व्यक्तित्व परीक्षण की विधियां

Vyaktitv Pareekshan Ki Vidhiyan

Gk Exams at  2018-03-25


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GkExams on 13-11-2018


व्यक्तित्व परीक्षण या मापन की विधियाँ- व्यक्तित्व के मापन को तीन प्रकार की विधियों में बाँटा जा सकता है, जो निम्नलिखित है –

  1. आत्मनिष्ठ विधियाँ 2. वस्तुनिष्ठ विधियाँ 3. प्रक्षेपण विधियाँ

1.आत्मनिष्ठ या व्यक्तिगत विधियाँ (subjective Methods) इन विधियों के माध्यम से हम व्यक्ति सम्बन्धी सूचना उसी व्यक्ति से या उसके मित्रों अथवा सम्बन्धियों से प्राप्त कर लेते हैं। इन विधियों का आधार उसके लक्षण, अनुभव, उद्देश्य, आवश्यकता, रुचियाँ और और अभिवृतियाँ आदि होती हैं। वह इनके माध्यम से सभी सूचनाएं देता है। इस विधि के अन्तर्गत निम्नलिखित प्रविधियाँ आती हैं-


आत्मकथा (Autobiography) इस विधि के द्वारा अध्ययन किये जाने वाले व्यक्ति के व्यक्तित्व गुणों को कुछ शीर्षकों में बाँट दिया जाता है, जिसके द्वारा वह अपने अनुभवों, उद्देश्यों, प्रयोजनों, रुचियों और अभिवृत्तियों का विवरण के आधार पर निश्चित मनोवैज्ञानिक निष्कर्ष निकालता है। परन्तु इस विधि में कुछ कठिनाइयाँ है। व्यक्ति-वृत्ति इतिहास (case History) इस विधि के अन्तर्गत हम वंशानुक्रमीय एवं वातावरण सम्बन्धी तत्वों का अध्ययन करते हैं, जो व्यक्ति जीवन को प्रभावित करते हैं। यह विधि मुख्य रूप से आत्मकथा पर निर्भर करती हैं। इसमें विषयी के द्वारा बताये गये वृतान्त के अतिरिक्त परिवार, इतिहास, आय, चिकित्सा पद्धति, पर्यावरण एवं सामाजिक स्थिति आदि से भी सूचनाएँ एकत्रित की जाती है। यह विधि प्रायः असामान्य व्यक्तियों के अध्ययन में प्रयुक्त की जाती है।


साक्षात्कार विधि (Interview Method) इसमें साक्षात्कारकर्ता विषयी के आमने-सामने बैठकर बातचीत करते हैं। इसमें साक्षात्कार लेने वाले मनोविज्ञानी विषय के प्रेरकों, अभिवृत्तियों तथा लक्षणों का मूल्यांकन करते हैं। साक्षात्कर्ता में विषय को प्रभावित, सम्मोहित एवं गुमराह करके उसकी वास्तविकता का पता लगाने का गुण होना चाहिए।


सूची विधि या प्रश्नावली विधि (Inventory Method or Questionnaire Method) इसमें विषयी के सामने एक प्रश्नावली प्रस्तुत की जाती है जिसमें 100 से लेकर 500 तक प्रश्न होते हैं। इसके उत्तर हाँ या नहीं से सम्बन्धित रहते हैं। यह विधि व्यक्तित्व मापन में सबसे अधिक उपयोग की जाती है। विषयी प्रश्नावली को पढ़ता जाता है और अपने उत्तरों को स्पष्ट करता जाता है। इनका प्रयोग व्यक्तिगत एवं सामूहिक दोनों ही रूपों से किया जा सकता है।



2.वस्तुनिष्ठ विधियाँ (objective Methods) ये विधियाँ इस तथ्य पर आश्रित हैं कि उसका प्रत्यक्ष व्यवहार अवलोकनकर्ता को कैसा लगता है ? ये विधियाँ भी बुद्धि, रुचि एवं अभिरुचि को आधार मानकर क्रियाशील होती हैं। इसके प्रतिपादकों का विचार है कि व्यक्तित्व को समझने के लिए विषयी को जीवन के पर्यावरण में रखकर देखना चाहिए ताकि उसकी आदतें, लक्षण और चारित्रिक विशेषताएँ प्रकट हो सकें। वस्तुनिष्ठ विधि के प्रयोग की विभिन्न विधियाँ निम्नलिखित हैं –


नियन्त्रित निरीक्षण (controlled observation) इस विधि का प्रयोग मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला में ही सम्भव है क्योंकि पर्यावरण एवं विषयी को नियन्त्रण में लेकर कार्य करना कठिन है। इसमें विषयी को कमरे में अकेला बैठाकर कोई कार्य करने के लिये दे दिया जाता है तथा उसकी क्रियाओं, हावभाव और प्रक्रिया का अवलोकन इस रूप से किया जाता है कि विषयी निरीक्षणकर्ता को देख न सके। वर्तमान समय में विषयी के व्यवहार को चलचित्र के माध्यम से भी नोट किया जाता है। इस प्रकार से सम्पूर्ण व्यक्तित्व का मूल्यांकन किया जाता है।


क्रम-निर्धारण मापनी (Rating Scale) क्रम निर्धारण मापनी में गुणात्मक व्यवहार का अवलोकन किया जाता है। इसमें एक लम्बी रेखा के नीचे खण्डशः कुछ विवरणात्मक विशेषण या वाक्यांश लिखे रहते हैं। इसके एक सिरे पर वाक्यांश की चरम सीमा होती है और दूसरे पर विपरीत गुणों की चरम सीमा होती है। क्रम निर्धारक मापनी पर लक्षणों को चिन्हित कर देते हैं, जिससे यह पता लग जाता है कि अमुक व्यक्ति में वह गुण किस सीमा तक मिलता है।


3.प्रक्षेपण विधियाँ (Projective Techniques) इन विधियों के माध्यम से विषयी अपने प्रतिचारों को आन्तरिक लक्षणों, भावदशाओं, अभिवृत्तियों एवं हवाई कल्पनाओं में पिरोकर कहानी के रूप में प्रकट करता है। इनके आधार पर उसके व्यक्तित्व का मूल्यांकन आसानी से कर लिया जाता है।




व्यक्तित्व का समायोजन (Adjustment of Personality)


मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह अन्त समय तक समाज में ही रहना चाहता है। वह उसी समय अधिक प्रसन्न दिखाई देता है, जबकि वह स्वयं की रुचि, पसन्द और अभिवृत्तियों वाले समूह को प्राप्त कर लेता है। इस व्यवहारिक गतिशीलता का ही नाम ‘समायोजन‘ है। जब व्यक्ति अप्रसन्न दिखाई देता है तो यह उसके व्यवहार का कुसमायोजन होता है।


समायोजन का अर्थ जब व्यक्ति गतिशीलता का प्रयोग आवश्यकताओं की पूर्ति और आत्म-पुष्टि के लिये करता है तो इसे ‘समायोजन की प्रक्रिया‘ कहा जाता है।


गेट्स एवं अन्य के अनुसार – ‘‘समायोजन निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति अपने और अपने वातावरण के बीच सन्तुलित सम्बन्ध रखने के लिये अपने व्यवहार में परिवर्तन करता है।‘‘ इस प्रकार स्पष्ट होता है कि व्यक्ति स्व-विकास के लिये प्रेरकों की सहायता से परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करता है।


समायोजन की प्रविधियाँ (Methods of Adjustment) समायोजन को प्रभावित करने में निराशा, मानसिक-संघर्ष और तनाव प्रमुख कारक होते हैं। ये तीनों अपने दुष्प्रभावों के कारण व्यक्ति को कुसमायोजित व्यवहार करने को बाध्य कर देते हैं। अतः इन तीनों पर विजय प्राप्त करना ही व्यक्ति को समायोजित करना हो जाता हैं। ये प्रविधियाँ निम्नलिखित हैं-


(1) प्रत्यक्ष विधियाँ (Direct Methods) जब व्यक्ति चेतनावस्था में रहकर समायोजन को स्थापित करने के लिये प्रयत्न करता है तो वे प्रयत्न प्रत्यक्ष विधियों के अन्तर्गत माने जाते हैं। इन उपायों को लागू करने में वह अपना विवेक, तर्कशक्ति एवं बौद्धिक क्षमता आदि का सहारा लेता है। इन विधियों का प्रयोग विशेष रूप से समायोजन की किसी विशेष समस्या के स्थायी समाधान के लिये किया जाता है। इन उपायों के अन्तर्गत निम्नलिखित विधियाँ आती हैं-


बाधाओं का समाधान (Solving of obstacles) व्यक्ति अपनी आवश्यकता पूर्ति में आने वाली बाधाओं को समाप्त करने का चेतनात्मक प्रयत्न करते हैं। यदि इस प्रकार से बाधा समाप्त हो जाती है तो उसका मानसिक तनाव समाप्त हो जाता है। इस चेतनात्मक प्रयत्नों के अन्तर्गत अभ्यास और लगन महत्वपूर्ण कार्य करते हैं।


अन्य मार्ग खोजना (To Find other ways) जब कोई व्यक्ति अपने लक्ष्य की पूर्ति में उत्पन्न विभिन्न बाधाओं को किसी कारणवश दूर नहीं कर पाता है, तो किसी अन्य मार्ग या ‘हल‘ को खोजना पड़ता है। इस प्रकार उसका मानसिक तनाव कम हो जाता है और वह समायोजन स्थापित कर लेता है।


उद्देश्य में परिवर्तन (change in Aims) जब व्यक्ति अपने लक्ष्य एवं उद्देश्य में सफल नहीं हो पाता है और न उत्पन्न बाधाओं पर विजय प्राप्त कर पाता है तो वह उस उद्देश्य को त्यागकर समानान्तर उद्देश्य को ग्रहण कर लेता है।


विश्लेषण एवं निर्णय (Analysis and Decision) जब मनुष्य परिस्थितियों से घिर जाता है तो वह मानसिक सन्तुलन खो बैठता है। उसे लक्ष्य प्राप्त करने के लिये कोई उपाय खोजना पड़ता है। यह रास्ता परिस्थिति का सही विश्लेषण और उचित निर्णय करने पर ही निर्भर होता है।


  1. अप्रत्यक्ष विधियाँ (Indirect Methods) मानसिक सामान्यता को बनाये रखने के लिए व्यक्ति को अचेतन क्रियाओं की भी सहायता लेनी पड़ती है। अतः अप्रत्यक्ष उपाय वे हैं, जिन्हें वह अचेतन रूप से अपनाता है। तनावपूर्ण परिस्थिति एवं दुःख से बचने के लिए अप्रत्यक्ष उपायों का प्रयोग किया जाता है। इसको मनोवैज्ञानिक ‘सुरक्षा प्रक्रियाएँ’ कहते हैं क्योंकि वे व्यक्ति के आत्मसम्मान की रक्षा करती हैं तथा उसका बचाव उस समय करती हैं जब वह निराशा के कारण चिन्ताग्रस्त होता है, अतः अप्रत्यक्ष विधियाँ निम्नलिखित हैं-

शोधन (sublimation) शोधन अचेतन मन की वह मानसिक प्रक्रिया है, जिसके अन्दर व्यक्ति की मूल संवेगात्मक शक्ति, आवश्यकताएँ आदि को कृत्रिम पक्ष की ओर मोड़ दिया जाता है, जिसे समाज की स्वीकृति प्राप्त है।


पृथक्करण (Withdrawal) दुःख या कष्ट आने पर व्यक्ति स्वयं को उससे अलग कर देता है। ऐसे व्यवहार को पलायनवादी व्यवहार की संज्ञा दी जाती है। ये व्यवहार समाज विरोधी होते हैं।


प्रतिगमन (Regression) प्रतिगमन की युक्ति तब देखने में आती है, जब व्यक्ति निराशा द्वारा उत्पन्न चिन्ता के कारण व्यवहार के प्रारम्भिक रूपों में वापस चला जाता है।


तादात्म्य (Identification) तादात्म्य से तात्पर्य दूसरे व्यक्ति के गुणों को अपने व्यक्तित्व में ग्रहण कर लेने से है। जब व्यक्ति संसार में अपने महत्व को समझ लेता है तो सीखने की कोशिश करता है।


निर्भरता (Dependency) जब व्यक्ति किसी कार्य में सभी प्रयत्नों के बावजूद असफलता प्राप्त करता है तो वह स्वयं की समस्या को किसी योग्य व्यक्ति को सौंप देता है और उसके निर्देशों का पालन करके जीवन व्यतीत करने लगता है।


युक्तिकरण (Rationalization) इस युक्ति के अन्तर्गत व्यक्ति वास्तविक प्रेरक को छिपाकर अन्य प्रेरकों को दोषी ठहरा देता है। इस प्रकार व्यक्ति की क्षमता का कोई दोष नहीं माना जाता है बल्कि दूसरे के ऊपर दोषारोपण हो जाता है।


दमन (Repression) कुछ व्यक्ति चिन्ता को समाप्त करने के लिए दमन का प्रयोग करते हैं और उससे छुटकारा प्राप्त कर लेते हैं।


प्रक्षेपण (Projection) प्रक्षेपण का कार्य चिन्ताजनक आवेगों से रक्षा करता है। इस युक्ति के अन्तर्गत किसी अन्य प्रेरकों को थोपकर संघर्ष के स्रोत को छिपा लिया जाता है।

  1. क्षतिपूरक विधियाँ (compensatory Methods) यह प्रकृति का नियम है कि वह मानव को किसी क्षेत्र में सफल और किसी में असफल बताती है। अतः जब वह एक क्षेत्र में असफल या स्वयं में कमी अनुभव करता है तो अन्य क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार से उत्पन्न तनाव समाप्त हो जाता है। इस विधि को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनो ही विधियों को प्रयोग में लाया जाता है।
  2. आक्रामक विधियाँ (Aggressive Methods) आक्रामक विधि से तात्पर्य व्यक्ति द्वारा उत्पन्न विरोधात्मक व्यवहार से है, जिसमें उसके द्वारा बाधा या रूकावट का आक्रामक व्यवहार के द्वारा सामना किया जाता है। इस विधि से व्यक्ति का मानसिक तनाव शिथिल होकर समाप्त हो जाता है। आक्रामक उपायों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दो रूपों मे प्रयोग किया जाता है । प्रत्यक्ष आक्रामकता वह है, जिसमें व्यक्ति उसी व्यक्ति या वस्तु पर आक्रामण करता है जो उसके असन्तोष का कारण होता है। ‘अप्रत्यक्ष आक्रामकता‘ वह है जिसमें व्यक्ति असन्तोषजनक परिस्थिति पर आक्रमण न करके अन्य ढंग से आक्रामक व्यवहार करके मानसिक तनाव को दूर करते हैं।



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