विजय सिंह पथिक के बारे में लिखिए

Vijay Singh Pathik Ke Bare Me Likhiye

GkExams on 12-05-2019

विजय सिंह पथिक उर्फ ​​भूप सिंह गुर्जर (1882-1954) का जन्म गुलावठी, जिला बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश, भारत में एक गुर्जर परिवार में हुआ था विजय सिंह पथिक के पिता का नाम हमीर सिंह गुर्जर और माँ का नाम कमल कुंवारी था विजय सिंह पथिक के पिता हमीर सिंह गुर्जर पिता ने भी 1857 के सिपाही विद्रोह में सक्रिय भाग लिया था विजय. सिंहपथिक का असली नाम भूप सिंह गुर्जर था लेकिन 1915 में लाहौर षड्यंत्र मामले में भूप सिंह का नाम आने के बाद उनके घरवालो ने उनका नाम बदल कर विजय सिंह पथिक कर दिया. बुलंदशहर जिले 1857 में के संघर्ष में अपने दादा के बलिदान, और अपने पिता 1857 के सिपाही विद्रोह में योगदान ने विजय सिंह पथिक को देश की आजादी में योगदान देने के लिए प्रभावित किया और विजय सिंह पथिक किशोरावस्था में क्रांतिकारी संगठन में शामिल हो गए भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ सक्रिय भाग लिया. और राजस्थान में स्वतंत्रता आंदोलन की मशाल जलाई



और स्वतंत्रता सेनानी थे विजय सिंह पथिक एक कवि, लेखक और पत्रकार भी थे वह राजस्थान, केसरी, और नवीन राजस्थान के संपादक थे. उन्होंने अपने हिन्दी स्वतंत्र साप्ताहिक, राजस्थान सन्देश और अजमेर से नव सन्देश शुरू किया था विजय सिंह पथिक तरुण राजस्थान, हिंदी साप्ताहिक के माध्यम से अपने विचार भी व्यक्त करते थे.सन 1915 में जब राव साहब को टॉटगढ़ में नजरबंद किया गया तो वह भी उनके साथ था | 1915 में उसे टॉड गढ़ में बंदी बनाकर रखा गया था जहा से वह फरार हो गया और विजयसिंह पथिक के छद्म नाम से मेवाड़ में घुस गया | संयोगवश उसकी मुलाकात सीताराम दास से हुयी और सीताराम दास के आग्रह पर विजयसिंह पथिक (Vijay Singh Pathik) ने बिजौलिया आन्दोलन का नेतृत्व करना स्वीकार किया | उसकी उपस्थिति से किसानो का उत्साह बढ़ गया |



इस समय जागीरदारों द्वारा बिजौलिया के लोगो पर भारी कर लगाये गये थे और उनसे बलात बेगार ली जाती थी | बिजौलिया आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य इन अत्याचारों के विरूद्ध आवाज उठाना था | सन 1913 में साधू सीताराम दास के नेतृत्व में बिजौलिया के किसानो ने अपना विरोध प्रकट करने के लिए भूमि कर देने से इनकार कर दिया |



सन् 1920 में पथिक जी के प्रयत्नों से अजमेर में ‘‘राजस्थान सेवा संघ’’ की स्थापना हुई। शीघ्र ही इस संस्था की शाखाएॅ पूरे प्रदेश में खुल गई। इस संस्था ने राजस्थान में कई जन आन्दोलनों का संचालन किया। अजमेर से ही पथिक जी ने एक नया पत्र ‘‘नवीन राजस्थान’’ प्रकाशित किया। सन् 1920 में पथिक जी अपने साथियों के साथ नागपुर अधिवेशन में शामिल हुए और बिजौलिया के किसानों की दुर्दशा और देशी राजाओं की निरंकुशता को दर्शाती हुई एक प्रदर्शनी का आयोजन किया। गांधी जी पथिक जी के बिजौलिया आन्दोलन से बहुत प्रभावित हुए, परन्तु गांधी जी का रूख देशी राजाओं और सामन्तों के प्रति नरम ही बना रहा। कांग्रेस और गांधी जी यह समझने में असफल रहें कि सामन्तवाद साम्राज्यवाद का ही एक स्तम्भ है और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विनाश के लिए साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष के साथ-साथ सामन्तवाद विरोधी संघर्ष आवश्यक है। गांधी जी ने अहमदाबाद अधिवेशन में बिजौलिया के किसानों को हिजरत (क्षेत्र छोड़ देने) की सलाह दी। पथिक जी ने इसे अपनाने से यह कहकर इनकार कर दिया कि यह तो केवल हिजड़ो के लिए ही उचित है, पुरूषों के लिए नहीं।



सन् 1921 के आते-आते पथिक जी ने राजस्थान सेवा संघ के माध्यम से बेगू, पारसोली, भिन्डर, बासी और उदयपुर में शक्तिशाली आन्दोलन किए। बिजौलिया आन्दोलन अन्य क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणा स्रोत बन गया था। ऐसा लगने लगा मानो राजस्थान में किसान आन्दोलन की लहर चल पडी है। इससे ब्रिटिश सरकार डर गई। इस आन्दोलन में उसे बोल्शेविक आन्दोलन की प्रतिछाया दिखाई देने लगी।



बिजोलिया किसान आन्दोलन



1920 में विजय सिंह पथिक अपने साथियों के साथ नागपुर अधिवेशन में शामिल हुए और बिजोलिया के किसानों की दुर्दशा और देशी राजाओं की निरंकुशता को दर्शाती हुई एक प्रदर्शनी का आयोजन किया। गाँधीजी पथिक जी के बिजोलिया आन्दोलन से प्रभावित तो हुए, परन्तु उनका रुख देशी राजाओं और सामन्तों के प्रति नरम ही बना रहा। कांग्रेस और गाँधीजी यह समझने में असफल रहे कि सामन्तवाद साम्राज्यवाद का ही एक स्तम्भ है और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विनाश के लिए साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष के साथ-साथ सामन्तवाद विरोधी संघर्ष आवश्यक है। गाँधीजी ने अहमदाबाद अधिवेशन में बिजोलिया के किसानों को हिजरत (क्षेत्र छोड़ देने) की सलाह दी। पथिक जी ने इसे अपनाने से इनकार कर दिया। सन 1921 के आते-आते पथिक जी ने राजस्थान सेवा संघ के माध्यम से बेगू, पारसोली, भिन्डर, बासी और उदयपुर में शक्तिशाली आन्दोलन किए।



किसानों की विजय



बिजोलिया आन्दोलन अन्य क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणा स्रोत बन गया था। ऐसा लगने लगा मानो राजस्थान में किसान आन्दोलन की लहर चल पड़ी है। इससे ब्रिटिश सरकार डर गई। इस आन्दोलन में उसे बोल्शेविक आन्दोलन की प्रतिछाया दिखाई देने लगी थी। दूसरी ओर कांग्रेस के असहयोग आन्दोलन शुरू करने से भी सरकार को स्थिति और बिगड़ने की भी आशंका होने लगी। अंतत: सरकार ने राजस्थान के ए. जी. जी. हालैण्ड को बिजोलिया किसान पंचायत बोर्ड और राजस्थान सेवा संघ से बातचीत करने के लिए नियुक्त किया। शीघ्र ही दोनो पक्षों में समझौता हो गया। किसानों की अनेक माँगें मान ली गईं। चौरासी में से पैंतीस लागतें माफ कर दी गईं जुल्मी कारिन्दे बर्खास्त कर दिए गए।



कवि लेखक और पत्रकार



पथिक जी क्रांतिकारी व सत्याग्रही होने के अलावा कवि, लेखक और पत्रकार भी थे। अजमेर से उन्होंने नव संदेश और राजस्थान संदेश के नाम से हिन्दी के अखबार भी निकाले। तरुण राजस्थान नाम के एक हिन्दी साप्ताहिक में वे राष्ट्रीय पथिक के नाम से अपने विचार भी व्यक्त किया करते थे। पूरे राजस्थान में वे राष्ट्रीय पथिक के नाम से अधिक लोकप्रिय हुए।



उनकी कुछ पुस्तकें इस प्रकार हैं:



अजय मेरु (उपन्यास),



पथिक प्रमोद (कहानी संग्रह),



पथिकजी के जेल के पत्र एवं



पथिक की कविताओं का संग्रह



गांधीजी का उनके बारे में कहना था-और लोग सिर्फ़ बातें करते हैं परंतु पथिक एक सिपाही की तरह काम करता है। उनके काम को देखकर ही उन्हें राजपूताना व मध्य भारत की प्रांतीय कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था।



भारत सरकार ने विजय सिंह पथिक की स्मृति में डाक टिकट भी जारी किया। उनकी लिखी हुई कविता की ये पंक्तियाँ बहुत लोकप्रिय हुई थीं :



निधन



पथिक जी जीवनपर्यन्त निःस्वार्थ भाव से देश सेवा में जुटे रहे। भारत माता का यह महान सपूत 28 मई 1954 में चिर निद्रा में सो गया। पथिक जी की देशभक्ति निःस्वार्थ थी और जब वह मरे उनके पास सम्पत्ति के नाम पर कुछ नहीं था जबकि तत्कालीन सरकार के कई मंत्री उनके राजनैतिक शिष्य थे। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री श्री शिवचरण माधुर ने पथिक जी का वर्णन राजस्थान की जागृति के अग्रदूत महान क्रान्तिकारी के रूप में किया। पथिक जी के नेतृत्व में संचालित हुए बिजौलिया आन्दोलन को इतिहासकार देश का पहला किसान सत्याग्रह मानते हैं।



Comments भरत on 12-05-2019

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