क़ुतुब मीनार पर कविता

क़ुतुब Meenar Par Kavita

Pradeep Chawla on 12-05-2019

एक ऐतिहासिक कविता -क़ुतुब मीनार -



कौन हो तुम ?

वराहमिहिर की महरौली की वेध शाला ,

चन्द्र गुप्त का गरुणध्वज या कुवतुल उल इस्लाम मस्जिद की मीनार ?

जय पराजय का स्तम्भ , युग का बोध या यथार्थ ?

कुतुबुद्दीन काकी का समान , या इस्लाम की विजय का स्मारक ?



तुम स्थापत्य की शैली हो या इस्लामी साम्राज्यवाद का शेष सामंती चिन्ह

हिन्दू राजाओं के पराजय की टीस या तुर्की गुलाम वंश के अंदर के गुलाम शब्द का गूढार्थ

संस्कृत के शब्दों पर फ़ारसी भाषा का जय गीत ।

हाँ पत्थरो का युग से संघर्ष , संस्कृत की जिजीविषा ,

मिटाने के बाद भी न मिटी मूर्तियों की घोषणा ।

कमल , और घण्टो के चिन्ह सरस्वती की खंडित प्रतिमा

तुम्हे जितना खोजा गया होती गयी उतनी ही रहस्य पूर्ण ।

पत्थरो पर उत्कीर्ण सभ्यताओं का संघर्ष

क्योकि तुम्हारे ऊपर चढ़ कर दी गयी अजान नही सुनाई देती नमाजियों को ।

कहते है तुम्हे बनवाया ऐबक ने तोड़ कर विष्णु मंदिर को ,यह की निर्माण जारी रहा तुम्हारा अल्तमश तक ,यह भी कि बनाया गया अलाई दरवाजा तुम तक जाने के लिए ।

इस दरवाजे से निकला मलिक काफ़ूर सुदूर दक्षिण के लिए हरे झंडे को नीले समंदर में स्थापित करने बनाने दूसरा सिकन्दर अपने स्वामी को ।

क़ुतुब तुम कभी चैन से नही रही

भूकम्प और बिजलियां कड़कती रही तुम्हारे ऊपर ,

फिरोज तुगलक , तथा सिकन्दर नव निर्माण करके देते रहे सहारा तुम्हे ।

ताकि उन पर उत्कीर्ण पाक कुरआन की आयतें लिखी रह सके युगों तक ।

चौड़ा रहे सीना इस्लाम का इसलिए तुम अविचल खड़ी रही इंद्रप्रस्थ के वक्ष पर ।

तुमने दिल्ली को 9 या अधिक बार बसते देखा ।

अपनी ऊपरी मंजिल से जहाँ ब्रहम्मा की मूर्ति हटा दी गयी थी ।

तुमने देखा तैमूर को , नादिर को और हडसन को कत्लेआम करते जिन्हें लाल रक्त से हरा इतिहास लिखना था ।

तुमने इंद्रप्रस्थ को ढिल्लिका से देहली और नयी दिल्ली बनते ।

तुम किंचित हुई कमजोर पर तुम्हे सहारा मिला होगा उस लोहा स्तम्भ से जिसे इस्पात की जगह समझा गया पत्थर का ।

जिस पर लिखा गया था यशगान विक्रमादित्य का बाह्लीक तक म्लेक्ष सेना को खदेड़ने का ।

तुमारे आगोश में गरुड़ ध्वज का स्वतंत्र अस्तित्त्व

जिसे तुम चाहा के भी न मिटा सकी ।

और तुम से बड़ा जीवित सत्य अपराजित पलता रहा ठीक तुम्हारे नीचे ।

क़ुतुब मीनार ?

तुमने मंदिर से मस्जिद तक की यात्रा की पर अंततः प्रेमियों के प्रेम की व्यथा ने तुम्हे बना दिया आत्महत्या का स्थान ।

शायद इसलिए लगा दिए गए ताले और कैद कर दिया गया तुम्हारी ऊँचाई को इस वक्त ने ।

देखते है कब तक तुम अपने अस्तित्त्व कायम रखोगी और उस द्वन्द को जो छिपा है तुम्हारे अंदर तुम्हारे अस्तित्त्व की तरह ।।।।।



Comments Nakul yadav on 20-09-2018

Duniya ke sat ajubo ke nam kya hia



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