आत्मनिर्भरता पर कविता

Atmnirbharta Par Kavita

GkExams on 13-05-2020



चिथड़ो में मैं आज,
साठ वर्षों बाद।
फिर भी,
ठुकराता हूँ,
बढ़े हुए कर-पृष्ठ तेरे,
कर-तल होने में जो
तत्पर हैं।
होना नहीं चाहता मैं
बाध्य कभी,
समय-विभाग के अनुसार
मेरे चलने में।
और न
होने देना चाहता मैं
लांछित कभी
खुद के ज़मीर को
अनुयायी तेरा बन कर
क्योंकि प्यास मेरी
घटेगी नहीं, बढ़ेगी
अर्धभरा गिलास लेकर
जिस में
स्वार्थ कपट की बू है,
षड्यंत्र-चक्रव्युह है।



Comments Gaganpreet on 05-10-2021

Atmnirbharta par choti si char panktiyo ki kavita

Yogesh on 13-08-2020

Aatm nirbhar lndai par poem



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