बालक का नैतिक विकास

Balak Ka Naitik Vikash

Gk Exams at  2018-03-25


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GkExams on 12-05-2019

आचरण के लिए समाज निर्धारित नियमों के अनुसार चलना ही नैतिकता माना जाता है। अतः विभिन्न समाज द्वारा आचरण के लिए निर्धारित विभिन्न नियमों के अनुसार नैतिकता के स्वरूप में कुछ भेद पाया जा सकता है। इस प्रकार एक ही समाज के विभिन्न वर्गों की नैतिकता के स्वरूप में भी विभेद पाया जा सकता है। अच्छे तथा बुरे व्यवहार सम्बन्धी किसी वर्ग के विचार के अनुसार ही यह निर्णय किया जा सकता है कि उस वर्ग के व्यक्तियों के लिए नैतिक व्यवहार क्या है? अच्छे नैतिक व्यवहार के लिये कुछ बातों की आवश्यकता होती।
1—अच्छा स्वास्थ्य।
2—संवेगात्मक सुरक्षा, दूसरों से प्यार और आदर पाने की प्रवृत्ति।
3—विभिन्न भावनाओं के प्रकाशन के लिए स्वास्थ्यकर साधनों की प्राप्ति; जिससे व्यक्ति अवांछित मार्ग की ओर न झुके।
4—कुछ आत्म-नियन्त्रण रखना जिससे बचपन जैसी प्रकृतियों पर आवश्यक रोक रखी जा सके।
5—सामाजिक दृष्टिकोण का सदा विस्तार होते रहना जिससे व्यक्ति दूसरों के प्रति सहानुभूति और सहिष्णुता दिखला सकें और दूसरों के अधिकारों और सुविधाओं पर ध्यान दे।
6—उचित वस्तुएं प्राप्त करने के लिये प्रेरणा का रहना और उचित कार्य को ही करने में सन्तोष प्राप्त करना। बच्चा न तो नैतिक होता है और न अनैतिक वस्तुतः वह तो विनैतिक होता है; क्योंकि उसका व्यवहार नैतिक नियमों द्वारा अनुशासित नहीं होता। नैतिक व्यवहार दिखलाने के पहले बालक को यह सीखना चाहिए कि उसका समाज किस वस्तु को अच्छा और किस को बुरा कहता है। यह सब धीरे-धीरे अपने मित्रों, शिक्षकों तथा माता-पिता से सीखता है। यदि समाज द्वारा मान्य व्यवहार बालक के लिए सुखद है तो उसे वह शीघ्र सीख लेगा और उस प्रकार के व्यवहार दिखलाने की उसकी आदत हो जायेगी।


बालक को नैतिक व्यवहार सिखलाने के लिये चार प्रमुख सिद्धांतों पर विशेष ध्यान देना चाहिये।

(1) नैतिक व्यवहार को समाज द्वारा स्वीकृत नियमों पर चलना चाहिए।
(2) बच्चे को स्पष्टतः यह बतलाना चाहिए कि क्या उचित है और क्या अनुचित।
(3) समझने योग्य हो जाने पर बालक को यह बतलाना चाहिए कि क्यों कुछ बातें ठीक मानी जाती हैं और दूसरी गलत
(4) बच्चों के पथ प्रदर्शन का भार जिनके ऊपर है उन्हें यह देखना चाहिए कि उचित व्यवहार के साथ बच्चों को सुखद अनुभव मिलते हैं और अनैतिक व्यवहार के साथ दुखद अनुभव मिलते हैं। अर्थात् नैतिक व्यवहार पर बच्चे को पुरस्कार देना चाहिये अथवा उसकी प्रशंसा करनी चाहिए और अनैतिक व्यवहार पर उसे दण्ड देना अथवा उसकी निन्दा करनी चाहिए। किसी भी आदत-निर्माण का यह मनोवैज्ञानिक नियम है कि इसमें कभी छूट नहीं देनी चाहिए, अर्थात् आदत को दृढ़ करने के लिए एक अवसर को भी न खोना चाहिए। नैतिक आदतों के सम्बन्ध में यह नियम लागू करना चाहिए।



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