ग्रहण किया है मार्क्स के द्वन्द्ववाद को समझने के लिए हीगलके विचारो को जानना आवश्यक है।हीगल के विचारो में सम्पूर्ण संसार गतिशील हैऔर इसमें निरंतर परिवतर्न होता रहता हे। हीगल के विचारो में इतिहास घटनाओका क्रम मात्र नही है बल्कि विकास की तीन अवस्थाआे का विवेचन किया है - 1. वाद 2 प्रतिवाद 3 संवाद। हीगल की मान्यता कि कोर्इ भी विचारअपनी मूल अवस्था में वाद होता है। कुछ समय बीतने पर उस विचार काविरोध उत्पन्न होता है इस संघर्ष के परिणमस्वरूप मौलिक विचार वाद परिवर्तितहोकर प्रतिवाद का विराधेा होने से एक नये विचार की उत्पत्ति होती है जो सवादकह लाती है।

हीगल का कहना है कि द्वन्द्व के माध्यम से संवाद आगे चलकर वाद का रूपले लेता है जिनका पनु : प्रतिवाद होता है आरै द्वन्द्व के बाद संवाद का रूप धारणकरता है। इस प्रकार यह क्रम चलता रहता है अन्त मे सत्य की प्राप्ति होती है।

मार्क्स ने हीगल के द्वन्द्ववाद को स्वीकार किया किन्तु हीगल के विचारो कोउसने अस्वीकार किया। जहां हीगल संसार को नियामक तथा विश्व आत्माा मानताहै। वहां माक्सर् भौतिक तत्व को स्वीकार करता हे। मार्क्स का मानना है कि द्वन्द्ववादका आधार विश्व आत्मा न होकर पदार्थ ही है। यह भौतिक पदार्थ ही संसार काआधार है पदार्थ विकासमान है और उसकी गति निरंतर विकास की ओर है विकासद्वन्द्वात्मक रीति से होता है। वाद प्रतिवाद और संवाद के आधार पर ही विकासगतिमान रहता है मार्क्स के विचारो मे पूंजीवाद वाद है जहां दो वर्ग पूंजीपतियों वश्रमिक है एक धनवान और दूसरा निर्धन है इन दोनो के हितो मे विरोध है। इनविरोधी वर्गो मे संघर्ष होना आवश्यक है इस संघर्ष में श्रमिको की विजय होगी औरसर्वहारा वर्ग अर्थात श्रमिक वर्ग का अधिनायक वाद स्थापित होगा यह प्रतिवाद कीअवस्था है। इन दोनो अवस्थाओ मे से एक तीसरी व नर्इ स्थिति उत्पन्न होगी जोसाम्यवादी समाज की है। इस स्थिति मे न वर्ग रहेंगे न वर्ग संघर्ष होगा और न राज्यआवश्यक्तानुसार समाज से प्राप्त करेगा। यह तीसरी स्थिति संवाद की स्थितिहोगी।

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की आलोचना -

  1. मार्क्स द्वारा प्रतिपादित दर्शन का आधार द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद है किन्तु इसने इतनेमहत्वपूर्ण सिद्धांत का कहीं भी विस्तृत रूप से वर्णन नही किया।
  2. मार्क्स ने हीगल के आध्यात्मवाद के स्थान पर भौतिकवाद का समर्थन किया है।
  3. मार्क्स का मानना है कि समाज की प्रगति के लिए संघर्ष व क्रांति का होना अनिवार्यहै। किन्तु यह सत्य है कि शांतिकाल में ही समाज की प्रगति तीव्र गति से होती है।

2. इतिहास की आर्थिक भौतिकवादी व्याख्या -

मार्क्स की विचारधारा में द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की भांति इतिहास की आर्थिकव्याख्या का सिद्धांत भी महत्वपूर्ण है। मार्क्स के विचार में इतिहास की सभी घटनाएं आर्थिकअवस्था में होने वाले परिवर्तनो का परिणाम मात्र है। मार्क्स का मत है कि प्रत्येक देश मे औरप्रत्येक काल मे सभी राजनीतिक सामाजिक संस्थाएं कला रीति रिवाज तथा समस्त जीवनभौतिक अवस्थाओ व आर्थिक तत्वो से प्रभावित होती है। मार्क्स अपनी आर्थिक व्याख्या के आधार पर मानवीय इतिहास की छ: अवस्थाएंबतलायी है जो है।

i. आदिम साम्यवादी अवस्था-सामाजिक विकास की इस पहली अवस्था में जीविकोपार्जन के तरीके बहुतसरल थे शिकार करना मछली मारना जंगलो से कंद मूल एकत्रित करना ही इनकामुख्य व्यवसाय था। भोजन प्राप्त करने व जंगली जानवरो से अपनी रक्षा करने केलिये ही मनुष्य समूह में झुण्ड बनाकर साथ साथ रहते थे। इस अवस्था में उत्पादनके साधन समस्त समाज की सामूहिक सम्पत्ति हुआ करते थे इस अवस्था में निजीसम्पत्ति नही थी और न ही कोर्इ शोषक था और न ही कोर्इ शोषित सब मनुष्यसमान थे। इसलिए मार्क्स ने इस अवस्था को ‘साम्यवादी अवस्था’ कहा है।

ii. दासता की अवस्था -धीरे धीरे भौतिक परिस्थितियों में परिवर्तन हुआ। व्यक्तियों ने खेती करनापशुपालन करना और दस्तकारी करना प्रारंभ कर दिये। इससे समाज में निजीसम्पत्ति के विचारो का उदय हुआ। जिन्होने उत्पादन के साधनो; भूमिद्ध आदि परअधिकार कर लिया। वे ‘स्वामी’ कहलाये ये दूसरे व्यक्तियों से बलपूर्वक कामकरवाने लगे वे ‘दास’ कहलाये समाज ‘स्वामी’ और दास दो वर्गो में विभजित होगया आदिम समाज की समानता और स्वतंत्रता समाप्त हो गर्इ। इसी अवस्था सेसमाज के शोषक और शोषित दाे वर्गो के मध्य अपने आथिर्क हिताे के लिये सघ्ंर्षप्रारंभ हो गया।

iii. सामंतवादी अवस्था -जब उत्पादन के साधनो में और अधिक उन्नति हुयी पत्थर के औजार औरधनुष बाण से निकलकर लोहे के हल करघे का चलन शुरू हुआ कृषि दस्तकारीबागवानी कपड़ा बनाने के उद्योगो का विकास हुआ। अब दास के स्थान पर उद्योगोमें काम करने वाले श्रमिक थे। सम्पूर्ण भूमि छोटे मोटे उद्योगो दस्तकारियाें औरउत्पादन के अन्य साधनो पर तथा कृषि पर जिनका आधिपत्य था उन्हे ‘जागीरदारव सामन्त’ कहा जाता था। कृषि कार्य करने वाले कृषकों और दस्तकारी करने वालेश्रमिको का वर्ग सांमतो के अधीन था। इस व्यवस्था को सामंतवादी अवस्था कहाजाता है। मार्क्स के अनुसार इस अवस्था मे भी सामन्तो तथा कृषको दस्तकारो केआर्थिक हितों में परस्पर संघर्ष चलता रहा।

iv. पूंजीवादी अवस्था -अठारहवीं शताब्दी के उत्तराध्र्द में औद्योगिक क्रांति हुर्इ जिसके परिणामस्वरूपउत्पादन के साधनो पर पूंजीपतियों का नियंत्रण स्थापित हो गया अर्थात पूंजीपतिउत्पादन के साधनो के स्वामी हो गये लेकिन वस्तुओ के उत्पादन का कार्य श्रमिकोंद्वारा किया जाता है वस्तुओं का उत्पादन बहुत बडे पैमाने पर हो ता है अत: श्रमिकस्वतंत्र होकर कार्य करते है किन्तु श्रमिको के पास उतपादन के साधन नहीं होते अत:वे अपनी आर्थिक आवश्यकता पूर्ण करने लिये श्रम बचे ने को बाध्य होते है। निजीलाभ के लिये पूंजीपति वर्ग ने श्रमिकों को शोषण किया दसू री तरफ श्रमिकों में भीअपने हितों के रक्षा के लिये जागरूकता आर्इ। परिणामस्वरूप दो वर्गो पूंजीपतिशोषक वर्ग और सर्वहारा; श्रमिकद्ध शोषित वर्ग के बीच सघंर्ष पा्ररंभ हो जाता है। मार्क्सका मत है कि संघर्ष अपने चरमोत्कर्ष पर पहचुं कर पूंजीवाद को समाप्त कर दगे ा।

v. श्रमिक वर्ग के अधिनायकत्व की अवस्था -मार्क्स का विचार है कि पूंजीवादी अवस्था द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के माध्यमसे श्रमिको व पूंजीपतियो के मध्य संघर्ष में जब पूंजीपतियो की पराजय होगी तबपूंजीवाद समाप्त होकर ऐतिहासिक विकास की पांचवी अवस्था ‘‘श्रमिक वर्ग केअधिनायकत्व की अवस्था’’ आयेगी। इस अवस्था में उत्पादन के सम्पूर्ण साधनोंपर श्रमिको का अधिकार हो जायेगा जिसे ‘श्रमिक वर्ग का अधिनायक तंत्र यातानाशाही’ कहा गया है इस पांचवी अवस्था के बहुमत वर्ग (श्रमिक वर्ग अल्पमतवर्ग पूंजीपति वर्ग) के विरूध्द अपनी राज्य शक्ति का प्रयोग कर उसे पूर्णतयासमाप्त कर देगा।

vi. राज्यविहीन और वर्गविहीन समाज की अवस्था -मानवीय इतिहास की अन्तिम अवस्था राज्य विहीन और वर्ग विहीन समाजकी अवस्था आयेगी इस अवस्था में समाज में कवे ल एक ही वर्ग होगा जिसे श्रमिकवर्ग कहा गया है। इस समाज में न शोषक वर्ग होंगे न शोषित वर्ग होंगे। यह समाजराज्यविहीन आरै वर्ग विहीन होगा अत: वर्ग विहीन समाज में राज्य स्वत: ही समाप्तहो जायेगा तथा इस समाज में वितरण का सिद्धांत लागू होगा जिसमें समाज केप्रत्येक लागे अपनी यागेयता के अनुसार कार्य करें ओर उसे आवश्यक्तानुसार पा्रप्ति हो।
इस अवस्था साम्यवादी युग में वर्ग विहीन समाज की स्थापना से वर्ग संघर्षप्रकृि त से होगा। मनुष्य प्रकृति से संघर्ष कर मानव कल्याण हेतु नवीन खोजआविष्कार करेगें तथा साम्यवादी समाज आगे विकास करता रहेगा।



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