डाबड़ा कांड क्या है

Dabada Kand Kya Hai

Pradeep Chawla on 20-10-2018

डाबडा गाँव राजस्थान के जिले की तहसील में एक छोटासा ऐतिहासिक गाँव है। यह जाटों के बलिदानी इतिहास की थर्मो-पल्ली के नाम से जाना जाता है। डाबडा काण्ड भारत में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हुए काण्डों में सबसे भयंकर था जो अमृतसर के जलियावाला बाग काण्ड से कमतर नहीं है।


डाबडा के किसानों ने जागीरी जुल्मों से तंग आकर कांग्रेसी नेताओं से निवेदन किया कि गाँव डाबड़ा में भी वे कांग्रेस की सभा करें। कांग्रेस ने 13 मार्च 1947 को डाबड़ा में सभा का निर्णय लिया। कांग्रेस की बैठक का समय 11 बजे था परन्तु सभी नेता सुबह साढ़े सात बजे ही डाबड़ा पहुँच गए। वे सीधे चौधरी पन्नाराम लोमरोड़ के घर पहुंचे। पन्नाराम जी ने उनका स्वागत किया और कुछ चर्चाएँ की। इतने में जागीरदार के बुलाये हजारों की तादाद में ऊँटों व घोड़ों पर सवार आतंकवादियों ने धावा बोल दिया। हालत देखकर पन्ना रामजी ने कांग्रेसियों को गुप्त रणनीति बनाने के लिए कहा और कांग्रेसी मोटर में बैठ कर रवाना हो गए।


पन्नाराम जी ने अपने घर में फलसे के किन्वाड़ को बंद कर अन्दर से जाब्ता कर दिया। हजारों की संख्या में ऊँटों व घोड़ों पर सवार जागीरदार के आतंकवादियों ने मिलकर एक साथ पन्नाराम जी के घर पर हमला बोल दिया । इसका मुकाबला अकेले पन्नारामजी लोमरोड़ ने किया। पन्नारामजी ने अपने हाथों में लम्बे नाळे की जेळी ली और घर के अन्दर से बाड़ के ऊपर से ही हमलावरों पर बचावी हमला बोल दिया। घर के बाहर वे हजारों हमलावरों से घिरे थे। घर की बाड़ इतनी ऊंची थी कि हमलावर आसानी से घर में नहीं घुस सकता था।


पन्नाराम जी बाड़ के ऊपर से एक-एक हमलावर को जेळी का निशाना बनाते, उसकी छाती या गाल या आँखों पर वार इतने जोर से करते कि जेळी के सींगों में फस हमलावर जेळी वापस खींचने पर पन्नाराम जी के चरणों में आकर गिरता और कभी-कभी तो काँटों की बाड़ में ही फंस कर रह जाता। कितनी भयंकर और अजीब तरह की लड़ाई थी यह। केवल एक आदमी का केवल जेळी से हजारों हमलावरों से भयंकर युद्ध। अंत में बंदूकों और राईफलों की गोलियों से पन्नाराम जी का शरीर छलनी हो गया था फिर भी वे लडे जा रहे थे। भारत माता की जय के साथ वे शहीद हो गए। उनके अंतिम शब्द थे – “हरामजादों मैं मरकर भी जिन्दा रहूँगा, और तुम जीकर भी मरे समान जीवन व्यतीत करोगे”।


उधर दक्षिण फ्रंट पर जो तीन महामानव हजारों हमलावरों से अकेले लड़ रहे थे उनके नाम थे –

  • रामूराम जी लोल, निवासी लाडनू (नागौर)
  • रुघाराम जी लोल, निवासी लाडनू (नागौर)
  • किशनाराम जी लोल, निवासी लाडनू (नागौर)

हमलावरों ने किसानों की ढाणियों में आग लगा दी थी। ढाणीयां बुरी तरह से जल रही थी। आग की लपटें आकाश को छू रही थी। ऐसे में ये तीनो महामानव जलती आग में कूद पड़े। आव-देखा न ताव हमलावरों को काट-काट कर मारने लगे। तीनों वीर योधाओं ने सैकड़ों हमलावरों को मौत के घाट उतारा। लेकिन अंत में अनगिनत गोलियों से घायल हो भारत माता के उच्चारण के साथ शहीद हो गए। ऐसे थे ये जाट वीर ! जागीरदार प्रमुख भी इनकी वीरता को छुपा न सका, उसने कहा था – “देख इनकी शूरता शत्रु भी कायल है। एक कदम भी पीछे न हटे, जब तक इंच-इंच न कट गए थे”।


डाबड़ा गाँव में उनकी यादगार में बने अमर शहीद स्तम्भ प्रांगण पर आज भी शहीद मेले का आयोजन होता है तथा उन वीर जाट योधाओं को समस्त मानव जाति नमन कर प्रेरणा लेती है।


अपरोक्त के अतिरिक्त एक और यौद्धा इस काण्ड में शहीद हुए थे वे थे नागौर जिले के गाँव के नंदराम जी मूंड


इस काण्ड के प्रत्यक्ष दर्शकों में प्रस्तावित 13 मार्च 1947 की सभा को संबोधित करने वालों में समाज सुधारक और भजनोपदेशक भी थे जो इस काण्ड की पूर्णावधि के समय अपने साथियों के साथ जीप से डाबड़ा पहुंचे थे। तब जाकर पाँचों शहीदों का सामूहिक दाह संस्कार हो सका था और घायलों का अस्पताल व जोधपुर में समुचित इलाज हो सका था।


ने ऐसे वीर योद्धाओं को सत-सत नमन करते ये पंक्तियाँ कहीं थी –

मैंने देखी है मारवाड़ में, कृषकों के कर में हथकड़ियाँ ।
उनके आँगन में देखी है, चंद जली बुझी सी फुल झड़ियाँ ॥
कुछ फूल खिले पर, महक सके कुछ घड़ियाँ ।
जागीरों के साये में, जुड़ती रही जुल्मों की कड़ियाँ ॥
तब हरिसिंह दहाड़ उठा, जागीरों में जंग , अब जीत कृषकों की।
आज नहीं तो कल सही, बात कही मैं परसों की ॥




Comments Kishan Jat on 21-09-2021

बिल्कुल तथ्यपरक जानकारी है और जाट सूरमाओं ने जमींदारों को धूल चटाई थी

Ss on 28-07-2021

इसका कोई स्त्रोत है या ऐसे ही प्रतियोगिता की तैयारी कर रहे मेहनती विद्यार्थियों का समय थूक बिलो कर खराब कर रहे हो।

Rivendra on 13-10-2020

डाबडा में कितनी जातीया रहती थी

Sushila Goswami on 07-07-2020

बेरी क्या है

Subhash Chandra on 12-05-2019

डाबड़ा कांड कौनसे प्रजामंडल से संबंधित है



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