विजय सिंह पथिक के बारे में

Vijay Singh Pathik Ke Bare Me

GkExams on 12-05-2019

विजय सिंह पथिक-

बिजोलिया किसान आन्दोलन भारतीय इतिहास में हुए कई किसान आन्दोलनों में से महत्त्वपूर्ण था। यह किसान आन्दोलन भारत भर में प्रसिद्ध रहा, जो मशहूर क्रांतिकारी विजय सिंह पथिक के नेतृत्व में चला था। बिजोलिया किसान आन्दोलन सन 1847 से प्रारम्भ होकर क़रीब अर्द्ध शताब्दी तक चलता रहा। जिस प्रकार इस आन्दोलन में किसानों ने त्याग और बलिदान की भावना प्रस्तुत की, इसके उदाहरण अपवादस्वरूप ही प्राप्त हैं। किसानों ने जिस प्रकार निरंकुश नौकरशाही एवं स्वेच्छाचारी सामंतों का संगठित होकर मुक़ाबला किया, वह इतिहास बन गया।

आन्दोलन के चरण



पंचायतों के माध्यम से समानांतर सरकार स्थापित कर लेना एवं उसका सफलतापूर्वक संचालन करना अपने आप में आज भी इतिहास की अनोखी व सुप्रसिद्ध घटना प्रतीत होती है। इस आन्दोलन के प्रथम भाग का नेतृत्व पूर्णरूप से स्थानीय था, दूसरे भाग में नेतृत्व का सूत्र विजय सिंह पथिक के हाथ में था और तीसरे भाग में राष्ट्रीय नेताओं के निर्देशन में आन्दोलन संचालित हो रहा था। किसानों की माँगों को लेकर 1922 में समझौता हो गया था, परंतु इस समझौते को क्रियांवित नहीं किया जा सका। इसीलिए बिजोलिया किसान आन्दोलन ने तृतीय चरण में प्रवेश कर लिया था। निस्सन्देह बिजोलिया किसान आन्दोलन ने राजस्थान ही नहीं, भारत के अन्य किसान आन्दोलनों को भी प्रभावित किया था।

विजय सिंह पथिक का नेतृत्व



जब लाहौर षड़यंत्र केस में विजय सिंह पथिक का नाम उभरा और उन्हें लाहौर ले जाने के आदेश हुए तो किसी तरह यह खबर पथिक जी को मिल गई। वे टाडगढ़ के क़िले से फरार हो गए। गिरफ्तारी से बचने के लिए पथिक जी ने अपना वेश राजस्थानी राजपूतों जैसा बना लिया और चित्तौडगढ़ क्षेत्र में रहने लगे। बिजोलिया से आये एक साधु सीताराम दास उनसे बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने पथिक जी को बिजोलिया आन्दोलन का नेतृत्व सम्भालने को आमंत्रित किया। बिजोलिया उदयपुर रियासत में एक ठिकाना था। जहाँ पर किसानों से भारी मात्रा में मालगुज़ारी वसूली जाती थी और किसानों की दशा अति शोचनीय थी। विजय सिंह पथिक 1916 में बिजोलिया पहुँच गए औरउन्होंने आन्दोलन की कमान अपने हाथों में सम्भाल ली।

पंचायत का निर्णय

विषय सूची [छिपाएं]

1 आन्दोलन के चरण

2 विजय सिंह पथिक का नेतृत्व

2.1 पंचायत का निर्णय

2.2 आन्दोलन का प्रचार

3 राजस्थान सेवा संघ की स्थापना

3.1 प्रदर्शनी का आयोजन

4 किसानों की विजय

5 टीका टिप्पणी और संदर्भ

6 संबंधित लेख

प्रत्येक गाँव में किसान पंचायत की शाखाएँ खोली गईं। किसानों की मुख्य माँगें भूमि कर, अधिभारों एवं बेगार से सम्बन्धित थीं। किसानों से 84 प्रकार के कर वसूले जाते थे। इसके अतिरिक्त युद्ध कोष कर भी एक अहम मुद्दा था। एक अन्य मुद्दा साहूकारों से सम्बन्धित भी था, जो ज़मींदारों के सहयोग और संरक्षण से किसानों को निरन्तर लूट रहे थे। पंचायत ने भूमि कर न देने का निर्णय लिया।

आन्दोलन का प्रचार

किसान वास्तव में 1917 की रूसी क्रान्ति की सफलता से उत्साहित थे, पथिक जी ने उनके बीच रूस में श्रमिकों और किसानों का शासन स्थापित होने के समाचार को खूब प्रचारित किया था। विजय सिंह पथिक ने कानपुर से प्रकाशित गणेश शंकर विद्यार्थी द्वारा सम्पादित पत्र प्रताप के माध्यम से बिजोलिया के किसान आन्दोलन को समूचे देश में चर्चा का विषय बना दिया।



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