किशोरावस्था का निष्कर्ष

Kishoravastha Ka Nishkarsh

Gk Exams at  2018-03-25


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Pradeep Chawla on 12-05-2019



किशोरावस्था

शब्द अंग्रजी भाषा के
Adolescence शब्द का हिंदी पर्याय है। Adolescence शब्द का उद्भव लेटिन भाषा से माना गया है जिसका

सामान्य अर्थ है बढ़ाना या विकसित होना।
बाल्यावस्था से प्रौढ़ावस्था तक के महत्वपूर्ण परिवर्तनों जैसे शारीरिक, मानसिक एवं अल्पबौधिक परिवर्तनों की अवस्था

किशोरावस्था है। वस्तुतः किशोरावस्था यौवानारम्भ से परिपक्वता
तक वृद्धि एवं विकास का काल है। 10 वर्ष की आयु से 19 वर्ष तक की आयु के इस काल में शारीरिक तथा भावनात्मक सरूप

से अत्यधिक महवपूर्ण
परिवर्तन आते हैं।




किशोरावस्था की

प्रवृतियां एवं लक्षण




मानव विकास की चार अवस्थाएं मानी गयी हैं

बचपन
,

किशोरावस्था, युवावस्था और प्रौढावस्था। यह विकास शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप में होता रहता है।

किशोरावस्था सबसे अधिक परिवर्तनशील अवधी
है। किशोरावस्था के निम्लिखित महत्वपूर्ण लक्षण इसकी अन्य अवस्थाओं से भिन्नता को प्रकट करते हैं-









1.

शारीरिक

परिवर्तन



किशोरावस्था में

तीव्रता से शारीरिक विकास और मानसिक परिवर्तन होते हैं। विकास की प्रक्रिया के

कारण अंगों में भी परिवर्तन आता है
, जो व्यक्तिगत प्रजनन परिपक्वता को प्राप्त करते हैं। इनका

सीधा सम्बन्ध यौन विकास से है।




2.

मनौवैज्ञानिक

परिवर्तन



किशोरावस्था

मानसिक
,

भौतिक और भावनात्मक परिपक्वता के विकास की भी

अवस्था है। एक किशोर
,

छोटे बच्चे की

तरह किसी दूसरे पर निर्भर रहने की उपेक्षा
, प्रौढ़ व्यक्ति की तरह स्वतंत्र रहने की इच्छा प्रकट करता

है। इस समय किशोर पहली बार तीव्र यौन इच्छा का अनुभ करता है
, इसी कारण विपरीत लिंग के प्रति आकर्षित रहता

है। इस अवस्था में किशोर मानसिक तनाव से ग्रस्त रहता है यह अवस्था अत्यंत

संवेदनशील मानी गयी है।









3.

सामाजिक सांस्कृतिक परिवर्तन


किशोरों में

सामजिक-सांस्कृतिक मेलजोल के फलस्वरूप कुछ और परिवर्तन भी आते हैं। सामान्यता:

समाज किशोरों की भूमिका को निश्चित रूप में परिभाषित नहीं करता। फलस्वरूप किशोर

बाल्यावस्था और प्रौढावस्था के मध्य अपने को असमंजस
की स्थिति में पाते हैं। उनकी मनौवैज्ञानिक

आवश्यकताओं
को समाज द्वार महत्व नहीं दिया जाता, इसी कारण उनमें क्रोध, तनाव एवं व्यग्रता की प्रवृतिया उत्पन्न होती हैं।

किशोरावस्था में अन्य अवस्थाओं की उपेक्षा उत्तेजना एवं भावनात्मकता अधिक प्रबल

होती है।




4.

व्यवहारिक परिवर्तन




उपयुक्त परिवर्तनों के कारण किशोरों के

व्यवहार में निम्न लक्षण उजागर होते हैं –




A. स्वतन्त्रता


शारीरिक, मानसिक और सामाजिक परिपक्वता की प्रक्रिया से

गुजरते हुए किशोरों में स्वतंत्र रहने की प्रवृति जाग्रत होती है। जिससे वे अपने

आप को प्रौढ़ समाज से दूर रखना प्रारंभ करते हैं।आधुनिक युग का किशोरे अलग रूप से

ही अपनी संस्कृति का निर्माण करना चाहता है जिसे उप संस्कृति का नाम दिया जा सकता

है। यह उप-संस्कृति धीरे-धीरे समाज में विधमान मूल संस्कृति को प्रभावित करती है।




B. पहचान


किशोर हर स्तर

पर अपनी अलग पहचान बनाने केलिए संघर्ष
करते हैं। वे अपनी पहचान बनाए रखें के लिए

लिंग भेद तथा अपने को अन्य से उच्च एवं योग्य दर्शाने के प्रयास में होते हैं।




C. धनिष्ठता


किशोरावस्था के

दौरान कुछ आधारभूत परिवर्तन होते हैं। ये परिवर्तन अधिकतर यौन संबंधों के क्षेत्र

के होते हैं। किशोरों में अचानक विपरीत लिंग के प्रति रुचि उत्पन्न होती है। वे

आकर्षण एवं प्रेम के मध्य अंतर स्पष्ट नहीं कर पाते और मात्र
शारीरिक आनंद एवं संतुष्टि के लिए सदैव भटके

रहते हैं।




D. समवय समूहों पर

निर्भरता



अपनी पहचान व

स्वतन्त्रा को बनाए रखने के लिए
, किशोरे अपने माता-पिता के भावनात्मक बंधनों को त्याग कर

अपने मित्रों के साध ही रहना पसंद करते हैं। परन्तु समाज लड़के-लड़कियों के

स्वतन्त्र मेलजोल को स्वीकृत नहीं करता। किशोरों का प्रत्येक वर्ग अपने लिंग से

सम्बंधित एक अलग समूह बनाकर अलग में रहना पसंद करता है। इस तरह की गतिविधियाँ

उन्हें समवाय समूहों पर निर्भर रहने के लिए प्रोत्साहित करती है। यहीं से ही वे

अपने परिवर्तित व्यवहार के प्रति समर्थन एवं स्वीकृति प्राप्त करते हैं।




E. बुद्धिमता


बौद्धिक क्षमता

का विकास भी किशोरों के व्यवहार से प्रदर्शित
होता है। उनमें तथ्यों पर आधारित सोच-समझ व

तर्कशील निर्णय लेने की क्षमता उत्पन्न होती है। ये सभी कारण उनमें आत्मानुभूति को

विकास करते हैं।




विकास की अवस्थाएं


किशोरावस्था के

तीन चरण हैं



क) पूर्व

किशोरावस्था



ख) मूल किशोरावस्था


ग) किशोरावस्था का

अंतिम चरण




यहाँ यह ध्यान

देने योग्य है कि विकास निर्धारित नियमानुसार ही नहीं होता इसी कारण तीनों चरण

एक-दूसरे की सीमाओं का उल्लंघन करते हैं।




क) पूर्व

किशोरावस्था



विकास की यह

अवस्था किशोरावस्था का प्रारंभिक चरण है। पूर्व किशोरावस्था के इस चरण में शारीरिक

विकास अचानक एवं झलकता है। यह परिवर्तन भिन्न किशोरों में भिन्न-भिन्न प्रकार से

होता है। इस समय टांगों और भुजाओं की लम्बी हड्डियों का विकास तीव्रता से होता है।

किशोर की लम्बाई
8 से 9 इंच तक प्रतिवर्ष बढ़ सकती है। लिंग-भेद के कारण लम्बाई अधिक

बढ़ती है। इस समय किशोर तीव्र सामाजिक विकास और अपने में गतिशील यौन विकास का
अनुभव करते हैं। वे अपने समवय समूहों में जाने की

चेष्टा करते हैं। इस स्तर
पर प्यारे दोस्तों का ही महत्व रह जाता है। किशोर अपने-अपने लिंग से

सम्बंधित समूहों का निर्माण करते हैं। यौन सम्बंधित सोच एवं यौन प्रदर्शन इस स्तर

पर प्रारंभ हो जाता है। कुछ अभिभावक इस सामान्य वयवहार को स्वीकृत नहीं करते और

किशोरों को दोषी ठहराते हैं। विकास के इस चरण में शारीरिक परिवर्तन से किशोर

प्राय: घबरा जाते हैं। वे सामाजिक- सांस्कृतिक सीमाओं और यौन इच्छाओं के मध्य

संतुलन बनाने का प्रयास करते हैं।




ख) मूल किशोरावस्था


किशोरावस्था का

यह चरण शारीरिक
,

भावनात्मक और

बौधिक क्षमताओं के विकास को दर्शाता है। इस चरण में यौन लक्षणों का विकास जारी

रहता है तथा प्रजनन अंग
,

शुक्राणु

उत्पन्न करने में सक्षम हो जाते हैं। इस समय किशोर अपने को अभिभावकों से दूर रखने

का प्रयास करते हैं। वह प्राय: आदर्शवादी बनते हैं और यौन के विषय में जाने की

उनकी रुचि निरंतर बढ़ती रहती है। किशोर के विकास का यह चरण प्रयोग और साहस से भरा

होता है। प्रत्येक किशोर अपने से विपरीत लिंग और समवाय समूहों से सम्बन्ध रखना

चाहता है। किशोर इस चरण में समाज में अपने अस्तित्व को जानना चाहता है और समाज को

अपना योगदान देना चाहता है। किशोर की मानसिकता इस स्थिति में और अधिक जटिल बन जाती

है। उसकी भावना गहरी और घनिष्ट हो जाती है और उनमें निर्णय लेने की शक्ति उत्पन्न

हो जाती है।




ग) किशोरावस्था का अंतिम चरण


किशोरावस्था के

इस चरण में अप्रधान यौन लक्षण भली प्रकार से विकसित हो जाते हैं और यौन अंग प्रौढ़

कार्यकलाप में भी सक्षम हो जाते हैं। किशोर समाज में अपनी अलग पहचान और स्थान की

आकांशा रखता है। उनकी यह पहचान बाहरी दुनिया के वास्तविक दृश्य से अलग ही होती है।

इस समय उनका समवाय समूह कम महत्व रखता है क्योंकि अब मित्रों के चयन की प्रवृति

अधिक होती है।




किशोर इस समय

अपने जीवन के लक्ष्य को समक्ष रखता है। हालांकि आर्थिक रूप से वह कई वर्षों तक

अभिभावक पर ही निर्भर करता है। इस चरण में किशोरे सही व गलत मूल्यों की पहचान करता

है तथा उसके अन्दर नैतिकता इत्यादि भावनाओं का विकास होता है। इस समय किशोर अपना

भविष्य बनाने के अभिलाषी होते हैं। उपयुक्त कार्य के लिए वे अभिभावकों एवं समाज का

समर्थन चाहते हैं ताकि उनके द्वारा उपेक्षित कार्यों का सम्पादन हो।









किशोरावस्था की

समस्याएं




किशोरावस्था एक ऐसी संवेदनशील अवधि है जब व्यक्तित्व में बहुत महत्वपूर्ण परिवर्तन आते

हैं। वे परिवर्तन इतने आकस्मिक और तीव्र होते हैं कि उनसे कई समस्याओं का जन्म

होता है। यघपि
किशोर इन परिवर्तनों को अनुभव तो करते हैं पर वे प्राय: इन्हें समझने में

असमर्थ होते हैं। अभी तक उनके पास कोई ऐसा स्रोत उपलब्ध नहीं है जिसके माध्यम से

वे इन परिवर्तनों के विषय में वैज्ञानिक जानकारी प्राप्त कर सकें। किन्तु उन्हें

इन परिवर्तनों और विकास के बारे में जानकारी चाहिए
, इसलिये वे इसके लिए या तो सम-आयु समूह की मदद लेते हैं, या फिर गुमराह करने वाले सस्ते साहित्य पर

निर्भर हो जाते हैं। गलत सूचनाएं मिलने के कारण वे अक्सर कई भ्रांतियों का शिकार

हो जाते हैं जिससे उनके व्यक्तित्व विकास पर कुप्रभाव पड़ता है।




किशोरों को

इसलिये भी समस्याएं आते है क्योंकि वे विपरीत लिंग के प्रति एकाएक जाग्रत रुचि को

ठीक से समझ नहीं पाने। माँ बाप से दूर हटने की प्रवृति और सम-आयु समूह के साथ गहन

मेल-मिलाप भी उनके मन में संशय और चिंता पैदा करता है। किन्तु परिजनों के उचित

मार्गदर्शन के अभाव में उन्हें सम-आयु समूह की ही ओर उन्मुख होना पड़ता है। प्राय:

देखा गया है कि किशोर सम-आयु समूह के दबाव के सामने विवश हो जाते हैं और उन में से

कुछ तो बिना परिणामों को सोचे अनुचित कार्य करने
पर मजबूर हो जाते हैं। कुछ सिगरेट, शराब, मादक द्रव्यों का सेवन करने लगते हैं और कुछ यौनाचार की ओर

भी आकर्षित हो जाते हैं और इस सब के पीछे सम-आयु समूह का दबाव आदि कई कारण हो सकते

हैं।




किशोरावस्था शिक्षा

जरूरी क्यों
?




किशोरावस्था

शिक्षा विद्यार्थियों के किशोरावस्था के बारे में जानकारी प्रदान करने की आवश्यकता

के सन्दर्भ में उभरी एक
नवीन शिक्षा का नाम है। किशोरावस्था जो कि बचपन और

युवावस्था के बीच का परिवर्तन काल है
, को मानवीय जीवन की एक पृथक अवस्था के रूप में मान्यता केवल

बीसवीं शताब्ती के अंत में ही मिला पायी। हजारों सालों तक मानव विकास की केवल तीन

अवस्थाएं


बचपन, युवावस्था और बुढ़ापा ही मानी जाती रही है।

कृषि प्रधान व ग्रामीण संस्कृति वाले भारतीय व अन्य समाजों में यह धारणा है कि

व्यक्ति बचपन से सीधा प्रौढावस्था में प्रवेश करता है। अभी तक बच्चों को छोटी आयु

में ही प्रौढ़ व्यक्तियों के उत्तरदायित्व को समझने और वहां करने पर बाध्य किया

जाता रहा है। युवक पौढ पुरुषों के कामकाज में हाथ बंटाते रहे हैं और लडकियां घर

के। बाल विवाह की कुप्रथा तो बच्चों को यथाशीग्र प्रौढ़ भूमिका में धकेल देती रही

है। विवाह से पूर्व या विवाह होते ही बच्चों को यह जाने पर बाध्य किया जाता रहा है

कि वे प्रौढ़ हो गए हैं।



लेकिन अब कई

नवीन सामाजिक और आर्थिक धारणाओं की वजह से स्थिति में काफी परिवर्तन आ गया है।

शिक्षा और रोजगार के बढ़ते हुए अवसरों के कारण विवाह करने की आयु भी बढ़ गयी है।

ज्यादा से ज्यादा बच्चे घरों और कस्बों से बाहर निकल कर प्राथमिक स्तर से आगे

शिक्षा प्राप्त करते हैं। उनमें से अधिकतर शिक्षा व रोजगार की खोज में शहरों की ओर

पलायन कर जाते हैं। देश के अधिकतर भागों में बाल विवाह की घटनाएं न्यूनतम स्तर पर

पहुँच गयी है। लडकियां भी बड़ी संख्या में शिक्षा ग्रहण कर रही हैं।




जिसके फलस्वरूप

वे भी शीग्र ही वैवाहिक बंधन में बंधना नहीं चाहतीं। इस मानसिक परिवर्तन में संचार

माध्यमों की भी महती भूमिका रही है। एक ओर विवाह की आयु में वृद्धि हो गयी है और

दूसरी ओर बच्चों में बेहतर स्वास्थ और पोषण सुविधाओं के कारण यौवानारम्भ निर्धारित

आयु से पहले ही हो जाता है। इन परिवर्तनों के कारण बचपन और प्रौढावस्था में काफे

अंतर पढ़ गया है। इस कारण अब व्यक्ति की आयु में एक ऐसी लम्बी अवधि आती है जब उसे न

तो बच्चा समझा जाता है और न ही प्रौढ़ का दर्जा दिया जाता है। जीवन के इसी काल को

किशोरावस्था कहते हैं।




निष्कर्ष:-




आपके जीवन में तमाम तरह की परिस्थितियां आती हैं। ध्यान

रखें कि वो सिर्फ परिस्थितियां ही होती हैं। अब इनमें से कुछ को आप संभाल पाते हैं

और कुछ को संभाल नहीं पाते। जिस स्थिति को आप संभाल नहीं पाते
, उसे आप एक समस्या

मानने लगते हैं
, बजाय

इसके कि आप उसे सिर्फ एक स्थिति के तौर पर देखते और उसे संभालने के लिए खुद को

तैयार करने की कोशिश करते। तो कैसे करें खुद को तैयार
? अगर आप भी एक

किशोर बच्चे के माता या पिता हैं या आपका बच्चा किशोरावस्था की तरफ बढ़ रहा है तो

आप सिर्फ पांच बातों का ख्याल रखें
, यह अवस्था न केवल आपके बच्चे के लिए बल्कि आपके लिए भी

सुखद अहसास बन सकती है।




1- उनके अच्छे दोस्त बनें




अगर आप एक किशोर की नजर से जिदंगी को देखें तो उनके भीतर

जिंदगी रोज बदल रही है। चूंकि किशोर बहुते तेजी से बढ़ रहे हैं
, इसलिए उनके आसपास

के लोग उस वृद्धि को समझ पाने में सक्षम नहीं होते। आमतौर पर दादा-दादी या

नाना-नानी इन बच्चों के प्रति ज्यादा लगाव और प्रेम रखते हैं। इसकी वजह है कि वे

चीजों को एक थोड़ी दूरी के साथ देख रहे होते हैं। किशोरावस्था में आप धीरे-धीरे

अपने हॉरमोन के वश में आ जाते हैं। जबकि बुढ़ापे का मतलब है कि आप हारमोन्स के

नियंत्रण से बाहर निकलने लगते हैं। इसलिए बुजुर्ग लोग किशोरों की मानसिकता को

थोड़ा समझ पाते हैं। लेकिन जो मध्य आयु के होते हैं
, उनलोगों को किशोरों की मानसिकता के बारे

में अधिक जानकारी नहीं होती। अगर ऐतिहासिक दृष्टि से भी देखा जाए तो मध्य आयु

हमेशा से एक भ्रमित मानसिकता का शिकार रही है।









किशोरावस्था के कई पहलू होते हैं। पहली चीज, उनकी प्रतिभा या

बुद्धि हारमोनों द्वारा संचालित होने लगती है। अचानक उनको पूरी दुनिया काफ़ी अलग सी

नजर आने लगती है। अभी तक उनके आसपास जो लोग होते हैं
, वो अचानक उनको

स्त्री और पुरुष के रूप में नजर आने लगते हैं
, यानी लिंग-भेद के प्रति वो अधिक सचेत हो उठते हैं। और

इस वजह से इंसान की सिर्फ आधी आबादी में उनका रुझान होने लगता है। यह अपने आप में

एक बड़ा बदलाव है। माता-पिता को यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि किशोरों के लिए

यह स्थिति नई है और वो उससे तालमेल बैठाने की कोशिश कर रहे हैं।




अगर आप उनके अच्छे दोस्त हैं और उनको कोई समस्या आती है तो

वे इसके बारे में आपसे बात करेंगे। लेकिन अधिकतर माता-पिता अपने बच्चों के बहुत

खराब दोस्त होते हैं
, इसलिए वे

बेचारे अपने लिए दूसरे दोस्त बनाते हैं। चूंकि उनके दोस्त भी उसी अवस्था और

मानसिकता से गुजर रहे होते हैं
, इसलिए वे उनको बेतुकी सलाह ही देते हैं। बेहतर स्थिति तो यह

है कि अगर उन्हें कोई समस्या है तो वो आपके पास आएं
, लेकिन अगर आप खुद को बॉस समझते हैं तो वे

आपके पास नहीं आएंगे। अगर आपको लगता है कि उनके जीवन पर आपका मालिकाना हक है
,या अगर आप एक

भयंकर माता-पिता हैं तो वे आपके पास नहीं आएंगे।




अगर आप उनके अच्छे मित्र हैं तो वे आपके पास जरूर आएंगे, क्योंकि जब भी

उन्हें कोई समस्या होगी तो वे स्वाभाविक रूप से एक दोस्त को तलाशेंगे। इसलिए आपकी

पूरी कोशिश होनी चाहिए कि कम उम्र से ही आप उनके सबसे अच्छे दोस्त बनें
, और कम से कम तब

तक बने रहें जब तक वो
18 से 20 साल के न हो

जाएं। दोस्ती का यह भरोसा आपको अर्जित करना होगा। यह महज इसलिए नहीं होगा
, क्योंकि आपने

उन्हें पैदा किया है। उन्हें पैदा करने के चलते आपको माता-पिता की उपाधि तो मिल गई

है
, लेकिन

दोस्त की नहीं। इस चीज को हासिल करने के लिए आपको रोज जिम्मेदारी भरा व्यवहार करना

होगा।




2- उन्हें जिम्मेदार बनाएं




आप अपने किशोरों के साथ निबटने की कोशिश न करें, बल्कि खुद को

उनके लिए हमेशा उपलब्ध रखें। उन्हें हर चीज या काम के लिए जिम्मेदार बनाएं। कभी

इतनी हिम्मत दिखाएं कि कम से कम एक महीने अपनी पूरी तनख्वाह उन्हें सौंप दें और

उन्हें घर चलाने की जिम्मेदारी दे दें। आपको बड़े पैमाने पर बदलाव दिखेगा। अगर आप

वाकई अपने बच्चे के साथ कुछ करना चाहते हैं तो आपको उन्हें अपने विस्तार का मौका

देना चाहिए
, क्योंकि

यही तो वो भी करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इस समय सिर्फ उनका शरीर ही

बढ़ रहा है
, बल्कि

बतौर इंसान उनकी क्षमता भी बढ़ रही है। इसलिए उनके उस विस्तार को रोकने की बजाय

आपकी कोशिश उस विस्तार को बढ़ावा देने की होनी चाहिए।




अगर आप इस विस्तार को रोकने की कोशिश करेंगे तो आपको बहुत

ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ेगा। अगर आपको बेटा है तो आपकी समस्या एक तरह की

होगी
, लेकिन

अगर आपकी बेटी है तो आपको दूसरी तरह की समस्या का सामना करना पड़ेगा। यह कभी मत

सोचिए कि बच्चों को रोकना या काबू करना उनके जीवन को नियंत्रित करने का उचित तरीका

है। जिम्मेदारी उन्हें रास्ते पर रखेगी। जैसा कि मैंने आपसे कहा कि आप एक महीना

अपना पैसा उन्हें दें और उनसे कहें कि आप छुट्टी पर हैं और उन्हें घर चलाना है।

अगर आपको डर है कि वह इस पैसे को बाहर जाकर कहीं उड़ा देंगे
, तो चिंता मत

कीजिए
, जो

दिक्कत आपको आएगी वही दिक्कत उनको भी आएगी। उन्हें भी कम से कम एक महीने के लिए इस

हालात से गुजरने दीजिए। बेशक
, आप अपने पास कुछ अलग से पैसा रख सकते हैं, लेकिन उन्हें भी

अहसास होने दीजिए कि अगर आज उन्होंने सारा पैसा उड़ा दिया तो कल सुबह नाश्ता भी

नहीं मिल पाएगा। इसलिए सडक़ पर या बाहर निकल कर बच्चे को हकीकत का अहसास कराने और

सिखाने से बेहतर होगा कि उन्हें इसका अहसास घर के भीतर एक सुरक्षित माहौल में

कराया जाए।




4- उन पर अधिकार मत जताइए, उन्हें शामिल कीजिए




सबसे पहले तो इस विचार को छोड़ दीजिए कि बच्चे के जीवन पर

आपका अधिकार है। अगर आप ऐसा सोचते हैं तो किशोरावस्था में आने के बाद वे आपको अपने

तरीके से बताएंगे कि उनके जीवन पर आपका हक नहीं है। ये किशोर सिर्फ आपको इतना ही

बताने की कोशिश कर रहे हैं
,

लेकिन आप इनकी इस बात को हजम करने के लिए तैयार नहीं हैं। किसी दूसरे के जीवन

पर आपका कोई हक नहीं है। अगर कोई दूसरा जीवन आपके साथ रहने का फैसला करता है तो

खुशी मनाइए
, यह अपने

आप में एक शानदार चीज है। फिर चाहे वो आपके पति हों
, पत्नी हो या बच्चे। इसकी अहमियत समझिए कि

उन्होंने जीवन में आने के लिए आपको जरिए के रूप में चुना या जीवन जीने के लिए आपके

साथ आने का फैसला किया। इसलिए आप किसी भी तरह से उन पर अधिकार नहीं जमा सकते। अगर

आप अभी यह बात नहीं समझे तो आपको यह बात तब समझ में आएगी
, जब आप मरेंगे या

जब वे मरेंगे। आपका उन पर मालिकाना हक नहीं है
, लेकिन बेशक आपको उन्हें अपनी जिंदगी में साथ लेकर और

शामिल करके चलना चाहिए।




5- अपने लिए कुछ कीजिए




अगर हम वाकई अपने बच्चों का बेहतर पालन पोषण करना चाहते हैं

तो सबसे पहले हमें यह देखना चाहिए कि हम अपने लिए क्या कर सकते हैं। जो लोग अभी

माता-पिता बनना चाहते हैं या बनने वाले हैं
, उन्हें एक छोटा सा प्रयोग करना चाहिए। उन्हें आराम से

बैठ कर आत्मविश्लेषण करना चाहिए कि क्या चीज उनकी जीवन में ठीक नहीं है और क्या

उनके जीवन के लिए बेहतर होगा। इसमें उन चीजों पर गौर नहीं करना चाहिए
, जो बाहरी दुनिया

से संबंधित है
, क्योंकि

इसमें उन्हें बाहरी लोगों का सहयोग लेना पड़ेगा। उन्हें सिर्फ अपने से जुड़े

पहलुओं पर गौर करना चाहिए। उन्हें देखना चाहिए कि क्या अगले तीन महीने में वे अपने

में बदलाव ला पाते हैं।




अगले तीन महीने के भीतर अपनी किसी चीज पर मसलन अपने व्यवहार, बोली, काम करने के

तरीके या आदतों में आप सुधार ला पाते हैं तो आप अपने बेटे या बेटी को विवेकपूर्ण

तरीके से संभालने के लिए तैयार हैं। अगर ऐसा नहीं है तो आपको दूसरों की सलाह और

सुझाव से बच्चे पालने होंगे। हालांकि इस मामले में सलाह जैसी कोई चीज नहीं होती।

इसमें हरेक बच्चे का अच्छी तरह से निरीक्षण औैर परख करके देखना होता है कि उस

बच्चे के साथ क्या किया जा सकता है और क्या नहीं। आप एक जैसी चीज हर बच्चे के साथ

नहीं कर सकते
, क्योंकि

हर बच्चे में एक अलग जीवन
,

एक अलग तरीके से घटित हो रहा है।



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