गोगामेडी का इतिहास

Gogamedi Ka Itihas

Gk Exams at  2018-03-25


Go To Quiz

Pradeep Chawla on 23-10-2018


गोगाजी का जन्म राजस्थान के ददरेवा (चुरू) चौहान वंश के शासक जैबर (जेवरसिंह) की पत्नी बाछल के गर्भ से गुरु गोरखनाथ के वरदान से भादो सुदी नवमी को हुआ था। चौहान वंश में राजा पृथ्वीराज चौहान के बाद गोगाजी वीर और ख्याति प्राप्त राजा थे। गोगाजी का राज्य सतलुज सें हांसी (हरियाणा) तक था। लोकमान्यता व लोककथाओं के अनुसार गोगाजी को साँपों के देवता के रूप में भी पूजा जाता है। लोग उन्हें गोगाजी चौहान, गुग्गा, जाहिर वीर व जाहर पीर के नामों से पुकारते हैं। यह गुरु गोरक्षनाथ के प्रमुख शिष्यों में से एक थे। राजस्थान के छह सिद्धों में गोगाजी को समय की दृष्टि से प्रथम माना गया है।जयपुर से लगभग 250 किमी दूर स्थित सादलपुर के पास ददरेवा में गोगादेवजी का जन्म स्थान है। गोगादेव की जन्मभूमि पर आज भी उनके घोड़े का अस्तबल है और सैकड़ों वर्ष बीत गए, लेकिन उनके घोड़े की रकाब अभी भी वहीं पर विद्यमान है। उक्त जन्म स्थान पर गुरु गोरक्षनाथ का आश्रम भी है । भक्तजन इस स्थान पर कीर्तन करते हुए आते हैं और जन्म स्थान पर बने मंदिर पर मत्‍था टेककर मन्नत माँगते हैं।



संदर्भ - ददरेवा के इतिहास का यह भाग 'श्री सार्वजनिक पुस्तकालय तारानगर' की स्मारिका 2013-14: 'अर्चना' में प्रकाशित मातुसिंह राठोड़ के लेख 'चमत्कारिक पर्यटन स्थल ददरेवा' (पृ. 21-25) से लिया गया है।


10 वीं शताब्दी के लगभग अंत में मरुप्रदेश के चौहानों ने अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित करने प्रारम्भ कर दिये थे। इसी स्थापनाकाल मे घंघरान चौहान ने वर्तमान चुरू शहर से 10 किमी पूर्व मे घांघू गाँव बसा कर अपनी राजधानी स्थापित की। ('अर्चना',पृ.21)


राणा घंघ की पहली रानी से दो पुत्र हर्ष व हरकरण तथा एक पुत्री जीण का जन्म हुआ। हर्ष व जीण लोक देवता के रूप में सुविख्यात हैं। ('अर्चना',पृ.21) ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते हालांकि हर्ष ही राज्य का उत्तराधिकारी था लेकिन नई रानी के रूप में आसक्त राजा ने उससे उत्पन्न पुत्र कन्हराज को उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। संभवत: इन्हीं उपेक्षाओं ने हर्ष और जीण के मन में वैराग्य को जन्म दिया। दोनों ने घर से निकलकर सीकर के निकट तपस्या की और आज दोनों लोकदेव रूप में जन-जन में पूज्य हैं।


राणा घंघरान की दूसरी रानी से कन्हराज, चंदराज व इंदराज हुये। कन्हराज के चार पुत्र अमराज, अजराज, सिधराज व बछराज हुये। कन्हराज का पुत्र अमराज (अमरा) उसका उत्तराधिकारी बना। अमराजका पुत्र जेवर (झेवर) उसका उत्तराधिकारी बाना। लेकिन महत्वाकांक्षी जेवर ने दादरेवा को अपनी राजधानी बनाई और घांघू अपने भाइयों के लिए छोड़ दिया। जेवर ने उत्तरी क्षेत्र मे अपने राज्य का विस्तार अधिक किया। असामयिक मृत्यु के कारण यह विजय अभियान रुक गया। जेवर के पश्चात उनका पुत्र गोगा (गोगदेव) चौहान युवावस्था से पूर्व ही माँ बाछलदे के संरक्षण में ददरेवा का राणा बना। ('अर्चना',पृ.21)


वर्तमान जोगी-आसन के स्थान पर नाथ संप्रदाय के एक सिद्ध संत तपस्वी योगी ने गोरखनाथ के आशीर्वाद से बाछल को यशस्वी पुत्र पैदा होने की भविष्यवाणी की थी। कहते हैं कि बाछलदे की बड़ी बहन आछलदे को पहले इन्हीं संत के अशिर्वाद से अर्जन-सर्जन नामक दो वीर पैदा हुये थे। ('अर्चना',पृ.22)


अर्जन-सर्जन के साथ गोगा का भीषण युद्ध: गोगा के पिताकी असामयिक मृत्यु के कारण गोगा को संघर्ष करना पड़ा। राणा के वंशजों ने, जो विस्तृत क्षेत्र में ठिकाने स्थापित कर चुके थे , गोगा को राज्य व्यवस्थित करने में सहयोग नहीं किया। घंघरान के एक पुत्र इन्दराज के वंशज घांघू से 40 किमी उत्तर मे जोड़ी नामक स्थान पर काबिज थे। इनके राजकुमार अर्जन-सर्जन गोगा के मौसेरे भाई थे। इन राजकुमारों ने गोगा से ददरेवा छिनने का प्रयास किया। इन जोडले राजकुमारों ने गायों को चोरी कर लेजाना प्रारम्भ किया। एक दिन गोगा का दादरेवा से 8 किमी उत्तर-पूर्व मे वर्तमान खुड्डी नामक गाँव के पास एक जोहड़ भूमि में अर्जन-सर्जन के साथ भीषण युद्ध हुआ। अर्जन एक जाळ के पेड़ के पास मारा गया। सर्जन तालाब की पाल के पास युद्ध करता हुआ काम आया। इनके अंतिम स्थल पर एक मंदिर बना हुआ है जिसमें एक पत्थर की मूर्ति में दो पुरुष हाथों मे तलवार लिए हुये एक ही घोड़े पर सवार हैं। घोड़े के आगे एक नारी खड़ी है। इनकी अर्जन-सर्जन के नाम से पूजा की जाती है। एसी ही एक घोड़े पर सवार की मूर्ति ददरेवा की मेड़ी मे भी है जो वर्तमान में एक दीवार के साथ स्थापित कर मंदिर का रूप दे रखा है। मंदिर में दूसरी पत्थर की मूर्ति घोड़े पर सवार गोगा चौहान की है। युद्ध मैदान मे निर्मित मंदिर का पुजारी एक भार्गव परिवार का है। वर्तमान मे ऊपर वर्णित जाळ का वृक्ष नष्ट हो गया है। जोहड़ मे अब भी पानी भरता है। यहाँ एक लोकगीत प्रचलित है - 'अरजन मारयो जाळ तलै' सरजन सरवरिए री पाळ। हेरी म्हारा गूगा भल्यो राहियो'।('अर्चना',पृ.22)


गोगा का वैवाहिक जीवन: गोगा के वैवाहिक जीवन के संबंध में ऐतिहासिक तथ्यों का अभाव है। लोक-कथाओं में उनकी पत्नियों के रूप में राणी केलमदे व राणी सुरियल के नामों का उल्लेख है। राणी केलमदे को पाबूजी के भाई बुड़ोजी की पूर्ति बताया गया है। समय का अंतराल अधिक होने के कारण यह सत्य प्रतीत नहीं होता। राणी सुरियल का वर्णन कामरूप देश की राजकुमारी के रूप में किया गया है। ('अर्चना',पृ.22)


गोगा के एक पुत्र नानक के अलावा अन्य पुत्रों का नाम ज्ञात नहीं है। ('अर्चना',पृ.23)


महमूद गजनवी से युद्ध - महमूद गजनवी के उत्तर भारत पर हुये आक्रमणों के परिणाम स्वरूप गोगा ने अपनी सीमा से लगते हुये अन्य अव्यवस्थित राज्यों पर भी सीधा अधिकार न कर मैत्री संधि स्थापित की। जिसके कारण उत्तरी-पूर्वी शासकों की नजरों मे गोगा चौहान भारतीय संस्कृति का रक्षक लगने लगा। जब महमूद ने सन 1018 में कन्नौज पर आक्रमण किया तो संभवत: उसके बाद गोगा ने सम्पूर्ण उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र मे संपर्क किया होगा क्योंकि सोमनाथ पर हुये आक्रमण के समय सभी शासकों ने महमूद को अपने क्षेत्र से जाने की स्वीकृति देने के उपरांत भी सोमनाथ से आते हुये महमूद पर आक्रमण करने के लिए गोगा ने युद्ध मैदान में आने का आमंत्रण दिया तो उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र के सभी शासकों ने सहर्ष स्वीकार किया था। ('अर्चना',पृ.23)


महमूद सोमनाथ पर आक्रमण कर उस अद्वितीय धरोहर को नष्ट करने में सफल रहा लेकिन उसको इतनी घबराहट थी कि वापसी के समय बहुत तेज गति से चलकर अनुमानित समय व रणयोजना से पूर्व गोगा के राज्य के दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र मे प्रवेश कर गया। गोगा द्वारा आमंत्रित उत्तर-पूर्वी क्षेत्र की सेनाएँ समय पर नहीं पहुंची थी। गोगा ने हिम्मत नहीं हारी। अपने पुत्र भाई-भतीजों एवं स्थाई तथा एकत्रित सेना को लेकर प्रस्थान किया। ददरेवा से 25 कोस (75 किमी) उत्तर-पश्चिम के रेगिस्तानी निर्जन वन क्षेत्र में तेज गति से जाते हुये महमूद का रास्ता रोका। उस समय महमूद रास्ता भटका हुआ था और स्थानीय लोगों के सहयोग से गजनी शहर का मार्ग तय कर रहा था। गोगा के चतुर सैनिकों ने रास्ता बताने के बहाने महमूद की सेनाके निकट पहुँचकर उसकी सेना पर आक्रमण कर दिया। गोगा के पास साहस तो था पर सेना कम थी। महमूद की सेना के काफी सैनिक मारे गए। महमूद के सैनिकों की संख्या बहुत अधिक थी। गोगा अपने 45 से अधिक पुत्र, भतीजों एवं निकट बंधु-बांधवों के अतिरिक्त अन्य सैंकड़ों सैनिकों के साथ बालू मिट्टी के एक टीले पर सांसारिक यात्रा को विराम दिया।('अर्चना',पृ.23)


युद्ध समाप्त होने के कुछ घंटों बाद बचे हुये पारिवारिक सदस्यों व सैनिकों ने उसी स्थान पर अग्नि की साक्ष्य में इहलोक से परलोक के लिए विदाई दी। शेष बचे वीर योद्धाओं ने ददरेवा आकर गोगा के भाई बैरसी के पुत्र उदयराज को राणा बनाया। उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के सैनिक भारी संख्या में दादरेवा पहुंचे लेकिन उस समय तक सब कुछ बदल गया था। चौहान वंश व अन्य रिशतेदारों के योद्धा गोगा के सम्मान में ददरेवा आए। उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों के अनुयाई लोग आज भी पीले वस्त्रों मे परंपरा को निभाने के लिए उपस्थित होते हैं। ('अर्चना',पृ.23)


गोगा को जहरीले सर्पों के विश को नष्ट करने की अलौकिक शक्ति प्राप्त हुई। गाँव-गाँव में गोगा के पूजा स्थान बनने लगे। गोगामेड़ियों की स्थापना हुई। जन्म स्थान ददरेवा में बनी मेड़ी को 'शीश मेड़ी' कहा जाता है। ददरेवा मेड़ी में गोगाजी की घोड़े पर सवार मूर्ति स्थापित है। ददरेवा की मेड़ी बाहर से देखने पर किसी राजमहल से कम नहीं है। ('अर्चना',पृ.23)


दादरेवा का दूसरा महत्वपूर्ण स्थान गोरखधुणा (जोगी आसान) है। यह वही स्थान है जहां नाथ संप्रदाय के एक सिद्ध संत तपस्वी योगी ने गोरखनाथ के आशीर्वाद से बाछल को यशस्वी पुत्र पैदा होने की भविष्यवाणी की थी। यहाँ पर सिद्ध तपस्वियों का धूणा एवं गोरखनाथ जी और अन्य की समाधियाँ भी हैं। ('अर्चना',पृ.24)


ददरेवा गाँव में एक पुराना गढ़ है जो सन 1509 ई. से 1947 तक बीकानेर के राठोड राज्य के अधीन रहा। [10]('अर्चना',पृ.25) महाकवि पृथ्वीराज राठोड़ के पुत्र सुंदरसेन को 12 गाँव की जागीर के साथ ददरेवा मिला था। पुराने कुएं , मंदिर,हवेलियाँ तथा जाल के वृक्ष यहाँ की सुंदरता बढ़ते हैं। राठोड़ राज्य से पूर्व गोगाजी चौहान के वंश में मोटेराय के तीन पुत्रों द्वारा इस्लाम धर्म स्वीकार करने और क्यामखानी नाम विख्यात होने की ऐतिहासिक घटना दादरेवा के इतिहास की महत्वपूर्ण घटना है। क्यामखानी एवं अन्य हिन्दू धर्म से इस्लाम को मानने वालों के कारण ही गोगाजी के नाम के साथ पीर शब्द जूड़कर गोगापीर नाम लोकप्रिय हुआ। [11]('अर्चना',पृ.25)


गोगाजी का समाधि-स्थल 'धुरमेड़ी' कहलाता है। यह गोगामेड़ी स्थान भादरा से 15 किमी उत्तर-पश्चिम मे हनुमानगढ़ जिले में है। यहाँ पुरानी मूर्तियाँ हैं। यहाँ के पुजारी चायल मुसलमान हैं जो चौहान के वंशज हैं। गोगामेड़ी में गोरख-टिल्ला व गोरखाणा तालाब दर्शनीय स्थान हैं। गोरखमठ में कालिका व हनुमान जी की मूर्तियाँ हैं। गोगाजी के भक्त ददरेवा के साथ ही गोगामेड़ी आने पर यात्रा सफल मानते हैं। ('अर्चना',पृ.25)



Comments संदीप परोचा क्योडक on 22-08-2018

सर्व प्रथम गोगा मेडी का निर्माण किस सन् में हुआ था और किसने और कब और कैसे किया था कृपा पुर्ण विवरण बताने की कृपा करें




आप यहाँ पर गोगामेडी gk, question answers, general knowledge, गोगामेडी सामान्य ज्ञान, questions in hindi, notes in hindi, pdf in hindi आदि विषय पर अपने जवाब दे सकते हैं।

Labels: , , ,
अपना सवाल पूछेंं या जवाब दें।

Comment As:

अपना जवाब या सवाल नीचे दिये गए बॉक्स में लिखें।

Register to Comment