मेरा हरियाणा निबंध

Mera Hariyana Nibandh

Gk Exams at  2018-03-25


Go To Quiz

Pradeep Chawla on 12-05-2019


भारतीय गणतन्त्र में, एक अलग राज्य के रूप में, हरियाणा की स्थापना यद्यपि 1 नवम्बर, 1966 को हुई, किन्तु एक विशिष्ट ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक इकाई के रूप में हरियाणा का अस्तित्व प्राचीन काल से मान्य रहा है। यह राज्य आदिकाल से ही भारतीय संस्कृति और सभ्यता की धुरी रहा है। मनु के अनुसार इस प्रदेश का अस्तित्व देवताओं से हुआ था, इसलिए इसे 'ब्रह्मवर्त' का नाम दिया गया था।



हरियाणा के विषय में वैदिक साहित्य में अनेक उल्लेख मिलते हैं। इस प्रदेश में की गई खुदाईयों से यह ज्ञात होता है कि सिंधु घाटी सभ्यता और मोहनजोदड़ों संस्कृति का विकास यहीं पर हुआ था।



शास्त्र-वेत्तओं, पुराण-रचयिताओं एवं विचारकों ने लम्बे समय तक इस ब्रह्मर्षि प्रदेश की मनोरम गोद में बैठकर ज्ञान का प्रसार अनेक धर्म-ग्रन्थ लिखकर किया। उन्होने सदा मां सरस्वती और पावन ब्रह्मवर्त का गुणगान अपनी रचनाओं में किया।



इस राज्य को ब्रह्मवर्त तथा ब्रह्मर्षि प्रदेश के अतिरिक्त ' ब्रह्म की उत्तरवेदी' के नाम से भी पुकारा गया। इस राज्य को आदि सृष्टि का जन्म-स्थान भी माना जाता है। यह भी मान्यता है कि मानव जाति की उत्पत्ति जिन वैवस्तु मनु से हुई, वे इसी प्रदेश के राजा थे। ष्अवन्ति सुन्दरी कथाष् में इन्हें स्थाण्वीश्वर निवासी कहा गया है। पुरातत्वेत्ताओं के अनुसार आद्यैतिहासिक कालीन-प्राग्हड़प्पा, हड़प्पा, परवर्ती हड़प्पा आदि अनेक संस्कृतियों के अनेक प्रमाण हरियाणा के वणावली, सीसवाल, कुणाल, मिर्जापुर, दौलतपुर और भगवानपुरा आदि स्थानों के उत्खननों से प्राप्त हुए हैं।



भरतवंशी सुदास ने इस प्रदेश से ही अपना विजय अभियान प्रारम्भ किया और आर्यो की शक्ति को संगठित किया। यही भरतवंशी आर्य देखते-देखते सुदूर पूर्व और दक्षिण में अपनी शक्ति को बढ़ाते गये। उन्ही वीर भरतवंशियों के नाम पर ही तो आगे चल कर पूरे राष्ट्र का नाम 'भरत' पड़ा।



महाभारत-काल से शताब्दियों पर्व आर्यवंशी कुरूओं ने यही पर कृषि-युग का प्रारम्भ किया। पौराणिक कथाओं के अनुसार उन्होने आदिरूपा माँ सरस्वती के 48 कोस के उपजाऊ प्रदेश को पहले-पहल कृषि योग्य बनाया। इसलिए तो उस 48 कोस की कृषि-योग्य धरती को कुरूओं के नाम पर कुरूक्षेत्र कहा गया जो कि आज तक भी भारतीय संस्कृति का पवित्र प्रदेश माना जाता है।



बहुत बाद तक सरस्वती और गंगा के बीच बहुत बड़े भू-भाग को 'कुरू प्रदेश' के नाम से जाना जाता रहा। महाभारत का विश्व-प्रसिद्व युद्व कुरूक्षेत्र में लड़ा गया। इसी युद्ध के शंखनादों के स्वरों के बीच से एक अद्भुत स्वर उभरा। वह स्वर था युगपुरूष भगवान कृष्ण का, जिन्होने गीता का उपदेश यहीं पर दिया था, गीता जो भारतीय संस्कृति के बीच मंत्र के रूप में सदा-सदा के लिए अमर हो गई।



महाभारत-काल के बाद एक अंधा युग शुरू हुआ जिसके ऐतिहासिक यथार्थ का ओर-छोर नहीं मिलता। परन्तु इस क्षेत्र के आर्यकुल अपनी आर्य परम्पराओं को अक्षुण्ण रखते हुए बाहर के आक्रांताओं से टकराते रहे। पुरा कुरू-प्रदेश गणों और जनपदों में बंटा हुआ था। कोई राजा नहीं होता था। गणाधिपति का चुनाव बहुमत से होता था। उसे गणपति की उपाधि दी जाती थी, सेनापति का चुनाव हुआ करता था, जिसे 'इन्दु' कहा जाता था। कालांतर तक यह राज-व्यवस्था चलती रही। इन गणों और जनपदों ने सदैव तलवार के बल पर अपने गौरव को बनाए रखा।



आर्यकाल से ही यहाँ के जनमानव ने गण-परम्परा को बेहद प्यार किया था। गांव के एक समूल को वे जनपद कहते थै। जनपद की शासन-व्यवस्था ग्रामों से चुने गये प्रतिनिधि संभालते थे। इसी प्रकार कई जनपद मिलकर अपना एक 'गण' स्थापित करते थे। 'गण' एक सुव्यवस्थित राजनैतिक ईकाई का रूप लेता था। 'गणसभा' की स्थापना जनपदों द्वारा भेजे गये सदस्यों से सम्पन्न होती थी।



यह भी देखा गया है कि इस तरह के कई 'गण' मिलकर अपना एक संघ बनाया करते थे, जिसे गण-संघ के रूप में जाना जाता था। यौधेय काल में इसी तरह कई गणराज्यों के संगठन से एक विशाल 'गण-संघ' बनाया गया था जो शतुद्रु से लेकर गंगा तक के भूभाग पर राज्य करता था।



राज्य-प्रबन्ध की यह व्यवस्था केवल मात्र राजनीतिक नहीं थी, सामाजिक जीवन में भी इस व्यवस्थाने महत्वपूर्ण स्थान ले लिया था। यही कारण था कि पूरे देश में जब गणराज्यों की यह परम्परा साम्राज्यवादी शक्तियों के दबाव से समाप्त हो गई तब भी हरियाणा प्रदेश के जनमानस ने इसे सहेजे रखा।



इस प्रदेश की महानगरी दिल्ली ने अनेक साम्राज्यों के उत्थान-पतन देखे परन्तु यहां के जन-जीवन में उन सब राजनैतिक परिवर्तनों का बहुत अधिक प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि अपनी आन्तरिक-सामाजिक व्यवस्था में कभी भी इन लोगों ने बाह्म हस्तक्षेप सहन नहीं कया।



इनकी गण-परम्परा को शासकों ने भी सदा मान्यता दी। हर्षकाल से लेकर मुगल-काल के अंत तक हरियाणा की सर्वोच्च पंचायत की शासन की ओर से महत्व दिया जाता रहा। सर्वशाप पंचायत के पुराने दस्तावेजों से पता चलता है कि मुगल शासकों की ओर सेे सर्वखाप पंचायत के प्रमुख को 'वजीर' की पदवी दी जाती थी और पंचायत के फैसलों को पूरी मान्यता मिलती थी। मुगल-काल में जनपदों का स्थान खापों ने और गणों का स्थान सर्वखाप पंचायतों ने ले लिया था। सर्वखाप पंचायत की सत्ता को सतलुज से गंगा तक मान्यता प्राप्त रही है।




Comments

आप यहाँ पर मेरा gk, हरियाणा question answers, निबंध general knowledge, मेरा सामान्य ज्ञान, हरियाणा questions in hindi, निबंध notes in hindi, pdf in hindi आदि विषय पर अपने जवाब दे सकते हैं।

Total views 673
Labels: , , ,
अपना सवाल पूछेंं या जवाब दें।

Comment As:

अपना जवाब या सवाल नीचे दिये गए बॉक्स में लिखें।

Register to Comment