फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ठेस

FanishwarNath Renu Ki Kahani Thes

Pradeep Chawla on 21-10-2018

खेती-बारी के समय, गाँव के किसान सिरचन की गिनती नहीं करते। लोग उसको बेकार ही नहीं, 'बेगार' समझते हैं। इसलिए, खेत-खलिहान की मजदूरी के लिए कोई नहीं बुलाने जाता है सिरचन को। क्या होगा, उसको बुला कर? दूसरे मजदूर खेत पहुँच कर एक-तिहाई काम कर चुकेंगे, तब कहीं सिरचन राय हाथ में खुरपी डुलाता दिखाई पड़ेगा - पगडंडी पर तौल तौल कर पाँव रखता हुआ, धीरे-धीरे। मुफ्त में मजदूरी देनी हो तो और बात है।


...आज सिरचन को मुफ्तखोर, कामचोर या चटोर कह ले कोई। एक समय था, जबकि उसकी मड़ैया के पास बड़े-बड़े बाबू लोगो की सवारियाँ बँधी रहती थीं। उसे लोग पूछते ही नहीं थे, उसकी खुशामद भी करते थे। '...अरे, सिरचन भाई! अब तो तुम्हारे ही हाथ में यह कारीगरी रह गई है सारे इलाके मे। एक दिन भी समय निकाल कर चलो।



कल बड़े भैया की चिट्ठी आई है शहर से - सिरचन से एक जोड़ा चिक बनवा कर भेज दो।'


मुझे याद है... मेरी माँ जब कभी सिरचन को बुलाने के लिए कहती, मैं पहले ही पूछ लेता, 'भोग क्या क्या लगेगा?'


माँ हँस कर कहती, 'जा-जा, बेचारा मेरे काम में पूजा-भोग की बात नहीं उठाता कभी।'


ब्राह्मणटोली के पंचानंद चौधरी के छोटे लड़के को एक बार मेरे सामने ही बेपानी कर दिया था सिरचन ने - 'तुम्हारी भाभी नाखून से खाँट कर तरकारी परोसती है। और इमली का रस साल कर कढ़ी तो हम कहार-कुम्हारों की घरवाली बनाती हैं। तुम्हारी भाभी ने कहाँ से बनाईं!'


इसलिए सिरचन को बुलाने से पहले मैं माँ को पूछ लेता...


सिरचन को देखते ही माँ हुलस कर कहती, 'आओ सिरचन! आज नेनू मथ रही थी, तो तुम्हारी याद आई। घी की डाड़ी (खखोरन) के साथ चूड़ा तुमको बहुत पसंद है न... और बड़ी बेटी ने ससुराल से संवाद भेजा है, उसकी ननद रूठी हुई है, मोथी के शीतलपाटी के लिए।'


सिरचन अपनी पनियायी जीभ को सँभाल कर हँसता - 'घी की सुगंध सूँघ कर आ रहा हूँ, काकी! नहीं तो इस शादी ब्याह के मौसम में दम मारने की


भी छुट्टी कहाँ मिलती है?'


सिरचन जाति का कारीगर है।


मैंने घंटों बैठ कर उसके काम करने के ढंग को देखा है। एक-एक मोथी और पटेर को हाथ में लेकर बड़े जातां से उसकी कुच्ची बनाता। फिर, कुच्चियों को रँगने से ले कर सुतली सुलझाने में पूरा दिन समाप्त... काम करते समय उसकी तन्मयता में जरा भी बाधा पड़ी कि गेंहुअन साँप की तरह फुफकार उठता - 'फिर किसी दूसरे से करवा लीजिए काम। सिरचन मुँहजोर है, कामचोर नहीं।'


बिना मजदूरी के पेट-भर भात पर काम करने वाला कारीगर। दूध में कोई मिठाई न मिले, तो कोई बात नहीं, किंतु बात में जरा भी झाल वह नहीं बर्दाश्त कर सकता।


सिरचन को लोग चटोर भी समझते हैं... तली-बघारी हुई तरकारी, दही की कढ़ी, मलाई वाला दूध, इन सब का प्रबंध पहले कर लो, तब सिरचन को बुलाओ; दुम हिलाता हुआ हाजिर हो जाएगा। खाने-पीने में चिकनाई की कमी हुई कि काम की सारी चिकनाई खत्म! काम अधूरा रख कर उठ खड़ा होगा - 'आज तो अब अधकपाली दर्द से माथा टनटना रहा है। थोड़ा-सा रह गया है, किसी दिन आ कर पूरा कर दूँगा... 'किसी दिन' - माने कभी नहीं!


मोथी घास और पटरे की रंगीन शीतलपाटी, बाँस की तीलियों की झिलमिलाती चिक, सतरंगे डोर के मोढ़े, भूसी-चुन्नी रखने के लिए मूँज की रस्सी के बड़े-बड़े जाले, हलवाहों के लिए ताल के सूखे पत्तों की छतरी-टोपी तथा इसी तरह के बहुत-से काम हैं, जिन्हें सिरचन के सिवा गाँव में और कोई नहीं जानता। यह दूसरी बात है कि अब गाँव में ऐसे कामों को बेकाम का काम समझते हैं लोग- बेकाम का काम, जिसकी मजदूरी में अनाज या पैसे देने की कोई जरुरत नहीं। पेट-भर खिला दो, काम पूरा होने पर एकाध पुराना-धुराना कपड़ा दे कर विदा करो। वह कुछ भी नहीं बोलेगा...


कुछ भी नहीं बोलेगा, ऐसी बात नहीं। सिरचन को बुलाने वाले जानते हैं, सिरचन बात करने में भी कारीगर है... महाजन टोले के भज्जू महाजन की बेटी सिरचन की बात सुन कर तिलमिला उठी थी - ठहरो! मैं माँ से जा कर कहती हूँ। इतनी बड़ी बात!'


'बड़ी बात ही है बिटिया! बड़े लोगों की बस बात ही बड़ी होती है। नहीं तो दो-दो पटेर की पटियों का काम सिर्फ खेसारी का सत्तू खिला कर कोई करवाए भला? यह तुम्हारी माँ ही कर सकती है बबुनी!' सिरचन ने मुस्कुरा कर जवाब दिया था।


उस बार मेरी सबसे छोटी बहन की विदाई होने वाली थी। पहली बार ससुराल जा रही थी मानू। मानू के दूल्हे ने पहले ही बड़ी भाभी को खत लिख कर चेतावनी दे दी है - 'मानू के साथ मिठाई की पतीली न आए, कोई बात नहीं। तीन जोड़ी फैशनेबल चिक और पटेर की दो शीतलपाटियों के बिना आएगी मानू तो...' भाभी ने हँस कर कहा, 'बैरंग वापस!' इसलिए, एक सप्ताह से पहले से ही सिरचन को बुला कर काम पर तैनात करवा दिया था माँ ने - 'देख सिरचन! इस बार नई धोती दूँगी, असली मोहर छाप वाली धोती। मन लगा कर ऐसा काम करो कि देखने वाले देख कर देखते ही रह जाएँ।'


पान-जैसी पतली छुरी से बाँस की तीलियों और कमानियों को चिकनाता हुआ सिरचन अपने काम में लग गया। रंगीन सुतलियों से झब्बे डाल कर वह चिक बुनने बैठा। डेढ़ हाथ की बिनाई देख कर ही लोग समझ गए कि इस बार एकदम नए फैशन की चीज बन रही है, जो पहले कभी नहीं बनी।


मँझली भाभी से नहीं रहा गया, परदे के आड़ से बोली, 'पहले ऐसा जानती कि मोहर छाप वाली धोती देने से ही अच्छी चीज बनती है तो भैया को खबर भेज देती।'


काम में व्यस्त सिरचन के कानों में बात पड़ गई। बोला, 'मोहर छापवाली धोती के साथ रेशमी कुरता देने पर भी ऐसी चीज नहीं बनती बहुरिया। मानू दीदी काकी की सबसे छोटी बेटी है... मानू दीदी का दूल्हा अफसर आदमी है।'


मँझली भाभी का मुँह लटक गया। मेरे चाची ने फुसफुसा कर कहा, 'किससे बात करती है बहू? मोहर छाप वाली धोती नहीं, मूँगिया-लड्डू। बेटी की विदाई के समय रोज मिठाई जो खाने को मिलेगी। देखती है न।'


दूसरे दिन चिक की पहली पाँति में सात तारे जगमगा उठे, सात रंग के। सतभैया तारा! सिरचन जब काम में मगन होता है तो उसकी जीभ जरा बाहर निकल आती है, होठ पर। अपने काम में मगन सिरचन को खाने-पीने की सुध नहीं रहती। चिक में सुतली के फंदे डाल कर अपने पास पड़े सूप पर निगाह डाली - चिउरा और गुड़ का एक सूखा ढेला। मैंने लक्ष्य किया, सिरचन की नाक के पास दो रेखाएँ उभर आईं। मैं दौड़ कर माँ के पास गया। 'माँ, आज सिरचन को कलेवा किसने दिया है, सिर्फ चिउरा और गुड़?'


माँ रसोईघर में अंदर पकवान आदि बनाने में व्यस्त थी। बोली, 'मैं अकेली कहाँ-कहाँ क्या-क्या देखूँ!... अरी मँझली, सिरचन को बुँदिया क्यों नहीं देती?'


'बुँदिया मैं नहीं खाता, काकी!' सिरचन के मुँह में चिउरा भरा हुआ था। गुड़ का ढेला सूप के किनारे पर पड़ा रहा, अछूता।


माँ की बोली सुनते ही मँझली भाभी की भौंहें तन गईं। मुट्ठी भर बुँदिया सूप में फेंक कर चली गई।


सिरचन ने पानी पी कर कहा, 'मँझली बहूरानी अपने मैके से आई हुई मिठाई भी इसी तरह हाथ खोल कर बाँटती है क्या?'


बस, मँझली भाभी अपने कमरे में बैठकर रोने लगी। चाची ने माँ के पास जा कर लगाया - 'छोटी जाति के आदमी का मुँह भी छोटा होता है। मुँह लगाने से सर पर चढ़ेगा ही... किसी के नैहर-ससुराल की बात क्यों करेगा वह?'


मँझली भाभी माँ की दुलारी बहू है। माँ तमक कर बाहर आई - 'सिरचन, तुम काम करने आए हो, अपना काम करो। बहुओं से बतकुट्टी करने की क्या जरूरत? जिस चीज की जरुरत हो, मुझसे कहो।'


सिरचन का मुँह लाल हो गया। उसने कोई जवाब नहीं दिया। बाँस में टँगे हुए अधूरे चिक में फंदे डालने लगा।


मानू पान सजा कर बाहर बैठकखाने में भेज रही थी। चुपके से पान का एक बीड़ा सिरचन को देती हुई बोली और इधर-उधर देख कर कहा - 'सिरचन दादा, काम-काज का घर! पाँच तरह के लोग पाँच किस्म की बात करेंगे। तुम किसी की बात पर कान मत दो।'


सिरचन ने मुस्कुरा कर पान का बीड़ा मुँह में ले लिया। चाची अपने कमरे से निकल रही थी। सिरचन को पान खाते देख कर अवाक हो गई। सिरचन ने चाची को अपनी ओर अचरज से घूरते देख कर कहा - 'छोटी चाची, जरा अपनी डिबिया का गमकौआ जर्दा तो खिलाना। बहुत दिन हुए...।'


चाची कई कारणों से जली-भुनी रहती थी, सिरचन से। गुस्सा उतारने का ऐसा मौका फिर नहीं मिल सकता। झनकती हुई बोली, 'मसखरी करता है? तुम्हारी चढ़ी हुई जीभ में आग लगे। घर में भी पान और गमकौआ जर्दा खाते हो? ...चटोर कहीं के!' मेरा कलेजा धड़क उठा... यत्परो नास्ति!


बस, सिरचन की उँगलियों में सुतली के फंदे पड़ गए। मानो, कुछ देर तक वह चुपचाप बैठा पान को मुँह में घुलाता रहा। फिर, अचानक उठ कर पिछवाड़े पीक थूक आया। अपनी छुरी, हँसियाँ वगैरह समेट सँभाल कर झोले में रखे। टँगी हुई अधूरी चिक पर एक निगाह डाली और हनहनाता हुआ आँगन के बाहर निकल गया।


चाची बड़बड़ाई - 'अरे बाप रे बाप! इतनी तेजी! कोई मुफ्त में तो काम नहीं करता। आठ रुपए में मोहरछाप वाली धोती आती है... इस मुँहझौंसे के मुँह में लगाम है, न आँख में शील। पैसा खर्च करने पर सैकड़ों चिक मिलेंगी। बांतर टोली की औरतें सिर पर गट्ठर ले कर गली-गली मारी फिरती हैं।'


मानू कुछ नहीं बोली। चुपचाप अधूरी चिक को देखती रही... सातो तारे मंद पड़ गए।


माँ बोली, 'जाने दे बेटी! जी छोटा मत कर, मानू. मेले से खरीद कर भेज दूँगी.'


मानू को याद आया, विवाह में सिरचन के हाथ की शीतलपाटी दी थी माँ ने। ससुरालवालों ने न जाने कितनी बार खोल कर दिखलाया था पटना और कलकत्ता के मेहमानों को। वह उठ कर बड़ी भाभी के कमरे में चली गई।


मैं सिरचन को मनाने गया। देखा, एक फटी शीतलपाटी पर लेट कर वह कुछ सोच रहा है।


मुझे देखते ही बोला, बबुआ जी! अब नहीं। कान पकड़ता हूँ, अब नहीं... मोहर छाप वाली धोती ले कर क्या करूँगा? कौन पहनेगा? ...ससुरी खुद मरी, बेटे बेटियों को ले गई अपने साथ। बबुआजी, मेरी घरवाली जिंदा रहती तो मैं ऐसी दुर्दशा भोगता? यह शीतलपाटी उसी की बुनी हुई है। इस शीतलपाटी को छू कर कहता हूँ, अब यह काम नहीं करूँगा... गाँव-भर में तुम्हारी हवेली में मेरी कदर होती थी... अब क्या ?' मैं चुपचाप वापस लौट आया। समझ गया, कलाकार के दिल में ठेस लगी है। वह अब नहीं आ सकता।


बड़ी भाभी अधूरी चिक में रंगीन छींट की झालर लगाने लगी - 'यह भी बेजा नहीं दिखलाई पड़ता, क्यों मानू?'


मानू कुछ नहीं बोली... बेचारी! किंतु, मैं चुप नहीं रह सका - 'चाची और मँझली भाभी की नजर न लग जाए इसमें भी।'


मानू को ससुराल पहुँचाने मैं ही जा रहा था.


स्टेशन पर सामान मिलाते समय देखा, मानू बड़े जतन से अधूरे चिक को मोड़ कर लिए जा रही है अपने साथ। मन-ही-मन सिरचन पर गुस्सा हो आया। चाची के सुर-में-सुर मिला कर कोसने को जी हुआ... कामचोर, चटोर...!


गाड़ी आई। सामान चढ़ा कर मैं दरवाजा बंद कर रहा था कि प्लेटफॉर्म पर दौड़ते हुए सिरचन पर नजर पड़ी - 'बबुआजी!' उसने दरवाजे के पास आ कर पुकारा।


'क्या है?' मैंने खिड़की से गर्दन निकाल कर झिड़की के स्वर में कहा। सिरचन ने पीठ पर लादे हुए बोझ को उतार कर मेरी ओर देखा - 'दौड़ता आया हूँ... दरवाजा खोलिए। मानू दीदी कहाँ हैं? एक बार देखूँ!'


मैंने दरवाजा खोल दिया।


'सिरचन दादा!' मानू इतना ही बोल सकी।


खिड़की के पास खड़े हो कर सिरचन ने हकलाते हुए कहा, 'यह मेरी ओर से है। सब चीज है दीदी! शीतलपाटी, चिक और एक जोड़ी आसनी, कुश की।'


गाड़ी चल पड़ी।


मानू मोहर छापवाली धोती का दाम निकाल कर देने लगी। सिरचन ने जीभ को दाँत से काट कर, दोनों हाथ जोड़ दिए।


मानू फूट-फूट रो रही थी। मैं बंडल को खोल कर देखने लगा - ऐसी कारीगरी, ऐसी बारीकी, रंगीन सुतलियों के फंदों का ऐसा काम, पहली बार देख रहा था।





Comments Kumari Sarita on 16-12-2020

Aapke vichar hai special ka mahatva kam kyon Ho Gaya

MD Mehran alam on 16-08-2020

Mohar chap bale dhoute ka moule kya tha

Sneha on 16-08-2020

Aapke vichar se Sachin Kam hai to Kam kyon Ho Gaya

Thes on 08-01-2020

Aapke vichar se Shri Chand Ka mahatva kam Ki Ho Gaya aapke vichar se Shinchan ka mahatvpurn

swastik kulkarni on 12-05-2019

Badi bhabhi ne maanu ke sambandh mai kya chetavani di thi

यासिर on 08-12-2018

आपके विचार से सिरचन का महत्व कम क्यों हो गया?


Mitesh Chauhan on 24-09-2018

Thes kahani me nihit samvedana par prakas daliye



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