खरपतवार नियंत्रण की जैविक विधि

Kharpatwar Niyantran Ki Jaivik Vidhi

Gk Exams at  2018-03-25


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GkExams on 17-11-2018

जैविक कृषि में खरपतवार प्रबंधन


जैविक खेती में खरपतवार प्रबंधन तकनीकों की विस्तृत विवेचना से पूर्व यह जानना आवश्यक है कि खरपतवार क्या है अतः खरपतवार वह पौधा है जो कि किसी परिसिथति में कृषि के लिए लाभदायक की तुलना में अधिक हानिकारक या क्षतिकारक होते हैं ।
कृषि के प्रारंभिक समय से ही कृषक खेतों में उपसिथत खरपतवारों से संघर्ष करते रहे हैं । खरपतवार फसलों से जल सूर्य प्रकाश स्थान और पोषक तत्वों के लिए प्रतियोगिता करके फसल उत्पादन को घटा देते है । इनके अलावा और भी बहुत से हानिकार एवं अवानिछत प्रभाव खरपतवार के द्वारा फसल उत्पाद एवं पशु उत्पाद पर पड़ता है । जैविक खरपतवार नियंत्रण में निम्न तकनीकोंविधियों का उपयोग लाभकारी सिद्ध होगा ।

खरपतवार नियंत्रण का क्रांतिक काल

यह फसल के जीवन चक्र का वह काल होता है जबकि फसल की उत्पादन हानि से बचाव के लिए फसल को खरपतवार मुक्त रखा जाता है ।
फसल के क्रांतिक काल के समय खरपतवारों का नियंत्रण करना इसके नियंत्रण का क्रांतिक काल कहलाता है । इस समय खरपतवारों के नियंत्रण से फसल उत्पादन का स्तर फसल को पूरे फसल काल में खरपतवार मुक्त रखने से उत्पादन स्तर के बराबर होता है ।

खरपतवार नियंत्रण की विधियां

भूपरिष्करण भूपरिष्करण पद्धति मृदा में खरपतवारों के बीज कोष गति और दबे बीजों की गहराई को परिवर्तित कर देती है । जिससे ऊपरी सतह पर खरपतवारों का दबाव कम हो जाता है ।
1जुताई खरपतवारो के बीजों के अंकुरण में सहायक होती है जिससे इनको यांत्रिक विधियों से आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है।
2गर्मी की जुताई से बहुवर्षीय खरपतवारों की जड़ें बरोह कंद एवं प्रकंद आदि भूमि की सतह पर आ जाते हैंए जो सूर्य की तीव्र रोशनी से सूखकर मर जाते हैं ।
3जुताई करने से खरपतवार ऊखड़ जाते हैं या मिट्टी में गहराई पर दब कर नष्ट हो जाते हैं ।
स्वच्छता इसके द्वारा खेत में नए खरपतवारो के प्रवेश को रोकने के साथ-साथ खेतो में पहले से विध्यामान खरपतवारों द्वारा अधिक मात्रा में बीजों को पैदा करने से रोका जाता है । इसके साथ-साथ खेत के चारों ओर ऐसी हेज कतारें लगाना चाहिए जो कि हवा के द्वारा वितरित होने वाले खरपतवार के बीजों को खेत में आने से रोक सके ।
फसल चक्र विभिन्न फसलों को सुव्यवस्थित क्रम में परिवर्तन करके फसल उगाना फसल चक्र कहलाता है । फसल चक्र लम्बे समय के लिए खरपतवार नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण होता है । इसी प्रकार फसल चक्र में खेत को पड़ती छोड़ना बहुवर्षीय खरपतवारों को कम कर देता है । सामान्यतया एकवर्षीय खरपतवारों के नियंत्रण के लिए यह विधि अधिक लाभकारी होती है ।
आच्छादन फसलें ऐसी फसलें जिनका विकास तेजी से होता है एवं भूमि सतह को सघनता से आच्छादित कर लेती है खरपतवारो की वृद्धि को दबा देती है । इसके साथ-साथ आच्छादन फसलों के अवशेष सड़ने से विषैले रसायनों की उत्पतित होती है जो कि खरपतवार बीजों के अंकुरण एवं विकास में बाधा पहुंचाते हैं ।अन्तर्वर्ती खेती अन्तर्वर्ती खेती में मुख्य फसल की दो कतारों के बीच में ऐसी फसल लगा देना चाहिए जो कि खरपतवारों की वृद्धि को दबा देती है अंतर्वर्ती फसलों के लिए फसल का चुनाव इस प्रकार करना चाहिए उनके विकास को रोक देती है तथा मुख्य फसलों को भी प्रभावित नहीं करती है । पलवार का उपयोग मृदा सतह से उपर पलवार का उपयोग करना या मृदा सतह को कना खरपतवार के बीजों को अंकुरित होने में बाधा डालता है क्योंकि यह प्रकाश संचार को रोक देता है।
1सजीव पलवार सजीव पलवार वे पौधे प्रजातियां है जो अत्यधिक घनी उगती हैं एवं धरातल में पूर्ण से छा जाती है जैसे जंगली पालक बरसीम रिजका आदि । सजीव पलवार को फसल बुवाई या फसल स्थापित होने के पूर्व या बाद दोनों स्थितियों में लगाया जा सकता है । मृदा की संरचना में सुधार उर्वरा शक्ति में वृद्धि एवं पीड़क समस्या को कम करना होता है तथा खरपतवार नियंत्रण इसके द्वारा अतिरिक्त लाभ के रूप में होता है
2जैविक पलवार पलवार के रूप में कम्पोस्ट खाद पुआल सूखी घास पत्तियां पौधे की छाल फसल अवशेष इत्यादि का उपयोग किया जा सकता है । पलवार के रूप मे इनके द्वारा प्रभावी खरपतवार नियंत्रण होता है । कार्बनिक उपलवार के लिए समाचार पत्रों एवं पुआल का उपयोग बहुत ही प्रभावी होता है । धरातल में दो पर्ते समाचार पत्रों की एवं उसके कि मृदा में इसका जैव विच्छेदन आसानी से हो जाता है ।
फसलों की बुवाई का समयः बुवाई के समय में परिवर्तन करके खरपतवारों के प्रकोप को कम किया जा सकता है इन उगे हुए खरपतवारों को जुताई द्वारा नष्ट करने के बाद फसल की बुवाई करना लाभकारी होता है ।
किस्म का चुनावः जैविक कृषि में खरपतवार नियंत्रण हेतु ऐसी फसल किस्म का चुनाव करना चाहिए जो शीघ्र उगने वाली हो एवं उसका क्षेत्राच्छान अधिक हो ।

अन्तः सस्यन फसल किस्म के अनुसार खरपतवारों का वृद्धि काल होता है । इस अवस्था में निंदाई करने से फसल की वृद्धि अच्छी हो जाती है और बाद में उगने वाले खरपतवारों को यह पनपने नहीं देती है ।
सिंचाई एवं जल निकास नालियों के क्षेत्रफल में कमी खेत में उपलब्ध सिंचाई एवं जल निकास नालियों में भारी मात्राओं में खरपतवार पनपते रहते हैं और यहां से इनका फैलाव खेतों तक होता रहता है। इनके दबाव में कमी लाई जा सकती है ।
भूमिगत टपक सिंचाई खासतौर से फल वृक्षों एवं सब्जी फसलों में भूमिगत टपक सिंचाई करने से सिंचाई जल का उपयोग केवल फसलों द्वारा ही किया जाता है । इस प्रकार यह तकनीक खरपतवार नियंत्रण में सार्थक परिणाम देता है ।

यांत्रिक विधियां

खरपतवारो को हाथ से ऊखाड़ना खरपतवारों की वृद्धि जब इतनी हो जाये कि इन्हें हाथ से पकड़ा जा सके तब इन्हें ऊखाड़कर फसल क्षेत्र से अलग कर नष्ट कर देना चाहिए ।हस्तचलित यंत्रो से निराई गुड़ाई करना हस्तचलित यंत्रों का प्रयोग करके खरपतवारों को नष्ट किया जा सकता है । इसी प्रकार एकवर्षीय खरपतवारों को उनमें बीज बनने से पहले निकाल देने से इन पर नियंत्रण पाया जा सकता है ।
बंसजया द्वारा खरपतवार नियंत्रण करना पानी की पर्याप्त मात्रा की उपलब्धता में खरपतवारों को पानी में डुबाकर रखा जाता है परिणामस्वरूप खरपतवारों में पौधों को प्रकाश एवं श्वसन के लिए आक्सीजन की कमी पड़ती है।

तापीय खरपतवार नियंत्रण

फलेमर्स खरपतवार नियंत्रण में फलेमर्स बहुत ही उपयोगी सिद्ध हुए हैं । तापीय खरपतवार नियंत्रण में फलेमर्स यंत्रों का उपयोग फलेम एवं पौधों के बीच सीधा संपर्क बनाने के लिए किया जाता है । फल बगानों जैसे सेव एवं नाषपाती के बगानों में फलेमिंग उपचार खरपतवारों की वृद्धि को रोकने में सफल पाया गया है ।
जैविक विधियां जैविक कृषि में खरपतवार नियंत्रण की जैविक विधियां अत्यधिक सफल सिद्ध हो सकती है ।
एलीलोपैथी एलीलोपैथी किसी पौधे का दूसरे पड़ोसी पौधे के अकुरण वृद्धि एवं विकास पर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रासायनिक प्रभाव होता है। एलीलोपैथिक रसायन बेन्जोइकएसिड सिनामिक एसिड फिनालिक एसिड बेन्जो किवनिन् हाइड्रोकिवनिन्स क्युमैरिन्स थियोपिन्स साइनीओल्स आदि का गौड़ पदार्थ है ।
लाभदायी जीवधारी खरपतवारों की संख्या के प्रबंधन के लिए परभक्षी एवं परपोषी सूक्ष्म जीवों एवं कीटों के उपयोग पर बहुत कम अनुसंधान किया गया है । जलीय खरपतवार सैलविनिया के लिए घुन स्केलेटान खरपतवार के लिए चूर्णी एवं नागफनी आदि ।



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