जनसंख्या शिक्षा की परिभाषा

Jansankhya Shiksha Ki Paribhasha

Gk Exams at  2018-03-25


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Pradeep Chawla on 29-10-2018


परिचय


जनसंख्या शिक्षा प्रायोजना राज्य में वर्ष 1981 से आरम्भ की गई। वर्तमान में यह योजना राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद्, नई दिल्ली के मार्गदर्शन एवं उनसे प्राप्त आर्थिक सहायता से राजस्थान राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान द्वारा चलाई जाती है।


राज्य की जनसंख्या का लगभग 20 प्रतिशत भाग किशोरों का है। ये बालक ही देश के भविष्य की जनसंख्या को निर्धारित करने वाले होंगे। अतः इन्हें जनसंख्या शिक्षा दिए जाने की आवश्यकता है।


जनसंख्या शिक्षा के सभी मुद्दे मूल्य आधारित हैं। अतः बाल्यकाल में ही जनसंख्या व किशोरावस्था के प्रति सही दृष्टिकोण के विकास का प्रयास इस प्रायोजना द्वारा किया जा रहा है। वर्ष 1997 से प्रायोजना में किशोरावस्था शिक्षा, प्रजनन स्वास्थ्य तथा एड्स शिक्षा के कार्यक्रम भी विद्यालयों में आयोजित कि जा रहा है। विद्यालयों से बाहर के किशोरों को जनसंख्या एवं किशोरावस्था शिक्षा से जोड़ने के लिए विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, उनमें भी जनसंख्या शिक्षा से संबंधित सामग्री का समावेश किया गया है। विद्यालयों में जनसंख्या व विकास शिक्षा कार्यक्रम, प्रायोजना के तहत् चलाया जा रहा है।


वित्तीय प्रावधान


भारत सरकार द्वारा एन.सी.ई.आर.टी. के माध्यम से।


प्रायोजना के उद्देश्य


जनसंख्या स्थिरीकरण एवं विद्यालयों में गुणवत्ता सुधार जैसे -दो व्यापक राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु किए जा रहे प्रयासों को सुदृढ़ करने के लिए यह प्रायोजना संचालित की जा रही है। इसके मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

  • जनसंख्या व स्थिर विकास के अंतर्संबंधो के प्रति शिक्षार्थियों को जागरुक करना।
  • विद्यार्थियों में जनसंख्या व स्थिर विकास से संबंधित मुद्दों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण एवं उत्तरदायी व्यवहार विकसित करना।
  • किशोरों/किशोरियों को प्रजनन एवं यौन स्वास्थ्य के लिए उत्तरदायी व्यवहार अपनाने हेतु इसकी प्रामाणिक जानकारी प्रदान करना तथा सकारात्मक दृष्टिकोण व उपयुक्त जीवन कौशलों का विकास करना।

जनसंख्या व विकास शिक्षा के प्रमुख क्षेत्र


प्रायोजना के कार्यक्रमों में विद्यालयी शिक्षा के लिए निम्नांकित क्षेत्रों में कार्य किया जाएगा-

  • जनसंख्या और स्थिर विकास।
  • लैंगिक समता व समानता और महिला सशक्तिकरण।
  • पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक तत्व और जीवन की गुणवत्ता।
  • प्रजनन स्वास्थ्य एवं यौन स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता।
  • जनसंख्या वितरण, शहरीकरण एवं प्रजनन।



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