Shaishavavastha Ka Mahatva शैशवावस्था का महत्व

शैशवावस्था का महत्व



Pradeep Chawla on 18-10-2018

न्म से लेकर एक माह तक की अवधि को नवजात शैशवावस्था कहा जाता हैं| अति अल्प होने पर भी विकास की दृष्टि से इस अवधि का महत्व बहुत अधिक है| शिशु जन्म के बाद का एक महीना, विकास एवं परिवेश के साथ समायोजन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है इसीलिए यह अवधि नवजात शिशु अवस्था कही जाती है|

विकास

पूर्व धारणा थी कि नवजात अत्यंत सुकूमार, अक्षम एवं निष्क्रिय होते हैं जिनका अपना पुष्पित, गुँजित एवं भ्रांतिपूर्ण संसार होता है (विलियम्स जेम्स, 1889) परंतु समय बदलने के साथ नवजात शिशु के प्रति अभिवृत्तियों में परिवर्तन हुआ है की जन्म के साथ ही शिशु में अपार क्षमताएँ विद्यमान रहती हैं| शैशवावस्था के अंत तक उसमें स्वाग्रह, सामाजिकता एवं उद्देश्य मूलक क्रिया – कलापों की अभिव्यक्ति देखी जा सकती है | साथ ही उसकी भाषा अर्जन क्षमता के प्रति उन्मुखता भी दृष्टिगत होने लगती है|


नवजात शैशवावस्था में विकास बड़ी तेजी से होता है| शिशु में इतनी कम अवधि में इतनी अधिक क्षमताओं का आ जाना अनुसंधानकर्ताओं की जिज्ञासा का विषय है| नवजात में विद्यमान आपर क्षमताओं में कौन – कौन सी विशेषताएँ पहले अभिव्यक्त होती हैं तथा किन क्षमताओं की अभिव्यक्ति परिपक्वता के उपरांत होती है ? वे कौन – कौन सी क्षमताओं हैं, जिनका विकास भौतिक एवं सामाजिक जगत के साथ अंत:क्रिया के पश्चात् होता है? इन सभी प्रश्नों का उत्तर, प्रस्तुत अध्याय के अंतर्गत शोध साक्ष्यों के आधार पर दिया गया है|

नवजात शिशु का विवरण

जन्म से एक माह तक का शिशु नवजात कहलाता है| यह अवधि महत्त्वपूर्ण समायोजन की अवधि कही जाती है क्योंकी गर्भ में शिशु का विकास अत्यंत सुरक्षित एवं नियंत्रित परिवेश में होता है, परंतु गर्भ से बाहर आ जाने पर उसे विभिन्न स्तरों पर समायोजना स्थापित करना पड़ता है|

समायोजन की अवधि

यद्यपि नवजात शिशु अति कोमल होता है तथापि उसमें समायोजन की अदभुत क्षमता होती है| गर्भ में जहाँ उसके समस्त प्रकार्य माँ के माध्यम से सम्पादित होते रहे, उन्हें अब वह स्वत: सम्पादित करता है| अत: श्वसन, रक्त संचार, पाचन, एवं तापमान नियमन आदि प्रकार्यों के साथ उसे समायोजन करना पड़ता है|


जन्म के साथ रूदन नवजात के बाह्य जीवन के प्रारंभ के संकेत के साथ- साथ, उसके विकास का पहला चरण होता है| इसी से सर्वप्रथम शिशु के फेफड़े वायु के प्रवेश के साथ क्रियाशील होते हैं| अथार्त श्वसन क्रिया का प्रारंभ उसके प्रथम रूदन सी होता है| जन्म रूदन से होता है| जन्म रूदन के कुछ मिनट बाद से ही नवजात कफ से ग्रसित हो जाता है| माँ चिंतित हो उठती है, परंतु इस प्रथम रूदन से शिशु की श्वसन नली से आया म्यूकस एवं एम्निआटिकफ्लूड बाहर आ जाता है|


श्वसन क्रिया के प्रारंभ के साथ ही, रक्त संचार संस्थान क्रियाशील हो जाते है अब, ऑक्सीजन की प्राप्ति एवं कार्बनडाई आक्साइड को बाहर निकालने के लिए फेफड़े से रक्त संचार होने लगता है (प्रेट, 1954; पूलएमी, 1973)| यद्यपि जन्म के कुछ ही देर बाद श्वसन एवं रक्त संचार संस्थान कार्य करने लगते हैं, परंतु इसके सही ढंग से कार्य करने में कई दिन लग जाते हैं| जन्म के पश्चात् कुछ मिनट या दिनों तक ऑक्सीजन के न मिलने पर मस्तिष्क के पूर्णत: क्षत होने का भय बना रहता है|


गर्भ काल में शिशु को ऑक्सीजन प्लेसेंटा द्वारा प्राप्त होता है, परंतु माँ के गर्भ से बाहर आ जाने पर उसका अपना पाचन संस्थान कार्य करना आरम्भ कर देता है परंतु श्वसन एवं रक्त संचार की अपेक्षा यह संस्थान अधिक देर से शुरू होने वाली एक लम्बी एवं संयोजनात्मक प्रक्रिया होती है| नवजात को तापमान नियमन संस्थान के साथ भी समायोजन स्थापित करण पड़ता है| गर्भ में उसका शरीर एक स्थिर तापमान में रहता है, परंतु जन्म के पश्चात तापमान में थोड़े-थोड़े परिवर्तन होने से उसके त्वचा भी प्रभावित होती है इसलिए जन्म के एक सप्ताह तक शिशु के शरीर को ढककर रखना आवश्यक होता है| जल्दी ही शिशु शरीर एवं तापमान के बीच समायोजन स्थापित कर लेता है |






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Comments Gajraj singh on 11-12-2021

शैशवशथा की अबधि वया है

Divya on 12-05-2019

shaishavavastha ka mahatva kya h?

Shaishavavasta ka mahatva on 12-05-2019

Shaishavavasta ka mahatv






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