सिवाना दुर्ग कहा है

Siwana Durg Kahaa Hai

Pradeep Chawla on 13-10-2018


राजस्थान की छप्पन की पहाडियों में स्थित सिवाना दुर्ग का इतिहास बड़ा गौरवशालीहै | कहा जाता है की इस दुर्ग का निर्माण राजा भोज के पुत्र वीर नारायण पंवार ने10 वि शताब्दी में करवाया था बाद में ये दुर्ग सोनगरा चौहानों के अधिकार में आ गया|जब अल्लाउद्दीनखिलजी ने अपनी साम्राज्यवादी निति के तहत गुजरात और मालवा पर अधिकार कर लिया फिरवो अपने विजित प्रदेशो के मध्य स्थित राजपुताना के दुर्गो पर अधिकार करने की तरफअग्रसर हुवा और उसने रणथम्भोर और चित्तोड पर अधिकार करने के उपरान् 2 जुलाई 1308 ईस्वी में सिवाना दुर्ग पर आक्रमणकरने हेतु सेना भेजी| उस समय दुर्ग पर वीर सातलदेव अथवा सीतलदेव चौहान का अधिकारथा और उसका राज्य क्षेत्र लगभग सम्पूर्ण बाड़मेर पर था और उसके गुजरात के सोलंकियोसे अच्छे मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध थे और जिसकी दृष्टी में दुर्ग को शत्रु के हाथोसौपने के बाद अपमानजनक जीवन व्यतीत करने की बजाय दुर्ग की रक्षा करते हुवे वीर गतिको प्राप्त करना ज्यादा बेहतर था |शाही सेना ने दुर्ग के चारो तरफ घेरा डाल दियाकिन्तु लम्बे समय तक शाही सेना को इस अभेद दुर्ग पर अधिकार करने में सफलता प्राप्तनहीं हुई और उलटे शाही सेना को ज्यादा क्षति हुई अनेक सैनिको के साथ साथ सैना नायकनाहर खा को अपने प्राण गवाने पड़े| तब स्वय अल्लाउद्दीन ने एक बड़ी सेना सहित इस दुर्गके चारो तरफ घेरा डाला और लबे समय तक घेरा डालने से दुर्ग के भीतर की रसद समाप्तहो जाने के कारण सातलदेव ने अपने राजपूत सैनिको सहित दुर्ग के दरवाजे खोल कर शाहीसेना पर आक्रमण कर दिया और युद्ध करते हुवे वीर गति को प्राप्त हुवे|तब अल्लाउद्दीन ने इस पर अधिकार कर लिया था और इस दुर्ग का नामउसने खैराबाद रखा था और उसने यहाँ कमाल्लुद्दीन को सूबेदार नियुक्त किया| डा मोहनलाल गुप्ताके अनुसार अल्लाउद्दीन ने तारीखे अलाई में इस दुर्ग का उल्लेख इस प्रकार किया है “सिवाना दुर्ग एक भयानक जंगल के बीच स्थित था | जंगल जंगली आदमियों से भरा हुवा था जो राहगीरों कोलुट लेते थे | इस जंगल के बीच पहाड़ी पर काफिर सातलदेव एक सिमुर्ग ( फ़ारसीपुरानो में वर्णित एक भयानक और विशाल पक्षी) की भाँती रहता था और उसके कई हजारकाफिर सरदार पहाड़ी गिद्धों की भाँती उसकी रक्षा करते थे|





केंद्र में खिलजियो की शक्ति कमजोर होने पर राव मल्लिनाथ केभाई राठोड जैतमल ने इस दुर्ग पर अधिकार कर लिया और काफी लम्बे समय तक जैतमलोत राठोड़ो ने इस दुर्ग पर शासन किया फिरजोधपुर के शासक राव मालदेव ने इस दुर्ग को राठोड जैतमलोतो के वंशज डूंगरसी सेहस्तगत कर लिया था|



जोधपुर के शासक मालदेव ने विक्रम संवत 1594 और ईस्वी संवत20 जून 1538 में सिवाना पर सेना भेजी और वहा के स्वामी राठोर डूंगरसी को निकाल करवहा जोधपुर राज्य का अधिकार स्थापित किया और मंगलिया देवा (भादावत ) को वहा काकिलेदार नियुक्त किया|( मुह्नोत नैणसी की ख्यात और वीरविनोद के अनुसार हालाकिंवीर विनोद में आक्रमण का वर्ष 1595 दिया गया है ) राव मालदेव ने ही इस दुर्ग केपरकोटे का निर्माण करवाया था और इसकी सुरक्षा व्यवस्था को सुद्रढ़ किया था |
तारीखे शेरशाही के अनुसार जोधपुर नरेश मालदेव ने शेरशाहसूरी के जोधपुर पर आक्रमण के दौरान भाग कर सिवाना की पहाडियों में शरण ली थी| जोधपुर की मुह्नोतनैणसी की ख्यात के अनुसार इस समय मालदेव के साथ राठोड जैसा, भैरुदासोत चम्पावत,राठोड महेश घड्सियोत, राठोड जैतसी बाघावत और फलोदी का स्वामी राव राम और पोकरण कास्वामी जेतमाल भी साथ में गए थे|

सिवाना का अभिलेख(1537)Inscriptionof Siwana - सिवाना दुर्ग के द्वितीय द्वार में अन्दर दोनों तरफ शिलालेख लगेहुवे है जिसमे दायी और लगे शिलालेख में राव मालदेव की सिवाना किले पर विजय का सूचकहै|इसमें विजय के उपरान्त किये जाने वाले प्रबंध का भी वर्णन किया गया है| इसमें उस समय कीस्थानीय भाषा का भी बोध होता है |
“ स्वस्ति श्रे (श्री) गणेश प्रा (प्र) सादातु (त्र) समतु (संवत1594 वर्षे आसा (षा) ढ वदि 8 , दिने बुधवा (स) रे मह (हां) राज (जा) धिराज मह (हा) राय (ज) श्री मालदे (व) विजे (जय) राजे (राज्ये ) गढ़सी वने (वाणों) लिए (यो)गढ़री (री) कु चि म (माँ) गलिये देव भदाऊ तू (भंदावत) रे हाथि (थ) दि (दी) नि गढ़ थ(स्त) भेराज पंचा (चो) ली अचल गदाधरे (ण) तु रावले वहीदार लिष ( खी) त सूत्रधारकरमचंद परलिय सूत्रधार केसव”
डा0 गोपीनाथ शर्मा के अनुसार इसमें दी गई अष्टमी तिथि केबजाय सप्तमी होनी चाहिए और इसे चैत्रादी संवत 1595 मारवाड़ में प्रचल्लित श्रावणदीके विचार से लेना चाहिए|( देखे फोटोग्राफ)



डा मोहन लाल गुप्ता के अनुसार तबकात ए अकबरी एवं अकबरनामामें भी सिवाना दुर्ग का उल्लेख है| राव मालदेव के बाद उसका पुत्र राव चंद्रसेन जोधपुरका शासक बना चूँकि चंद्रसेन राव मालदेव का तीसरा पुत्र था और प्रथम दो पुत्रो मेंज्येष्ठ पुत्र राम और उदय सिंह के ज्येष्ठ होने के बावजूद अपनी प्रिय रानी केपुत्र होने के कारण राव मालदेव ने राव चंद्रसेन को जोधपुर का उतराधिकारी बनाया थाइसलिए ताउम्र चंद्रसेन को अपने बड़े भाइयो राम और उदयसिंह से संगर्ष करण पड़ा था| राम का विवाह मेवाड़के महाराणा उदयसिंह की पुत्री से हुवा था अत उदय सिंह जी ने उसे केलवा की जागीरप्रदान कर दी थी बाद में राम अकबर की सेवा में चला गया था और उसी के कहने पर अकबरने शाही सेना भेज कर जोधपुर पर अधिकार कर लिया और चंद्रसेन को भाग कर भाद्राजुन कीपहाडियों में शरण लेनी पड़ी थी|जोधपुर का शासन अकबर ने बीकानेर के शासक रायमल कोसुपुर्द कर दिया था |चंद्रसेन का बड़ा भाई उदयसिंह फलोदी जागीर का स्वामी था औरवो भी चंद्रसेन के विरुद्ध था और उनमे कई बार युद्ध भू हुवा था| अकबर चंद्रसेन केउत्पाती व्यवहार के कारण हमेशा उससे नाखुश रहा और आखिर में जब चंद्रसेन सिवानाकिले में रहने लगा था| जब अजमेर में अकबर को चंद्रसेन के उत्पात की सुचना मिली तोउसने चंद्रसेन के विरुद्ध अपने सेनापतियो में शाह कुली खा मरहम, शिमाल खा,बीकानेर नरेश राय सिंह, केशेदास मेड़ता वाला और जगतराम आदि सरदारों को भेजा और कहाकी यदि चंद्रसेन अपने किये पर शर्मिंदा हो तो उसे समझा देना अन्यथा आक्रमण कर देना| शाही सेना नेसिवाना दुर्ग पर घेरा डाला किन्तु वो इस अभेद दुर्ग को भेद नहीं पाई और रायमल नेअजमेर में बादशाह के समीप उपस्थित होकर और सेना भेजने हेतु निवेदन किया| उधर चंद्रसेन दुर्गको अपने विश्वासपात्र पत्ता के हवाले कर वहा से भाग गया| और सेना को भेजने के बावजूद शाही सैना दुर्ग कोभेद पाने में असमर्थ रही तब अकबर ने शाहबाज खान को भेजा| शाहबाज खा ने पूर्व के समस्त सरदारों को वापस भेजदिया और योजनाबद्ध तरीके से दुर्ग पर घेरा दाल कर प्रबल आक्रमण किये जिसके कारणरसद समाप्त होने के कारण पत्ता ने सिवाना दुर्ग शाहबाज खान के सुपुर्द कर वो रावचंद्रसेन के पास चला गया|इस प्रकार शाही सेना के कई माह तक दुर्ग पर घेरा डाले रहीऔर जिसमे जलाल खा जैसे सेनापति भी मारा गया अंतत बड़ी मुश्किल से शाहबाज खा दुर्गहासिल करने में सफल हो गया इससे सिवाना दुर्ग की अभेदता का आसानी से अंदाजा लगायाजा सकता है |


अकबर ने सिवाना दुर्ग को राव मालदेव के पुत्र रायमल को देदिया था जिसे बाद में उसके पुत्र कल्याणदास वीर कल्ला को प्राप्त हुवा| इतिहासकार गौरीशंकरओझा के अनुसार अकबर ने वीर कल्लाजी द्वारा किसी मनसबदार को मारने की बात पर नाराजहोने पर जोधपुर के उदयसिंह को सिवाना दुर्ग पर अधिकार करने का आदेश दिया| उदय सिंह ने कुंवरभोपत और कुंवर जैत सिंह को दुर्ग पर आक्रमण करने का आदेश दिया जिस परउन्होंने अनेक सरदारों को लेकर सिवानादुर्ग पर घेरा डाल दिया किन्तु वीर कल्लाजी द्वारा दिन में उन पर आक्रमण कर उनकेअनेक सरदारों को मार डाला और उन्हें वहा से भागना पड़ा| फिर बादशाह ने स्वयं उदयसिंह को सिवाना रवाना कियावह जोधपुर होते हुवे सिवाना गया और एक नाई की सहायता से उसने 2 जनवरी 1589 कोदुर्ग में प्रवेश कर लिया और वीर कल्ला जी ने बड़ी वीरता पूर्वक युद्ध करते हुवेवीरगति को प्राप्त हुवे और उनकी पत्नी हाडी रानी ने ललनाओं के साथ जौहर किया था|आज भी जहा वीरकल्लाजी वीरगति को प्राप्त हुवे थे वहा प्रतिवर्ष एक मेला भरता है और एक छतरी काभी निर्माण किया गया है |


सिवाना नगर में वीर कल्लाजी की मूर्ति एक चौराहे पर भी लगी हुई है और उच्चमाध्यमिक विधालय में वीर कल्लाजी के घोड़े की समाधि बनी हुई जिसके बारे में कहाजाता है की उसने अपने स्वामी के प्राणों की रक्षा करते हुवे अपने प्राणों की आहुतिदी थी|


सिवाना नगर के प्रवेश द्वार पर एक शिलालेख लगा हुवा है जिसमें लडकियों को नमारने की राजाज्ञा उत्कीर्ण है|सिवाना दुर्ग के अन्दर देखने लायक प्रमुख स्थलदुर्ग के परकोटे पर बने बुर्ज है जहा से सिवाना नगर का विहंगम दृश्य दिखाई देता है| दुर्ग के अन्दरराजमहल के अवशेष और त्रिकलाश प्रसाद के अवशेष देखे जा सकते है| दुर्ग के अन्दरदुर्ग का मुख्य जल स्रोत तालाब देखने लायक है और उससे थोडा उपर राजमहल के पास एकशिवलिंग जिसके आगे नंदी बैठे है एक चबूतरे पर बने हुवे है|

सिवाना के आस पास के पर्यटक स्थल– Places out & around Siwana Fort –
सिवाना वैसे तो चारो तरफ से थार मरुस्थल से घिरा है किन्तुभौगोलिक दृष्टी से ये क्षेत्र छप्पन की पहाडियों के मध्य स्थित है जो की अत्यतउपजाऊ क्षेत्र रहा है हालाकि वर्तमान में इस क्षेत्र का जल स्तर काफी नीचे जा चूकाहै| वर्षा काल में सिवाना की पहाड़िया चारो तरफ हरीतिमा छा जाने के कारण अत्यतमनोहारी बन जाती है| सिवाना के आस पास के प्रमुख पर्यटक स्थलों में हल्देश्वरमंदिर जहा वीर दुर्गा दास द्वारा निर्मित पोल भी दर्शनीय है| महाभारत कालीन भीमगोड़ामंदिर भी देखने लायक है जिसके बारे में कहा जाता है की अज्ञात वास के दौरानपांड्वो ने कुछ समय यह भी व्यतीत किया था और यहाँ महाबली भीम ने अपने घुटने कीठोकर से पर्वत में से जलधारा उत्पन्न की थी| आशापुरी माता का मंदिर सिवाना में स्थितआशापुरी माताजी का मंदिर है जहा मंछाराम जी महाराज का आश्रम है जिसके द्वाराभीमगोड़ा और अनेक स्थानों पर गौशाला का संचालन किया जाता है और अनेक परोपकारीकार्यो का सम्पादन किया जाटा है|आसोतरा का ब्रम्हा मंदिर कहते है की पुरे भारत में कुछ ही ब्रम्हा जी के मंदिर है जिसमे राजस्थान मेंपुष्कर और नागोर के अलावा केवल मात्र आसोतरा में ब्रम्हा मंदिर है जिसका निर्माणस्वर्गीय खेताराम जी महाराज ने की थी जो की राजपुरोहित ब्राह्मण समाज के गुरु थे| वर्तमान में ट्रस्टद्वारा भव्य मंदिर , विश्राम स्थल का निर्माण और दर्शनार्थियों हेतु प्रतिदिन नि:शुल्क भोजन की व्यवस्था की गई है और एक विशालगौशाला का भी संचालन किया जाता है| हिंगलाज माता का मंदिर – चारणों की आराध्य देवी श्री हिंगलाज माता का मूल मदिर पाकिस्तान में है और दूसरा मंदिर दुर्ग के समीपपहाडियों में स्थित है |मोकलसर की बावड़ी और अमरतिया कुंवा सिवाना के आगे जालोर मार्ग पर स्थित मोकलसर में एक प्राचीनकुवा है अमरतिया बेरा जिसका मीठा और औषधीय गुणों युक्त जल बड़ा प्रसिद्द है|इसके अलावा मोकलसरकी एक बावड़ी पग बाव अत्यंत प्रसिद्द है|जालोर दुर्ग सिवान गढ़ से जालोर दुर्ग का भी भ्रमण किया जा सकता है जिसका इतिहास भी सिवानाकी भाँती बड़ा गौरवशाली रहा है|जैन मंदिर सिवाना में अनेक जैन मंदिर स्थित है |




Comments Amit Prajapat on 12-05-2019

सिवाना दुर्ग कहा है

khimesh on 11-04-2019

सिवाना दुर्ग को किस दुर्ग के नाम से जाना जाता हैं



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