केवल ज्ञान कब होता है

Kewal Gyan Kab Hota Hai

Gk Exams at  2018-03-25


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GkExams on 24-11-2018


जैन दर्शन के अनुसार केवल विशुद्धतम ज्ञान को कहते हैं। इस ज्ञान के चार प्रतिबंधक कर्म होते हैं- मोहनीय, ज्ञानावरण, दर्शनवरण तथा अंतराय। इन चारों कर्मों का क्षय होने से केवलज्ञान का उदय होता हैं। इन कर्मों में सर्वप्रथम मोहकर का, तदनन्तर इतर तीनों कर्मों का एक साथ ही क्षय होता है। केवलज्ञान का विषय है- सर्वद्रव्य और सर्वपर्याय (सर्वद्रव्य पर्यायेषु केवलस्य-तत्वार्थसूत्र, 1.30)। इसका तात्पर्य यह है कि ऐसी कोई भी वस्तु नहीं, ऐसा कोई पर्याय नहीं जिसे केवलज्ञान से संपन्न व्यक्ति नहीं जानता। फलत: आत्मा की ज्ञानशक्ति का पूर्णतम विकास या आविर्भाव केवलज्ञान में लक्षित होता हैं। यह पूर्णता का सूचक ज्ञान है। इसका उदय होते ही अपूर्णता से युक्त, मति, श्रुत आदि ज्ञान सर्वदा के लिये नष्ट हो जाते हैं। उस पूर्णता की स्थिति में यह अकेले ही स्थित रहता है और इसी लिये इसका यह विशेष अभिधान है।


जैन दर्शन के अनुसार जीव 13वें गुणस्थान में केवल ज्ञान की प्राप्ति करता है। 14 गुणस्थान इस प्रकार है।

  1. मिथ्या दृष्टि
  2. सासादन सम्यक्-दृष्टि
  3. मिश्र दृष्टि
  4. अविरत सम्यक्-दृष्टि
  5. देश-विरत
  6. प्रमत्त सम्यक्
  7. अप्रमत्त सम्यक्
  8. अपूर्वकरण
  9. अनिवृतिकरण
  10. सूक्ष्म-साम्पराय
  11. उपशान्तमोह
  12. क्षीणमोह
  13. सयोगकेवली- योग सहित केवल ज्ञान। इस गुणस्थान में अनन्तज्ञान, अनन्तदर्शन, अनन्तसुख और अनन्त आत्मशक्ति प्राप्त हो जाते है।
  14. अयोगकेवली - योग रहित केवल ज्ञान

अन्य दर्शनों में

केवल का अर्थ वह ज्ञान जो भ्रांतिशून्य और विशुद्ध हो। सांख्यदर्शन के अनुसार इस प्रकार का ज्ञान तत्वाभ्यास से प्राप्त होता है। यह ज्ञान मोक्ष का साधक होता हैं। इस प्रकार का ज्ञान होने पर यह बोध हो जाता है कि न तो मैं कर्ता हूँ, और न किसी से मेरा कोई संबंध है और न मैं स्वयं पृथक् कुछ हूँ।



Comments narendra jain on 17-09-2018

kewalgyan kis gunsthan me hota hai



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