महाकालेश्वर मंदिर का रहस्य

MahaKaleshwar Mandir Ka Rahasya

Pradeep Chawla on 23-10-2018

भगवान शिव को समर्पित यह स्वयंभू ज्योतिर्लिंग मंदिर मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में बना है। इस मंदिर का कई पौराणिक ग्रंथों में काफी सुंदर वर्णन मिलता है। देश-दुनिया से यहां सभी महाकाल यानी भगवान शिव के दर्शन हेतू पूरे साल आते रहते हैं, मगर कुंभ के दौरान यहां लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इसके साथ ही मान्यताओं के अनुसार, मंदिर से जुड़ी कई किंवदंती भी प्रचलित हैं। जिस कारण से यह मंदिर, पर्यटकों की सूची में सबसे ऊपर आता है। आइए, जानते हैं क्या है महाकालेश्वर मंदिर से जुड़े रहस्य, जिन्हें आज तक कोई नहीं भेद सका.

ऐसा है निर्माण

भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में भक्तों को दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग के दर्शन होते हैं। महाकालेश्वर मंदिर मुख्य रूप से तीन हिस्सों में विभाजित है। इसके ऊपरी हिस्से में नाग चंद्रेश्वर मंदिर है, नीचे ओंकारेश्वर मंदिर और सबसे नीचे जाकर आपको महाकाल मुख्य ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजित नजर आते हैं। जहां आपको भगवान शिव के साथ ही गणेशजी, कार्तिकेय और माता पार्वती की मूर्तियों के भी दर्शन होते हैं। इसके साथ ही यहां एक कुंड भी है जिसमें स्नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं।


ऐसे हुए थे प्रकट

मान्यताओं के अनुसार, उज्‍जैन में महाकाल के प्रकट होने से जुड़ी एक कथा है। दरअसल दूषण नामक असुर से प्रांत के लोगों की रक्षा के ल‌िए महाकाल यहां प्रकट हुए थे। फिर जब दूषण का वध करने के बाद भक्तों ने श‌िवजी से उज्‍जैन में ही वास करने की प्रार्थना की तो भगवान शिव महाकाल ज्योत‌िर्ल‌िंग के रूप में प्रकट हुए। ऐसे उज्जैन का शास्त्रों में वर्णन भगवान श्रीकृष्ण को लेकर भी मिलता है, क्योंकि उनकी शिक्षा यहीं हुई थी।

इसलिए है इतना प्रसिद्ध

उज्जैन को प्राचीनकाल से ही एक धार्मिक नगरी की उपाधि प्राप्त है। आज भी यहां भारी संख्या में दर्शन के लिए भक्त आते हैं। दरअसल भगवान महाकाल की भस्म आरती के दुर्लभ पलों का साक्षी बनने का ऐसा सुनहरा अवसर और कहीं नहीं प्राप्त होता है। ऐसा माना जाता है कि जो इस आरती में शामिल हो जाए उसके सभी कष्ट दूर होते हैं, इसके बिना आपके दर्शन पूरे भी नहीं माने जाते हैं। इसके अलावा यहां नाग चंद्रेश्वर मंदिर और महाकाल की शाही सवारी आदि भी पर्यटकों में जिज्ञासा का विषय बने रहे हैं।

क्यों होती है भस्म आरती

हर सुबह महाकाल की भस्म आरती करके उनका श्रृंगार होता है और उन्हें ऐसे जगाया जाता है। इसके लिए वर्षों पहले शमशान से भस्म लाने की परंपरा थी, हालांकि पिछले कुछ वर्षों से अब कपिला गाय के गोबर से बने कंडे, शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलतास और बेर की लकड़‌ियों को जलाकर तैयार क‌िए गए भस्‍म को कपड़े से छानने के बाद इस्तेमाल करना शुरू हो चुका है। केवल उज्जैन में आपको यह आरती देखने का सुनहरा अवसर प्राप्त होता है। दरअसल भस्म को सृष्टि का सार माना जाता है, इसलिए प्रभु हमेशा इसे धारण किए रहते हैं।

यह है खास नियम

यहां के नियमानुसार, महिलाओं को आरती के समय घूंघट करना पड़ता है। दरअसल महिलाएं इस आरती को नहीं देख सकती हैं। इसके साथ ही आरती के समय पुजारी भी मात्र एक धोती में आरती करते हैं। अन्य किसी भी प्रकार के वस्त्र को धारण करने की मनाही रहती है। महाकाल की भस्म आरती के पीछे एक यह मान्यता भी है कि भगवान शिवजी श्मशान के साधक हैं, इस कारण से भस्म को उनका श्रृंगार-आभूषण माना जाता है। इसके साथ ही ऐसी मान्यता है कि ज्योतिर्लिंग पर चढ़े भस्म को प्रसाद रूप में ग्रहण करने से रोग दोष से भी मुक्ति मिलती है।

भगवान शिव को समर्पित यह स्वयंभू ज्योतिर् ..

भगवान शिव को समर्पित यह स्वयंभू ज्योतिर् ..

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Comments chitranjan gangare on 12-05-2019

Mah kalasvr mandir rhsy

Kajal on 12-05-2019

Mahakaleswar mandir ki sthapna kisne ki



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