राजस्थानी भाषा शब्दकोश

Rajasthani Bhasha Shabdkosh

Pradeep Chawla on 22-10-2018


राजस्थानी भाषा भारतीय-आर्य भाषाओं तथा बोलियों का समूह है, जो भारत के राजस्थान राज्य में बोली जाती हैं। यह भाषा हिन्दी की एक प्रमुख उपभाषा है। राजस्थानी भाषा अपनी शब्दावली का लगभग 80% हिन्दी से ग्रहण करती है, जबकि 20% शब्द स्थानीय होते हैं। इसके चार प्रमुख वर्ग हैं: पूर्वोत्तर मेवाती, दक्षिणी मालवी, पश्चिम मारवाड़ी, और पूर्वी-मध्य जयपुरी, इनमें से मारवाड़ी भौगोलिक दृष्टि से सबसे व्यापक है। राजस्थान पूर्व के हिन्दी क्षेत्रों तथा दक्षिण-पश्चिम में गुजराती क्षेत्रों के बीच स्थित संक्रमण क्षेत्र है। राजस्थानी भाषाओं को भारत के संविधान में सरकारी भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं है। इसके स्थान पर हिन्दी का उपयोग सरकारी भाषा के रूप में होता है।

राजस्थान की प्रमुख बोलियाँ

भारत के अन्य राज्यों की तरह राजस्थान में कई बोलियाँ बोली जाती हैं। वैसे तो समग्र राजस्थान में हिन्दी बोली का प्रचलन है लेकिन लोक-भाषाएँ जन सामान्य पर ज़्यादा प्रभाव डालती हैं। जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने राजस्थानी बोलियों के पारस्परिक संयोग एवं सम्बन्धों के विषय में वर्गीकरण किया है। ग्रियर्सन का वर्गीकरण इस प्रकार है :-

  • पश्चिमी राजस्थान में बोली जाने वाली बोलियाँ - मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढारकी, बीकानेरी, बाँगड़ी, शेखावटी, खेराड़ी, मोड़वाडी, देवड़ावाटी आदि।
  • उत्तर-पूर्वी राजस्थानी बोलियाँ - अहीरवाटी और मेवाती।
  • मध्य-पूर्वी राजस्थानी बोलियाँ - ढूँढाड़ी, तोरावाटी, जैपुरी, काटेड़ा, राजावाटी, अजमेरी, किशनगढ़, नागर चोल, हड़ौती।
  • दक्षिण-पूर्वी राजस्थान - रांगड़ी और सोंधवाड़ी
  • दक्षिण राजस्थानी बोलियाँ - निमाड़ी आदि।

बोलियाँ जहाँ बोली जाती हैं

मारवाड़ी

मुख्य लेख : मारवाड़ी बोली

राजस्थान के पश्चिमी भाग में मुख्य रूप से मारवाड़ी बोली सर्वाधिक प्रयोग की जाती है। यह जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर और शेखावटी में बोली जाती है। यह शुद्ध रूप से जोधपुर क्षेत्र की बोली है। बाड़मेर, पाली, नागौर और जालौर ज़िलों में इस बोली का व्यापक प्रभाव है। मारवाड़ी बोली की कई उप-बोलियाँ भी हैं जिनमें ठटकी, थाली, बीकानेरी, बांगड़ी, शेखावटी, मेवाड़ी, खैराड़ी, सिरोही, गौड़वाडी, नागौरी, देवड़ावाटी आदि प्रमुख हैं। साहित्यिक मारवाड़ी को डिंगल कहते हैं। डिंगल साहित्यिक दृष्टि से सम्पन्न बोली है।

मेवाड़ी

मुख्य लेख : मेवाड़ी

यह बोली दक्षिणी राजस्थान के उदयपुर, भीलवाड़ा और चित्तौड़गढ़ ज़िलों में मुख्य रूप से बोली जाती है। इस बोली में मारवाड़ी के अनेक शब्दों का प्रयोग होता है। केवल ए और औ की ध्वनि के शब्द अधिक प्रयुक्त होते हैं।

बाँगड़ी

मुख्य लेख : बाँगड़ी बोली

यह बोली डूंगरपुर व बाँसवाड़ा तथा दक्षिणी-पश्चिमी उदयपुर के पहाड़ी क्षेत्रों में बोली जाती हैं। गुजरात की सीमा के समीप के क्षेत्रों में गुजराती-बाँगड़ी बोली का अधिक प्रचलन है।

धड़ौती

इस बोली का प्रयोग झालावाड़, कोटा, बूँदी ज़िलों तथा उदयपुर के पूर्वी भाग में अधिक होता है।

मेवाती

मुख्य लेख : मेवाती बोली

यह बोली राजस्थान के पूर्वी ज़िलों मुख्यतः राजस्थान, उत्तर प्रदेश, दिल्ली आदि में इस अक्षर का बोलने में ख़ूब प्रयोग होता है। उसका उच्चारण 'ल' और 'ड़' के बीच का है। कुछ नमूने नीचे देखिये - हिन्दी रूप कोष्ठ में लिखे गए हैं।

  • फळ (फल)
  • हळ (हल)
  • थाळी (थाली)
  • काळा (काला)
  • साळा (साला)
  • हड़ताळ (हड़ताल)
  • भोळा (भोला)
  • गळा (गला)

अक्षर "ण (ṇ)" का प्रयोग

राजस्थानी, हरयाणवी भाषा में अक्षर 'ण (ṇ)' का ख़ूब प्रयोग होता है, हालांकि हिन्दी में इसका प्रयोग कम है। हिन्दी में 'ण (ṇ)' के स्थान पर 'न (n)' प्रयोग होता है। कुछ उदाहरण देखिये:-

  • थाणा (थाना)
  • काणा (काना)
  • पाणी (पानी)
  • स्याणा (सयाना)
  • दाणा (दाना)
  • घणा (घना)
  • भाण (बहन)
  • सुणाओ (सुनाओ)
  • पिछाण (पहचान)
  • बजाणा (बजाना)

अक्षर 'र्' का प्रयोग

राजस्थानी, हरयाणवी भाषा में अक्षर 'र्' का प्रयोग क्रियाओं के साथ बहुतायत से होता है। हिन्दी में इस तरह का प्रयोग नहीं होता है। हिन्दी में 'र्' का प्रयोग होने पर या तो इसको ऊपर चढ़ा देते हैं जैसे 'कर्म' अथवा नीचे जोड़ते हैं जैसे 'क्रिया'। कुछ उदाहरण देखिये:-

  • क र् या
  • ध र् या
  • खा र् या
  • पी र् या
  • जा र् या
  • आ र् या

राजस्थानी भाषा की विशेषताएँ

राजस्थानी भाषा की सामान्य विशेषताएँ निम्न हैं-

  • राजस्थानी में 'ण', 'ड़' और (मराठी) 'ल' तीन विशिष्ट ध्वनियाँ (Phonemes) पाई जाती हैं।
  • राजस्थानी तद्भव शब्दों में मूल संस्कृत 'अ' ध्वनि कई स्थानों पर 'इ' तथा 'इ' 'उ' के रूप में परिवर्तित होती देखी जाती हैं-'मिनक' (मनुष्य), हरण (हरिण), 'कमार' (कुंभकार)।
  • मेवाडी और मालवी में 'च', 'छ', 'ज', 'झ' का उच्चारण भीली और मराठी की तरह क्रमश: 'त्स', 'स', 'द्ज', 'ज़' की तरह पाया जाता है।
  • संस्कृत हिन्दी पदादि 'स-ध्वनि' पूर्वी राजस्थानी में तो सुरक्षित है, किंतु मेवाड़ी-मालवी-मारवाड़ी में अघोष 'ह्ठ' हो जाती है। जैसे हि. सास, जैपुरी-हाडौती 'सासू', मेवाड़ी-मारवाड़ी 'ह्ठाऊ'।
  • पदमध्यगत हिन्दी शुद्ध प्राणध्वनि या महाप्राण ध्वनि की प्राणता राजस्थानी में प्राय: पदादि व्यंजन में अंतर्भुक्त हो जाती है-हिं. कंधा, रा. खाँदो; हि. पढना, रा. फढ-बो।
  • राजस्थानी के सबल पुलिंग शब्द हिन्दी की तरह आकारांत न होकर ओकारांत है :-हि. घोड़ा, रा. घोड़ी, हिं. गधा, रा. ग"द्दो, हिं. मोटा, रा. मोटो।
  • पश्चिमी राजस्थानी में संबंध कारक के परसर्ग 'रो-रा-री' हैं, किंतु पूर्वी राजस्थानी में ये हिन्दी की तरह 'को-का-की' हैं।
  • जैपुरी-हाड़ौती में 'नै' परसर्ग का प्रयोग कर्मवाच्य भूतकालिक कर्ता के अतिरिक्त चेतन कर्म तथा संप्रदान के रूप में भी पाया जाता है-'छोरा नै छोरी मारी' (लड़के ने लड़की मारी); 'म्हूँ छोरा नै मारस्यूँ' (मैं लड़के को पीटूँगा;-चेतन कर्म); 'यो लाडू छोरा नै दे दो' (यह लड्डू लड़के को दे दो-संप्रदान)।
  • राजस्थानी में उत्तम पुरुष के श्रोतृ-सापेक्ष 'आपाँ-आपण' ओर श्रोतृ निरपेक्ष 'महे-म्हें-मे' दुहरे रूप पाए जाते हैं।
  • हिन्दी की तरह राजस्थानी के वर्तमानकालिक क्रिया रूप सहायक क्रियायुक्त शतृप्रत्ययांत विकसित रूप न होकर शुद्ध तद्भव रूप हैं। 'मूँ जाऊँ छूँ' (मैं जाता हूँ)।
  • सहायक क्रिया के रूप पश्चिमी राजस्थानी में 'हूं-हाँ-हो-है' (वर्तमान) और 'थो-थी-था' (भूतकाल) हैं, किंतु पूर्वी राजस्थानी में 'छूँ-छाँ-छो-छै' (वर्तमान) और 'छो-छी-छा' (भूतकाल) हैं।
  • राजस्थानी में तीन प्रकार के भविष्यत्कालिक रूप पाए जाते हैं :-जावैगो, जासी, जावैलो। इनमें द्वितीय रूप संस्कृत के भविष्यत्कालिक तिङंत रूपों का विकास हैं-'जासी' (यास्यति), जास्यूँ (यास्यामि)।
  • राजस्थानी की अन्य पदरचनात्मक विशेषता पूर्वकालिक क्रिया के लिए 'र' प्रत्यय का प्रयोग है : -'ऊ-पढ़-र रोटी ख़ासी' (वह पढ़कर रोटी खाएगा)।
  • राजस्थानी की वाक्यरचनागत विशेषताओं में प्रमुख उक्तिवाचक क्रिया के कर्म के साथ संप्रदान कारक का प्रयोग है, जबकि हिन्दी में यहाँ 'करण या अपादान' का प्रयोग देखा जाता है। 'या बात ऊँनै कह दो' (यह बात उससे कह दो)। पूर्वी राजस्थानी में हिन्दी के ही प्रभाव से संप्रदानगत प्रयोगके अतिरिक्त विकल्प से कारण-अपादानगत प्रयोग भी सुनाई पड़ता है-'या बात ऊँ सूँ कह दो'।



Comments धर्मपाल on 12-04-2021

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Chandrmohan saini on 06-04-2021

आसा रा दीवा राजस्थानी शब्द का हिन्दी अनुवाद क्या है

Arsad on 26-03-2021

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Kiran on 17-03-2021

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Rahul on 08-03-2021

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मोकडी on 03-03-2021

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Krishna on 12-02-2021

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महेंद्र on 23-01-2021

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जाचो on 12-01-2021

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Local ko rajasthani mai kya kahte hain

J on 25-09-2020

How are you how to speck in rejeshthani

Sheetal on 22-09-2020

Akhada Shabd ka matalab hindi me


Ladharam JOGAL on 30-08-2020

खपसी या डांगों ओर क्या कहते है

aditya rathore on 24-08-2020

पाणी जब गले मे अटक जाता है, उस स्थिति को असलुंण बोलते है या ओर कुछ

Kiran on 09-08-2020

Darsothan ko rajasthani bhasha me kya khte h

Jitendra Singh Rathore on 26-07-2020

राजस्थानी भाषा में मुगजी किसे कहा जाता है

Manohar lal vyas on 21-07-2020

जब झूला ऊपर जाता है,तो उसे मारवाड़ी म क्या कहते है

श्याम on 04-06-2020

हाल्यू


Bharat on 22-05-2020

राजस्थान भाषा का शब्द कोश

Rudraksh on 17-05-2020

Muskarane ko kya kahte h rajasthani m

Nikhil on 26-04-2020

Ajwain ko Rajasthani word mein kya kahate Hain

अशोक on 20-04-2020

खीचडा़ क्या है?

Haily Dalvi on 15-04-2020

दल बादल बीच चमके जी तारा - २ की,
सांझ पड़या पिहूजी लागे ओ प्यारा -२
काई रे जवाब करों रसिया
ओ कीको रे मिजाज पढूं रसिया


Prem Singh Mahanot on 31-03-2020

मूर्ख को राजस्थानी में क्या कहते हैं

महिपाल on 01-03-2020

राजस्थानी भाषा का शब्द कोष तैयार किया था

राजस्थानी भाषा का शब्दकोश नामक गन्थ किसने लिखा on 17-01-2020

राजस्थानी भाषा का शब्दकोश नामक गन्थ किसने लिखा

Ambuj tyagi on 16-01-2020

चेतना या जागरूकता को राजस्थानी भाषा मे क्या कहेंगें।

Kagasiya on 07-12-2019

Plz yaha hotha hwi Rajasthan i me

लाह किसे कहते है on 12-09-2019

लाह किसे कहते है

Ram parkash on 30-04-2019

Vevda ka mining


Renu on 07-02-2019

Ledha

लूणो का अर्थ} on 17-09-2018

लूणो}

Rajesh on 12-09-2018

Mean of singara



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