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Rajesh Kumar at  2018-08-27  at 09:30 PM
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राजस्थानी चित्रकला का आरम्भ

राजस्थानी चित्रकला अपनी प्राचीनता के लिए जाना जाता है। अनेक प्राचीन साक्ष्य नि:सदेह इसके वैभवशाली अस्तित्व की पुष्टि करते हैं। जब राजस्थान की चित्रकला अपने प्रारंभिक दौर से गु रही थी तब अजन्ता परम्परा भारत की चित्रकारी में एक नवजीवन का संचार कर रही थी। अरब आक्रमणों के झपेटों से बचने के लिए अनेक कलाकार गुजरात, लाट आदि प्रान्तों को छोड़कर देश के अन्य भागों में बसने लगे थे। जो चित्रकार इधर आये थे उन्होने अजन्ता परम्परा की शैली को स्थानीय शैलियों में स्वाभाविकता के साथ समन्वित किया। उनके तत्वावधान में अनेक चित्रपट तथा चित्रित ग्रंथ बनने लगे जिनमें निशीथचूर्णि, त्रिषष्टिशलाकापुर, नेमिनाथचरित, कथासरित्सागर, उत्तराध्ययन सूत्र, कल्पसूत्र तथा कालकथा विशेष रुप से उल्लेखनीय हैं। अजन्ता परम्परा के गुजराती चित्रकार सर्वप्रथम मेवाड़ तथा मारवाड़ में पहुँचे। इस समन्वय से चित्रकारी की मौलिक विधि में एक नवीनता का संचार हुआ जिसे मंडोर द्वार के गोवर्धन-धारण तथा बाडौली तथा नागदा गाँव की मूर्तिकला में सहज ही देखा जा सकता है। राजस्थान की समन्वित शैली के तत्वावधान में अनेक जैन-ग्रंथ चित्रित किये गये। शुरुआती अवधारणा थी कि इन्हें जैन साधुओं ने ही चित्रित किया है अतः इसे जैन शैली’ कहा जाने लगा लेकिन बाद में पता चला कि इन ग्रंथों को जैनेत्तर चित्रकारों ने भी तैयार किया है तथा कुछ अन्य धार्मिक ग्रंथ जैसे बालगोपालस्तुति, दुर्गासप्तशती, गीतगोविंद आदि भी इसी शैली में चित्रित किये गये हैं तो जैन शैली के नाम की सभी चीनता में सन्देह व्यक्त किया गया। जब प्रथम बार अनेक ऐसे जैन ग्रंथ गुजरात से प्राप्त हुए तब इसे गुजरात शैली’ कहा जाने लगा। लेकिन शीघ्र ही गुजरात के अलावा पश्चिम भारत के अन्य हिस्सों में दिखे तब इसे पश्चिम भारतीय शैली नाम दिया गया। बाद में इसी शैली के चित्र मालवा, गढ़मांडू, जौनपुर, नेपाल आदि गैर पश्चिमी भागों में प्रचुरता से मिलने लगे तब इसके नाम को पुन: बदलने की आवश्यकता महसूस की गई। उस समय का साहित्य को अपभ्रंश साहित्य कहा जाता है। चित्रकला भी उस काल और स्वरूप से अपभ्रंश साहित्य से मेल खाती दिखाई देती है अतः इस शैली को अपभ्रंश शैली’ कहा जाने लगा तथा शैली की व्यापकता की मर्यादा की रक्षा हो सकी। इस शैली को लोग चाहे जिस नाम से पुकारे इस बात में कोई संदेह नहीं कि इस शैली के चित्रों में गुजरात तथा राजस्थान में कोई भेद नहीं था। वागड़ तथा छप्पन के भाग में गुजरात से आये कलाकार "सोमपुरा" कहलाते है। महाराणा कुम्भा के समय का शिल्पी मंडन गुजरात से ही आकर यहाँ बसा था। उसका नाम आज भी राजस्थानी कला में एक सम्मानित स्थान रखता है। इस शैली का समय 11 वीं शताब्दी से 15 वीं शताब्दी तक माना जाता है। इसी का विकसित रुप वर्तमान का राजस्थानी चित्रकारी माना जाता है।

चूंकि इसका पादुर्भाव अपभ्रंश शैली से हुआ है अतः इनके विषयों में कोई खास अन्तर नहीं पाया जाता पर विधान तथा आलेखन संबंधी कुछ बातों में अन्तर है। प्रारंभिक राजस्थानी शैली के रुप में अपभ्रंश शैली की Sawachasm आँख एक चश्म हो गई तथा आकृति अंकन की रुढिबद्धता से स्वतंत्र होकर कलाकार ने एक नई सांस्कृतिक क्रान्ति को जन्म दिया। चित्र इकहरे कागज के स्थान पर बसली (कई कागजों को चिपका कर बनाई गई तह) पर अंकित होने लगे। अपभ्रंश के लाल, पीले तथा नीले रंगों के साथ-साथ अन्य रंगो का भी समावेश हुआ। विषय-वस्तु में विविधता आ गई। सामाजिक जीवन को चित्रित किया जाने लगा लेकिन उसकी मौलिकता को अक्षुण्ण रखने की कोशिश की गई। दूसरे शब्दों में राजस्थानी शैली अपभ्रंश शैली का ही एक नवीन रुप है जो 9 वी.-10 वीं. शती से कुछ विशेष कारणवश अवनति की ओर चली गई थी।

प्रारंभिक राजस्थानी चित्रों की उत्कृष्टता 1540 ई. के आसपास चित्रित ग्रंथों जिस में मृगावती, लौरचन्दा, चौरपंचाशिका तथा गीतगोविन्द प्रमुख हैं, पृष्ठों पर अंकित हैं। इसके अलावा रागमाला तथा भागवत के पृष्ठ इसकी उत्कृष्टता के परिचायक हैं। मालवा के रसिकप्रिया (1634 ई.) से राजस्थानी चित्रकारी में राजसी प्रमाणों का शुरुआत हुआ।

इन चित्रों के सौदर्य से मुगल भी प्रभावित हुए। बादशाह अकबर ने कई हिन्दु चित्रकारों को अपने शाही दरबारियों के समुह में सम्मिलित किया राजपुतों से वैवाहित सम्बन्ध स्थापित हो जाने के कारण दोनों के चित्र शैलियों में परस्पर आदान-प्रदान हुआ। राजस्थानी कलाकारों ने मुगल चित्रों से त्वचा का गुलाबी रंग ग्रहण किया जो किशनगढ़ शैली में स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।

दूसरी तरफ मुगलों ने राजस्थानी शैली की भाँति वास्तु का अपने चित्रों में प्रयोग किया। इसके अलावा चित्र भूमि में गहराई दर्शाकर नवीन पृष्ठ भूमि तैयार कर चित्रों को सुचारू रुप से संयोजित किया। 16 वी. से 18 वी. व 19 वी. शती तक कला की एक अनुपम धारा सूक्ष्म मिनियेचर रुप में कागज पर अंकित होती रही। इसके अतिरिक्त भित्ति-चित्रण परम्परा को भी राजस्थानी कलाकारों ने नव-जीवन दिया।

हाल के वर्षों में राजस्थानी शब्द का इस्तेमाल विस्तृत परिपेक्ष में होने लगा है। कुछ विद्वानों के मतानुसार राजस्थानी चित्रकला की सीमारेखा राजस्थान तक ही सीमित न रहकर मालवा तथा मध्य भारत तक फैला हुआ है।



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