डिग्गी कल्याण मंदिर

Diggi Kalyann Mandir

Gk Exams at  2018-03-25


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GkExams on 14-01-2019

राजस्थान के टोंक जिले में स्थित डिग्गी कल्याण जी के मन्दिर में आस्था का सैलाब देखते ही बनता है। हर साल यहां लाखों भक्त यहां कई किलोमीटर का पैदल सफर कर दर्शन के लिए पहुंचते है। कई भक्त यहां पर कनक दंडवत करते हुए या फिर नंगे पांव पहुंचते है। श्रावण में यहां लक्खी मेला आयोजित होता है। इस दौरान जयपुर समेत कई शहरों से यहां पदयात्राएं आती है।
इस मन्दिर का पुर्ननिर्माण मेवाड़ के तत्कालीन राणा संग्राम सिंह के शासन काल में संवत् 1584 यानि वर्ष 1527 में हुआ था।

इस मन्दिर की स्थापना से एक रोचक कथा जुड़ी हुई है। एक बार इंद्र के दरबार में अप्सराएं नृत्य कर रही थीं। इस दौरान अप्सरा उर्वशी हंस पड़ी। इन्द्र नाराज हो गए और उन्होंने उर्वशी को 12 वर्ष तक मृत्युलोक में रहने का श्राप दिया। उर्वशी मृत्युलोक में सप्त ऋषियों के आश्रम में रहने लगी। सेवा से प्रसन्न होकर सप्त ऋषियों ने उससे वरदान मांगने को कहा तो उर्वशी ने वापस इंद्रलोक जाने की इच्छा प्रकट की। सप्त ऋषियों ने कहा कि ढूंढाड़ प्रदेश में राजा डिग्व राज्य करते हैं और तुम उनके राज्य में निवास करों, मुक्ति की राह मिलेगी। उर्वशी डिग्व राजा के क्षेत्र में चन्द्रगिरि पहाड़ पर रहने लगी। जो वर्तमान में चांदसेन के डूंगर के नाम से प्रसिद्ध है। इस पहाड़ के नीचे सुंदर बाग था जहां उर्वशी रात में घोड़ी का रूप धारण कर अपनी भूख मिटाती थी। इससे बाग को उजड़ने लगा तो परेषान राजा ने इस घोड़ी को देखते ही पकड़ने के आदेश दिए। संयोग से घोड़ी सबसे पहले राजा के पास से ही निकली तो राजा ने उसका पीछा किया।घोड़ी पहाड़ पर जाकर अप्सरा के रूप आ गई। जिसे देखकर राजा मुग्ध हो गए और उन्होंने उर्वशी को महल में रहने का निमंत्रण दिया।

उर्वषी ने इसे इस शर्त पर स्वीकार किया कि श्राप काल समाप्त होने पर उसे इन्द्र लेने आएंगे और डिग्व यदि इन्द्र को पराजित कर देंगे तो वह सदा के लिए महल में रहेगी लेकिन,ऐसा नहीं हुआ तो वह राजा को श्राप देगी। उर्वशी का श्राप काल समाप्त होते ही इन्द्र लेने आ गए और उन्होंने राजा से युद्ध किया। भगवान विष्णु ने राजा की सहायता की और जिससे राजा डिग्व हार गए। शर्त के मुताबिक उर्वशी ने पराजित राजा को कोढ़ी होने का श्राप दिया। लेकिन, भगवान विष्णु ने इस श्राप से मुक्ति की राह बताई। उन्होंने कहा कि कुछ समय बाद समुद्र में उन्हें मेरी यानि की विष्णु की मूर्ति मिलेगी, इसके दर्शन से श्राप से मुक्ति मिल जाएगी। राजा समुद्र के किनारे रहने लगे। एक दिन उनकी नजर वहां एक मूर्ति पर पड़ी और वह श्राप मुक्त हो गए। तभी वहां एक और दुखी व्यक्ति आ गया। उसने भी मूर्ति को देखा तो संकट दूर हो गया। अब दोनों के बीच इस मूर्ति के उत्तराधिकारी को लेकर विवाद हो गया। तभी आकाशवाणी होती है कि जो व्यक्ति रथ के अश्वों के स्थान पर स्वयं जुतकर प्रतिमा को ले जा सकेगा, वही उत्तराधिकारी होगा। दूसरा व्यक्ति इसमें असफल रहा और राजा इसे अपने राज्य में लेकर आ गए। मूर्ति की स्थापना उस स्थान पर की जहां उनका इंद्र के साथ युद्ध हुआ था।

यही स्थान आज का डिग्गीपुरी है और कल्याण जी के मन्दिर के नाम से प्रसिद्ध है। वैसे तो मन्दिर में रोजाना ही भक्तों की भीड़ रहती है लेकिन, प्रत्येक माह की पूर्णिमा को यहां मेला लगता है। इसके साथ ही वैशाख पूर्णिमा, श्रावण एकादषी एवं अमावस्या और जल झूलनी एकादशी को बड़ा मेला आयोजित होता है।



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