Pratyavarti Dhara Ke Upyog प्रत्यावर्ती धारा के उपयोग

प्रत्यावर्ती धारा के उपयोग



GkExams on 18-09-2022


प्रत्यावर्ती धारा के बारें में (Alternating Current In Hindi) : प्रत्यावर्ती धारा वह धारा है जो किसी विद्युत परिपथ में अपनी दिशा बदलती रहती हैं। इसके विपरीत दिष्ट धारा समय के साथ अपनी दिशा नहीं बदलती। आपको बता दे की घरों में प्रयुक्त प्रत्यावर्ती धारा की आवृत्ति 50 हर्ट्ज़ होती है इसका मतलब ये हुआ की यह एक सेकेण्ड में 50 बार अपनी दिशा बदलती है।


वर्तमान की बदलती दिशा के कारण, इलेक्ट्रोलाइट में धातु के आयन इलेक्ट्रोड के बीच चमकते रहते हैं जो ध्रुवीयता को बदलते रहते हैं। इसलिए एसी धारा (Alternating Current) का इस्तेमाल विद्युत आवरण के लिए नहीं किया जा सकता है। यांत्रिक ऊर्जा के ताप, प्रकाश और उत्पादन के उद्देश्य से हम प्रत्यावर्ती (ac current full form) धारा का उपयोग कर सकते हैं।


प्रत्यावर्ती धारा के उपयोग :




यहाँ हम आपको निम्नलिखित बिन्दुओं द्वारा प्रत्यावर्ती धारा के उपयोगों (frequency of ac current) से अवगत करा रहे है, जो इस प्रकार है..


  • इस धारा का उपयोग मोटरों व समरसीबल चलाने में किया जाता है।
  • इसका उपयोग ऊष्मा प्राप्त करने के लिए हीटर चलाने में किया जाता है।
  • प्रत्यावर्ती धारा का उपयोग टी.वी./एल.सी.डी. व डीटीएच इत्यादि को चलाने में किया जाता है।



  • प्रत्यावर्ती धारा जनित्र का सिद्धांत :




    सबसे पहले तो आपको बता दे की प्रत्यावर्ती धारा जनित्र के चार भाग होते हैं..


    1. क्षेत्र चुम्बक (field magnet) :




    इसे एक अति शक्तिशाली नाल के आकार का चुम्बक NS होता हैं जिसे क्षेत्र चुम्बक कहते हैं।


    2. आर्मेचर या कुण्डली (armature or coil) :




    यह कच्चे लोहे के ढाँचे पर लिपटी विद्युत रोधी तांबे की कुण्डली PQRS होती हैं।


    3. सर्पीवलय (slip ring) :




    इसमें कुण्डली के सिरे A व D को अलग - अलग पृथक्कित धात्विक वलय S1 व S2 से जोड़ दिये जाते हैं। ये वलय कुण्डली के घूमने से उसके साथ - साथ घूमते हैं।


    4. ब्रुश ( Brushes) :




    ये कार्बन या किसी धातु की पत्तियों से बने दो ब्रुश होते हैं। जिनका एक सिरा तो वलयों को स्पर्श करता हैं तथा दूसरा सिरों को बाहरी परिपथ से सयोजित कर दिया जाता हैं।


    कार्य विधि :




    Pratyavarti-Dhara-Ke-Upyog


    जब आर्मेचर को यांत्रिक ऊर्जा देकर धुमाया जाता है तो कुडण्ली ABCD से पारित चुम्बकीय फ्लक्स में लगातार परिवर्तिन होता हैं जिससे कुण्डली के सिरो के बीच प्रेरित धारा बहती है और जब कुण्डली को दक्षिणावर्त घुमाते हैं कुण्डली का तल बार - बार चुम्बकीय क्षेत्र के समान्तर व लम्बवत् होता हैं। चूँकि प्रथम आधे च्रक में फ्लक्स की मात्रा घटती हैं, इस प्रकार प्रथम आधे घूर्णन में धारा की दिशा बाह्य परिपथ में दक्षिणावर्त होती है और अगले आधे घूर्णन में वामावर्त होती हैं।


    अर्थात् प्रथम आधे च्रक में बाह्य परिपथ में धारा B1 व B2 की और शेष आधे च्रक में B2 व B1 की ओर बहती हैं। इस प्रकार आर्मेचर के पूर्व घूर्णन में निश्चिश्त कालांतर के बाद धारा की दिशा बदलती हैं तथा इस दौरान धारा का मान भी नियमित रूप से बदलता है ऐसी धारा प्रत्यावर्ती धारा (what is ac voltage) कहलाती हैं। प्रत्यावर्ती धारा जनित्र से उत्पन्न धारा का मान कुण्डली में फेरों की संख्या,कुडण्ली के क्षेत्रफल,घूर्णन वेग व चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता पर निर्भर करता हैं।




    सम्बन्धित प्रश्न



    Comments Arsi patel on 30-08-2021

    Prativari dhara ke upyog ka varan kren

    R 1 on 16-09-2020

    प्रत्यवर्ती dhara ka main use kya hai

    Vivek Singh Gusain on 11-03-2020

    Pratyavarti Dhara ki upyogon ka vargikara Karen






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