फेरा और फेमा में अंतर

Fera Aur Fema Me Antar

Gk Exams at  2020-10-15

GkExams on 12-05-2019

सन 1997-98 के बजट में सरकार ने फेरा-1973 के स्थान पर फेमा (विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम) को लाने का प्रस्ताव रखा। दिसम्बर 1999 में संसद के दोनों सदनों द्वारा फेमा प्रस्तावित किया गया था। राष्ट्रपति के अनुमोदन के बाद 1999 में फेमा प्रभाव में आ गया। फेमा के तहत, विदेशी मुद्रा से संबंधित प्रावधानों को संशोधित और उदार बनाया गया तांकि विदेशी व्यापार को आसान बनाया जा सके। सरकार को इस बात की उम्मीद है कि फेमा विदेशी मुद्रा बाजार को अनुकूल विकास प्रदान करेगा।



विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम (फेरा), 1973:-



विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम (फेरा) 1973 में लागू किया गया था और यह 1 जनवरी, 1974 को यह अस्तित्व में आया। इस कानून की धारा 29 भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के संचालन से संबंधित है। इस धारा के अनुसार, सभी गैर-बैंकिंग विदेशी शाखाओं और 40 फीसदी से अधिक विदेशी इक्विटी वाले सहायक कंपनियों को नए उपक्रमों की स्थापना करने, मौजूदा कंपनियों के शेयर खरीदने, या पूरी तरह अथवा आंशिक रूप से प्राप्त किसी भी अन्य कंपनी के शेयर खरीदने के लिए सरकार की अनुमति प्राप्त करनी होती है।



यह नियम भुगतान विनियमन के कानूनों में संशोधन करने उसे मजबूत बनाता है। इसका संबंध देश के विदेशी मुद्रा संसाधनों के संरक्षण के लिए विदेशी मुद्रा और प्रतिभूतियों में लेन-देन, अप्रत्यक्ष रूप से विदेशी मुद्रा को प्रभावित करने वाले लेनदेन व मुद्रा के आयात तथा निर्यात एवं देश के आर्थिक विकास से है।



फेरा की विशेषताएं:



(1) इस अधिनियम को विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 कहा जाता है।



(2) यह पूरे भारत में लागू था।



(3) यह भारत या देश बाहर रहने वाले सभी भारतीय नागरिकों, भारत में पंजीकृत या निगमित संस्थाओं, शाखाओं, कंपनियों या निकाय कॉर्पोरेट पर लागू होता था।



(4) यह केन्द्र सरकार द्वारा तय की गई उस तारीख से लागू हुआ जब सरकारी राजपत्र में अधिसूचना जारी की गई I



इन दिशा-निर्देशों के अनुसार, प्रमुख नियम यह था कि भारत में कार्यरत सभी विदेशी कंपनियों की सभी शाखाओं को कम से कम 60 फीसदी स्थानीय इक्विटी भागीदारी के साथ खुद को भारतीय कंपनियों में परिवर्तित करना होगा। इसके अलावा इसके तहत सभी विदेशी सहायक कंपनियों की शेयर इक्विटी को 40% या उससे नीचे लाना था। देश के आर्थिक विकास पर इस अधिनियम का वास्तविक प्रभाव पूरी तरह से नकारात्मक रहा क्योंकि इससे बड़े व्यापारिक घरानों के हाथ बंध गए जिससे उन्हें अपने कारोबार का विस्तार करने का मौका नहीं मिला। इसलिए इसके नीति निर्माताओं द्वारा यह महसूस किया गया कि इस अधिनियम में कुछ छूट मिलनी चाहिए जिससे देश में औद्योगीकरण के माध्यम से आर्थिक विकास को गति मिल सके।

फेमा-2000

इसके तहत 49 खंड हैं जिनमें से में 12 का संबंध संचालन संबंधी कार्यों से है और बाकि अन्य पैनल संबंधित प्रावधान हैं

सामान्यत: यह एक दीवानी कानून (सिविल लॉ) है

यह कानून सभी शाखाओं, कार्यालयों तथा भारत से बाहर की शाखाओं या भारत से नियंत्रित एक व्यक्ति द्वारा संचालित कार्यों पर लागू होता है।

पूंजी खाता लेनदेन, चालू खाते के लेन-देन, नई सेवाओं औऱ शर्तों की शुरूआत करते समय।



फेरा-1973

इसके तहत 81 खंड थे जिसमें से 32 का संबंध संचालन संबंधी कार्यों से था और बाकि अन्य जुर्माने, अपील आदि से संबंधित थे।

इसे एक आपराधिक कानून के जैसा माना जाता था।

यह भारत में रहने वाले सभी लोगों और शाखाओं व भारतीय तथा भारत के बाहर डील करने वाली सभी एजेंसियों पर लागू होता था।

इसकी शर्तों के बारे में जानकारी नहीं दी गई है।



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