शैशवावस्था का अर्थ

Shaishavavastha Ka Arth

Gk Exams at  2018-03-25


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GkExams on 12-05-2019

सामान्यता: मनोवैज्ञानिकों ने शैशवावस्था का अर्थ उस अवस्था से लगाया जो औसतन जन्म से 5-6 वर्ष तक चलती है। एडलर के अनुसार “शैशवावस्था द्वारा जीवन का पूरा क्रम नििश्न्चत होता है। शैशवावस्था में विशेषकर जन्म से 3 वर्ष तक की आयु होने के दौरान शारीरिक विकास की गति अत्यंत तीव्र रहती है। शैशवावस्था में होने वाले शारीरिक विकास से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण तथ्य अधोलिखित हैं।

1. कोमल अंग - जन्म के पश्चात शिशु आरै उसके अगं कामे ल एवं निबर्ल होते है। माता-पिता पर वह सभी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु आश्रित रहता है।



2. लम्बाई व भार - जन्म के समय शिशु की लम्बाई लगभग 51 सेमी0 होती है। प्राय: बालक जन्म के समय बालिकाओं से लगभग आधा सेमीण् अधिक लम्बे होते है। शैशवावस्था के विभिन्न वर्षो में बालक-बालिका की लम्बाई (सेमी0 में) निम्नांकित तालिका में दर्शाई गयी है।





3. मस्तिष्क तथा सिर- नवजात का सिर उसके शरीर की अपेक्षा बडा़ होता है। जन्म के समय सिर की लम्बाई कुल शरीर की लगभग एक चौथाई होती है। मस्तिष्क का भार जन्म के समय लगभग 300-350 ग्राम होता है।



4. दाँत- जन्म के समय शिशु के दाँत नही हाते है लगभग छठे या सातवे माह में अस्थायी दूध के दाँत निकलने लगते है। एक वर्ष की आयु तक दूध के सभी दाँत निकल आते है



5. हड्डियाँ - कई मनावेज्ञैानिको ने यह स्पष्ट रूप से कहा है कि शिशु की बनावट और उसकी हड्डियों के परिपक्व होने की गति के मध्य एक सम्बन्ध होता है। जिनका शरीर अधिक मजबूत और गठीला होता है, उनके शरीर की हड्डियों में परिपवक्ता तेजी से आती है।



6. स्नायु विकास- स्नायु मण्डल तथा स्नायकु ने दा्रें का विकास भी 3 वर्ष तक शीघ्रता से होता है।



7. माँसपेशियाँ - नवजात शिशु की माँसपेिशयो का भार उसके शरीर के कुल भार का लगभग 23 प्रतिशत होता है। माँसपेशियों के प्रतिशत भार में धीरे-धीरे बढ़ोत्तरी होती जाती है।



8. अन्य अंग - शिशु की भुजाओं तथा टांगो का विकास भी तीव्र गति से होता है। जन्म के समय शिशु के हृदय की धड़कन अनियमित होती है। कभी वह तीव्र हो जाती है तथा कभी धीमी हो जाती है। जैसे-जैसे हृदय बड़ा होता है वैसे-वैसे धड़कन में स्थिरता आ जाती है।



9. समस्त प्रणालियों का विकास - जन्म के पश्चात शरीर की समस्त प्रणालियों में विकास होता है, माँसपेशियां, स्नायुतन्त्र, रक्तसंचार-क्रिया आदि का उत्तरोतर विकास होता है।



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