लोकनाट्य का स्वरूप

LokNatya Ka Swaroop



GkExams on 20-03-2022




जैसा की हम सब जानते है ‘लोकनाट्य’ शब्द ‘लोक’ और ‘नाट्य’ दो शब्दों के योग से बना है। ‘लोक’ की कृति जब नाट्यरूप में संवादों के माध्यम से किसी कथा को प्रस्तुत करे तो उसे ‘लोकनाट्य’ कहते हैं। और इसे आकर्षक और प्रभावी बनाने के लिए नृत्य, संगीत, अभिनय तथा वेशभूषा आदि का प्रयोग किया जाता है।


LokNatya Ka Swaroop


डॉ श्याम परमार ने के अनुसार - “लोकनाट्य से तात्पर्य नाटक के उस रूप से है, जिसका संबंध विशिष्ट शिक्षित समाज से भिन्न सर्वसाधारण के जीवन से हो और जो परंपरा से अपने-अपने क्षेत्र के जनसमुदाय के मनोरंजन का साधन रहा हो।”


डॉ परमार ने बताया की - “लोकनाट्य लोक-रंजन का आडम्बर हीन साधन है, जो नागरिकों के मंच से अपेक्षाकृत निम्न स्तर का, पर विशाल जन के हर्षोल्लास से संबंधित है। ग्रामीण जनता में इसकी परंपरा युगों से चली आ रही है। चूंकि लोक में ग्रामीण एवं नागरिक जन सम्मिलित हैं, अतः लोकनाट्य एक मिले-जुले जन समाज का मंच है। परिष्कृत रुचि के लोक के लिए जिन नाटकों का विधान है, उसकी आधारभूमि यही लोकनाट्य है।


लोकनाट्य की विशेषताएं :



  • लोकनाट्य समूह या समाज की अनुभूतियों, भावनाओं एवं प्रवृत्तियों की अभिव्यंजना करता है, किसी व्यक्ति की कल्पना और अनुभावों की नहीं। लोक की स्वाभाविक भाषा पद्य होती है तथा लोकनाट्य के संवाद पद्यात्मक होते हैं।
  • इसके पात्र प्रवृत्ति विशेष या समूह विशेष के द्योतक होते हैं।
  • खुला रंगमंच, दृश्य परिवर्तन का अभाव (प्रायः एक पर्दा सबसे पीछे टँगा रहता है।
  • अभिनय में संकेत, नृत्य के हाव-भाव युक्त अभिनय धार्मिक, पौराणिक, सामाजिक, ऐतिहासिक तथा प्रेम पर आधारित कथा। बीच-बीच में विदूषक का आगमन जो मर्मस्पर्शी अभिनयों के बीच में आदर्श उपदेश या सम सामयिक विषमताओं का दुखड़ा रोना या उच्च वर्ग पर छींटे कसे जाते हैं।
  • कथानक का महत्व कम, रसानुभूति द्वारा तृप्ति का महत्व क्योंकि कथाएं प्राय: परिचित होती हैं।
  • नाटक मंडली का प्रत्येक सदस्य आवश्यकतानुसार प्रत्येक कार्य- विदूषक, नायक, निर्देशक सभी कार्य कर सकता है।
  • लोक जीवन के रीति-रिवाज या उत्सवों का उल्लेख आवश्यक है। उसमें लोक प्रचलित गीत एवं कहावतों का समावेश भी अवश्य रहता है।



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