भारतीय गणित का इतिहास

Bharateey Gannit Ka Itihas

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GkExams on 08-02-2019


सभी प्राचीन सभ्यताओं में गणित विद्या की पहली अभिव्यक्ति गणना प्रणाली के रूप में प्रगट होती है। अति प्रारंभिक समाजों में संख्यायें रेखाओं के समूह द्वारा प्रदर्शित की जातीं थीं। यद्यपि बाद में, विभिन्न संख्याओं को विशिष्ट संख्यात्मक नामों और चिह्नों द्वारा प्रदर्शित किया जाने लगा, उदाहरण स्वरूप भारत में ऐसा किया गया। रोम जैसे स्थानों में उन्हें वर्ण, किंतु सभी प्राचीन सभ्यताओं में संख्याएं दशमाधार प्रणाली पर आधारित नहीं थीं। प्राचीन बेबीलोन में 60 पर आधारित संख्या-प्रणाली का प्रचलन था।


भारत में गणित के इतिहास को मुख्यता 5 कालखंडों में बांटा गया है-

  • 1. आदि काल (500 इस्वी पूर्व तक)
  • (क) वैदिक काल (1000 इस्वी पूर्व तक)- शून्य और दशमलव की खोज
  • (ख) उत्तर वैदिक काल (1000 से 500 इस्वी पूर्व तक) इस युग में गणित का भारत में अधिक विकास हुआ। इसी युग में बोधायन शुल्व सूत्र की खोज हुई जिसे हम आज पाइथागोरस प्रमेय के नाम से जानते है।
  • 2. पूर्व मध्य काल – sine, cosine की खोज हुई।
  • 3. मध्य काल – ये भारतीय गणित का स्वर्ण काल है। आर्यभट्ट, श्रीधराचार्य, महावीराचार्य आदि श्रेष्ठ गणितज्ञ हुए।
  • 4. उत्तर-मध्य काल (1200 इस्वी से 1800 इस्वी तक) - नीलकण्ठ ने 1500 में sin r का मान निकालने का सूत्र दिया जिसे हम अब ग्रेगरी श्रेणी के नाम से जानते हैं।
  • 5. वर्तमान काल - रामानुजम आदि महान गणितज्ञ हुए।



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