आधुनिक भारत का इतिहास-भारतीय स्वतंत्रता संग्राम 1857-1947 Gk ebooks


Rajesh Kumar at  2018-08-27  at 09:30 PM
विषय सूची: आधुनिक-भारत का इतिहास >>> भारतीय स्वतंत्रता संग्राम 1857-1947

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम (1857-1947)
पुराने समय में जब पूरी दुनिया के लोग भारत आने के लिए उत्सुक रहा करते थे। यहां आर्य वर्ग के लोग मध्य यूरोप से आए और भारत में ही बस गए। उनके बाद मुगल आए और वे भी भारत में स्थायी रूप से बस गए। चंगेज़खान, एक मंगोलियाई था जिसने भारत पर कई बार आक्रमण किया और लूट पाट की। अलेक्ज़ेडर महान भी भारत पर विजय पाने के लिए आया किन्तु पोरस के साथ युद्ध में पराजित होकर वापस चला गया। हेन सांग नामक एक चीनी नागरिक यहां ज्ञान की तलाश में आया और उसने नालंदा तथा तक्षशिला विश्वविद्यालयों में भ्रमण किया जो प्राचीन भारतीय विश्वविद्यालय हैं। कोलम्बस भारत आना चाहता था किन्तु उसने अमेरिका के तटों पर उतरना पसंद किया। पुर्तगाल से वास्को डिगामा व्यापार करने अपने देश की वस्तुएं लेकर यहां आया जो भारतीय मसाले ले जाना चाहता था। यहां फ्रांसीसी लोग भी आए और भारत में अपनी कॉलोनियां बनाई।

अंत में ब्रिटिश लोग आए और उन्होंने लगभग 200 साल तक भारत पर शासन किया। वर्ष 1757 ने प्लासी के युद्ध के बाद ब्रिटिश जनों ने भारत पर राजनैतिक अधिकार प्राप्त कर लिया। और उनका प्रभुत्व लॉर्ड डलहौजी के कार्य काल में यहां स्थापित हो गया जो 1848 में गवर्नर जनरल बने। उन्होंने पंजाब, पेशावर और भारत के उत्तर पश्चिम से पठान जनजातियों को संयुक्त किया। और वर्ष 1856 तक ब्रिटिश अधिकार और उनके प्राधिकारी यहां पूरी मजबूती से स्थापित हो गए। जबकि ब्रिटिश साम्राज्य में 19वीं शताब्दी के मध्य में अपनी नई ऊंचाइयां हासिल की, असंतुष्ट स्थानीय शासकों, मजदूरों, बुद्धिजीवियों तथा सामान्य नागरिकों ने सैनिकों की तरह आवाज़ उठाई जो उन विभिन्न राज्यों की सेनाओं के समाप्त हो जाने से बेरोजगार हो गए थे, जिन्हें ब्रिटिश जनों ने संयुक्त किया था और यह असंतोष बढ़ता गया। जल्दी ही यह एक बगावत के रूप में फूटा जिसने 1857 के विद्रोह का आकार‍ लिया।

1857 में भारतीय विद्रोह

भारत पर विजय, जिसे प्लासी के संग्राम (1757) से आरंभ हुआ माना जा सकता है, व्यावहारिक रूप से 1856 में डलहौजी के कार्यकाल का अंत था। किसी भी अर्थ में यह सुचारु रूप से चलने वाला मामला नहीं था, क्योंकि लोगों के बढ़ते असंतोष से इस अवधि के दौरान अनेक स्थानीय प्रांतियां होती रही। यद्यपि 1857 का विद्रोह, जो मेरठ में सैन्य कर्मियों की बगावत से शुरू हुआ, जल्दी ही आगे फैल गया और इससे ब्रिटिश शासन को एक गंभीर चुनौती मिली। जबकि ब्रिटिश शासन इसे एक वर्ष के अंदर ही दबाने में सफल रहा, यह निश्चित रूप से एक ऐसी लोकप्रिय क्रांति थी जिसमें भारतीय शासक, जनसमूह और नागरिक सेना शामिल थी, जिसने इतने उत्साह से इसमें भाग लिया कि इसे भारतीय स्वतंत्रता का पहला संग्राम कहा जा सकता है।

ब्रिटिश द्वारा जमीनदारी प्रथा को शुरू करना, जिसमें मजदूरों को भारी करों के दबाव से कुचल डाला गया था, इससे जमीन के मालिकों का एक नया वर्ग बना। दस्तकारों को ब्रिटिश निर्मित वस्तुओं के आगमन से नष्ट कर दिया गया। धर्म और जाति प्रथा, जिसने पारम्परिक भारतीय समाज की सुदृढ़ नींव बनाई थी अब ब्रिटिश प्रशासन के कारण खतरे में थी। भारतीय सैनिक और साथ ही प्रशासन में कार्यरत नागरिक वरिष्ठ पदों पर पदोन्नत नहीं किए गए, क्योंकि ये यूरोपियन लोगों के लिए आरक्षित थे। इस प्रकार चारों दिशाओं में ब्रिटिश शासन के खिलाफ असंतोष और बगावत की भावना फैल गई, जो मेरठ में सिपाहियों के द्वारा किए गए इस बगावत के स्वर में सुनाई दी जब उन्हें ऐसी कारतूस मुंह से खोलने के लिए कहा गया जिन पर गाय और सुअर की चर्बी लगी हुई थी, इससे उनकी धार्मिक भावनाएं आहत हुई। हिन्दु तथा मुस्लिम दोनों ही सैनिकों ने इन कारतूसों का उपयोग करने से मना कर दिया, जिन्हें 9 मई 1857 को अपने साथी सैनिकों द्वारा क्रांति करने के लिए गिरफ्तार कर लिया गया।

बगावती सेना ने जल्दी ही दिल्ली पर कब्जा कर लिया और यह क्रांति एक बड़े क्षेत्र में फैल गई और देश के लगभग सभी भागों में इसे हाथों हाथ लिया गया। इसमें सबसे भयानक युद्ध दिल्ली, अवध, रोहिलखण्ड, बुंदेल खण्ड, इलाहबाद, आगरा, मेरठ और पश्चिमी बिहार में लड़ा गया। विद्रोही सेनाओं में बिहार में कंवर सिंह के तथा दिल्ली में बख्तखान के नेतृत्व में ब्रिटिश शासन को एक करारी चोट दी। कानपुर में नाना साहेब ने पेशावर के रूप में उद्घघोषणा की और तात्या टोपे ने उनकी सेनाओं का नेतृत्व किया जो एक निर्भीक नेता थे। झांसी की रानी लक्ष्मी बाई ने ब्रिटिश के साथ एक शानदार युद्ध लड़ा और अपनी सेनाओं का नेतृत्व किया। भारत के हिन्दु, मुस्लिक, सिक्ख और अन्य सभी वीर पुत्र कंधे से कंधा मिलाकर लड़े और ब्रिटिश राज को उखाड़ने का संकल्प लिया। इस क्रांति को ब्रिटिश राज द्वारा एक वर्ष के अंदर नियंत्रित कर लिया गया जो 10 मई 1857 को मेरठ में शुरू हुई और 20 जून 1858 को ग्वालियर में समाप्त हुई।



सम्बन्धित महत्वपूर्ण लेख
1857 का विद्रोह और उसके कारण
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम 1857-1947
1857 की क्रांति विस्तारपूर्वक
1857 से पहले का इतिहास (1600-1858 ई.तक)

Indian Swatantrata Sangram 1857 - 1947 Purane Samay Me Jab Puri Duniya Ke Log Bhaarat Ane Liye Utsuk Raha Karte The । Yahan Aary Warg Madhy Europe Se Aye Aur Hee Bus Gaye Unke Baad Mugal Ve Bhi Sthayi Roop चंगेज़खान Ek मंगोलियाई Tha Jisne Par Kai Baar Aakramann Kiya Loot Paat Ki अलेक्ज़ेडर Mahan Vijay Pane Aaya Kintu Porous Sath Yudhh Parajit Hokar Wapas Chala Gaya हेन सांग Namak Chini Nagrik Gyan Talash Usane Nalanda T


Labels,,,