संथाली भाषा साहित्य

Santhali Bhasha Sahitya

Gk Exams at  2018-03-25


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GkExams on 10-02-2019

II संजय सरदार II
आपका जन्म कहां, किस परिवार में हुआ और शिक्षा-दीक्षा कैसे हुई. मेरा जन्म 16 अक्तूबर 1939 को जमशेदपुर के एमजीएम थाना क्षेत्र के डोभापानी गांव में हुआ था. मेरे पिता स्व सोमाय हांसदा एवं माता स्व बाली हांसदा एक साधारण किसान परिवार से थे.
मेरी प्राथमिक शिक्षा नरवापहाड़ के समीप स्थित राजदोहा स्कूल में हुई, जिसके पश्चात मानपुर उच्च विद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा पास की. उस समय यहां शिक्षा की कोई बेहतर व्यवस्था नहीं थी, जिसके कारण उन्हें अपने रिश्तेतार के यहां रह कर अपनी पढ़ाई पूरी करनी पड़ी. इसके बाद टाटा कॉलेज, चाईबासा से इंटर करने के बाद रांची विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक और स्नातकोत्तर किया.
पढ़ाई के बाद आपको अच्छी नौकरी मिली. आप शिक्षा और साहित्य सेवा से कैसे जुड़े?
नहीं, नहीं, मैंने नौकरी नहीं की, मैं तो लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल कॉलेज का संस्थापक सदस्य हूं. 1970 के समय क्षेत्र में शिक्षा का घोर अभाव था. क्षेत्र में कॉलेज नहीं थे, कोई पढ़ता नहीं था तो यहां कुछ बुद्धिजीवियों ने मिल कर कॉलेज स्थापना का निर्णय लिया और 1970 में कॉलेज स्थापना के पश्चात जुगसलाई के आरपी पटेल स्कूल से इसकी शुरुआत की गयी.
बाद में उसे हरहरगुट्टू से चलाया गया तथा अंतत: करनडीह में भवन बनाकर कॉलेज को स्थायी स्थान दिया गया. वहीं मैंने राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक के रूप में सेवा की तथा वहीं से 1999 में सेवानिवृत्त हुआ.
क्षेत्र में शिक्षा का घोर अभाव था, शिक्षा के बिना समाज के विकास की कल्पना नहीं की जा सकती. इसीलिए मैंने शिक्षा के क्षेत्र में काम करना शुरू किया. जहां तक साहित्य की बात है, तो साहित्य अपने समाज का दर्पण है.
साहित्य इतिहास को बचाये रखने के साथ-साथ वतर्मान को भी दर्शाता है. मैं गुरु गोमके पंडित रघुनाथ मुर्मू को अपना आदर्श मानता हूं. मैं उस परिवार के भी काफी करीब रहा हूं. मैं शांति निकेतन में भी रहा हूं, और साहित्य के क्षेत्र में काम करने की प्रेरणा भी वहीं से मिली. वैसे एलबीएसएम कॉलेज, करनडीह से जुड़ने से पूर्व कुछ समय टाटा स्टील (उस समय टिस्को) से भी जुड़ा रहा.
अभी संथाली साहित्य की क्या स्थिति है?
वर्तमान में संथाली साहित्य की स्थिति अच्छी है. यही नहीं, समाज के काफी लोग साहित्य से जुड़े भी हैं और समाज के लिए काम भी कर रहे हैं. इसलिए संथाली की स्थिति पहले की बनिस्बत अच्छी है. हां, अौद्यौगिक क्षेत्र में शिक्षा का ह्रास हुआ है, क्योंकि यहां पढ़ाई पूरी करने से पहले काम पर चले जाते हैं, और काम पर जाते से पढ़ाई छूट जाती है.
युवाओं और समाज के लिए क्या संदेश देंगे?
समाज का हर व्यक्ति शिक्षित बने, हर व्यक्ति को शिक्षित बनाने में सहयोग दें. समाज से कुरीतियों और अंधविश्वास को दूर करें.
लोगों को अच्छा रास्ता दिखाएं, समय का सदुपयोग करना सीखें. आज प्रत्येक युवा को अपने और अपने समाज के बारे में विचार करना होगा कि वे कैसे आगे बढ़ेंगे, समाज कैसे आगे बढ़ेगा. समाज सभी का है इसे मिलजुल कर ही आगे बढ़ाया जा सकता है.
तीन दर्जन से अधिक संस्थानों से जुड़े हैं प्रो हांसदा
प्रो दिगंबर हांसदा संथाल समाज के एक बड़े लेखक के साथ प्रकाशस्तंभ भी हैं, उनके द्वारा लिखित एवं अनुवाद की गयी पुस्तकें स्कूल से लेकर कॉलेज तक पढ़ाई जाती हैं. उन्होंने एनसीइआरटी की कई पुस्तकों का ओलचिकी में अनुवाद भी किया है. वह तीन दर्जन से अधिक संस्थान/संगठनों से जुड़े हैं. वह ज्ञानपीठ पुरस्कार चयन समिति (संथाली) और साहित्य अकादमी पुरस्कार चयन समिति (संथाली) के सदस्य हैं. वह सेंट्रल इंस्टिट्यूट ऑफ इंडियन लैंग्वेज (मैसूर) और ईस्टर्न रीजनल लैंग्वेज सेंटर, भुवनेश्वर के संथाली साहित्य अनुवादक हैं. इसके साथ ही संथाली साहित्य सिलेबस कमेटी (यूपीएससी, नई दिल्ली एवं जेपीएससी, रांची) के सदस्य हैं.
अवार्ड एवं सम्मान
डॉ भीमराव अंबेदकर फेलोशिप : दलित साहित्य अकादमी, नई दिल्ली.
भारत गौरव : इंटरनेशनल फ्रेंडशिप सोसायटी, नई दिल्ली.
स्मारक सम्मान : निलिख भारत बंग साहित्य सम्मेलन-2009
सेंटेनरी अवार्ड : गुरु गोमके पंडित रघुनाथ मुर्मू-2002
भाषा सम्मान : ऑल इंडिया रेडियो
संथाली साहित्यकार : कला संस्कृति विभाग, झारखंड सरकार
भाषा-साहित्य सम्मान : ट्राइबल कल्चरल सोसायटी, जमशेदपुर
साहित्य लेखन : हिंदी साहित्य सम्मेलन, जमशेदपुर
तुलसी जयंती सम्मान : जगत बंधु सेवा सदन पुस्तकालय, जमशेदपुर
स्मृति सम्मान : देवेंद्र मांझी फाउंडेशन, रांची
सद्भावना सम्मान : एनसीसी, 37वीं बटालियन, रक्षा मंत्रालय- भारत सरकार
हो-मुंडा संथाल उरांव सम्मान - अंतरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस




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