प्राचीन भारत में शहरीकरण

Pracheen Bharat Me Shahrikarann

Pradeep Chawla on 12-05-2019



नगरीकरण

का शाब्दिक अर्थ है ग्रामीण संस्कृति से भिन्न नगर सभ्यता का विकास।ऐसे

वर्ग का उदय एवं ऐसे उत्पादि वर्ग का उदय शहरीकरण के लिए आवश्यक हो जाता है

जो उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन स्वयं न करता हो तथा दूसरा वर्ग,अपने खाने

से अधिक उत्पादन उपभोक्ताओं के जीने के लिए करें, जिसे कृषि अधिशेष कहा

जाता है।यह अधिशेष अनुत्पादक वर्ग तक नियमित रूप से पहुँचता रहे इसके लिए

ऐसे प्रशासन तंत्र की आवश्यकता होती है जो इस जिम्मेदारी को ठीक से

निभाये।अतः नगरीकरण के लिये आवश्यक तत्व है-नियोजित नगर,पूर्णकालिक शासक या

प्रशासक वर्ग,शिक्षित वर्ग,कृषि अधिशेष,कर-प्रणाली,व्यापार और

वाणिज्य,मुद्रा प्रणाली,बाँट और माप,संचार और यातायात के साधन,लिपि की

एकरूपता,व्यवस्थित स्थापत्य और शिल्प,बड़े-बड़े स्मारकीय भवनों का

निर्माण,धर्म की स्थापना,धार्मिक हस्तियों का उदय तथा ग्रामीण जनता का इन

शहरों की ओर उचित मात्रा में पलायन आदि।

नगरीय

क्रान्ति वाक्य का प्रयोग सर्वप्रथम वी.जी.चाइल्ड ने उस प्रक्रिया के लिए

किया जिसके फलस्वरूप अनपढ़,अशिक्षित कृषि संस्कृति के लोग,जो गाँवों और अन्य

छोटे-छोटे स्थानों में रह रहे थे,ने मिश्रित और बड़े सभ्यता केंद्रों को

जन्म दिया।चाइल्ड ने जिन आवश्यक तत्वों को निर्धारित किया है वे

है-1.पूर्णकालिक विशेषज्ञ और शासक वर्ग का उदय जो सामान्य जीविका के

कार्यों से मुक्त हो 2.कर, लगान तथा अन्य शुल्क,उपहार के आहरण की एक

सुव्यवस्थित प्रणाली जिससे सामाजिक अधिशेष सुचारू रूप से शासक या उच्च

वर्गों के हाथों में जाता रहे।3.पूज्य देवताओं तथा सेव्य राजाओं के नाम पर

स्मारक भवनों का निर्माण।4.ज्योतिष जैसी भविष्य ज्ञान विद्या का पल्लवन और

प्रसार।5.विदेशी व्यापार और वाणिज्य का उद्भव और प्रसार।6.राजनितिक संगठनों

और शक्तियों की कबायली और चलायमान जीवन के स्थान पर क्षेत्र विशेष का

स्वामी होना।इसके अतिरिक्त दो विशेष तत्वों का होना अनिवार्य है-1.नगरों का

उद्भव और 2.लिपि का आविष्कार।

पाणिनी

के अनुसार नगर वे है जिनमें चारों ओर खाई तथा नगर दीवार बने हो या इनके

बनने के लिए स्थान छोड़ा गया हो तथा मध्य में महल बनाने के लिए स्थल छोड़ा

गया हो।अमलानन्द घोष के अनुसार नगरीकरण के लिए ग्रामीण जनसंख्या का शहरों

की ओर पलायन है।शहर की पहचान केवल आकार और आबादी से नहीं होती अपितु भौतिक

जीवन की गुणवत्ता और व्यवसायों के रूप में होती है(रामशरण शर्मा)।यद्यपि

पृष्ठप्रदेश से प्राप्त अधिशेष किसी शहर के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है

फिर भी केवल गैर कृषक बस्तियों को शहरी केंद्र नहीं माना जा सकता।शिल्पियों

का संकेंद्रण तथा मुद्रा आधारित विनिमय के प्रचलन शहरी जीवन की उतनी ही

महत्वपूर्ण विशेषताएं है।स्थापत्य ग्रंथों में नगर को सभी वर्गों के लोगों

एवं शिल्पियों की बस्ती बताया गया है।11वीं सदी के वैयाकरण कैयट नगर की

परिभाषा इसप्रकार देते हैं कि नगर एक ऐसी बस्ती है जो दीवार और खाई से घिरा

हो तथा शिल्पियों एवं सौदागरों के संघों के कानून और रीति-रिवाज प्रचलित

हो।

भारत

में शहरों का उदय हड़प्पाकालीन कांस्ययुग में 2350 ई.पूर्व के लगभग हुआ,फिर

1750 ई.पूर्व में उसके अवसान के बाद शहरों का उदय 500ई.पूर्व में गंगाघाटी

के मैदानी इलाकों में हुआ था।इस युग में लोहे के हथियारों के व्यापक

इस्तेमाल से घने जंगलों को साफ़ किया गया।कछारी जमीन में लोहे की फाल के

इस्तेमाल के कारण उपज में अभूतपूर्व वृद्धि हुई।एक सामान्य किसान भी अपनी

आवश्यकता की पूर्ति करने के बाद अनाज का एक बड़ा भाग अधिशेष के रूप में

संरक्षित करने लगा।इस अधिशेष के द्वारा शहरों में रहने रहनेवाले

शासकों,पुरोहितों,शिल्पियों, कारीगरों,सिपाहियों इत्यादि का भरण-पोषण किया

जाने लगा।यह अधिशेष शहर में रहनेवाले लोगों को या तो क्र के रूप में मिलता

था या पुरोहितों के दान-दक्षिणा के रूप में या गॉव और शहर के बीच असमान

व्यापार में होनेवाले मुनाफे के रूप में।शहर में रहनेवाले शासक देहातों से

कर वसूल करते थे और उसे वेतन, पारिश्रमिक या दक्षिणा के रूप में बाँटते थे।

शहरीकरण

का दूसरा प्रमुख कारण मुद्रा का प्रचलन था।सिक्कों के इस्तेमाल से व्यापार

की बहुत अधिक वृद्धि हो हुई।मुद्रा-प्रश्न से विनिमय अथवा लेन-देन बहुत

आसान हो गया।सिक्कों के कारण नकदी कर वसूला जा सकता था।सिक्कों के आने से

पारिवारिक सम्बन्ध कमजोर पड़ गए।वेतन पर योग्य कर्मचारियों की नियुक्ति की

जाने लगी।फलतः शिल्प,उद्योग- धंधों का विकास एवं वाणिज्य-व्यापार में तीव्र

प्रगति हुई।इसके पीछे इस काल की राजनैतिक एवं धार्मिक परिस्थितियों ने भी

प्रोत्साहन का काम किया।विशाल राजतंत्रों के उदय से कुछ नगर राजधानी के रूप

में विकसित हुए,जहाँ बहुसंख्यक व्यापारी और शिल्पी बस गये।सिक्कों का

व्यापक रूप से प्रचलन प्रारम्भ हो गया।इसकाल में विकसित होनेवाले जैन और

बौद्ध धर्मो का दृष्टिकोण भी व्यापारियों एवं व्यावसायियों के प्रति काफी

उदार था।उन्होंने व्यक्तिगत सम्पत्ति, व्यापार, ऋण, सूदखोरी आदि का समर्थन

किया था।

उत्तर

भारत में शहरी जीवन का प्रारम्भ 500ई.पूर्व में हो गया था।बुद्धकाल में

नगरों का तेजी से उदय हुआ।प्रारम्भिक बौद्ध साहित्य में बुद्ध के समय के छः

प्रसिद्द नगरों का उल्लेख मिलता है-1.चंपा 2.राजगृह 3.श्रावस्ती 4.साकेत

5.कौशाम्बी और 6.वाराणसी।इसके अतिरिक्त वैशाली,मिथिला,प्रतिष्ठान,उज्जैनी

और मथुरा आदि नगर भी प्रसिद्द थे।तक्षशिला पश्चिमोत्तर भारत का प्रसिद्ध

नगर था।ईसा पूर्व 600 से 300ई.पूर्व के बीच भारत में 60 नगरों के अस्तित्व

का प्रमाण मिलता है।ये नगर ही इसकाल में बौद्धिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों

के प्रमुख स्थल बन कर उभर रहे थे।

बौद्धकाल

सामान्य जन की आजीविका का प्रमुख स्रोत कृषि था।लोहे के उपकरणों के

आविष्कार ने गंगाघाटी में उत्पादन प्रकिया को काफी तीव्र कर दिया।खुदाइयों

में अनेक स्थलों से लौह उपकरण मिले है।लोगों का तकनीकी ज्ञान भी पर्याप्त

विकसित हो गए थे।कुछ व्यक्तियों के पास बड़े-बड़े भूखण्ड थे जिनपर खेती करने

क्व लिए वे बहुसँख्यक श्रमिकों को नियुक्त करते थे।ये सभी तंत्र कृषि के

अतिरिक्त उत्पादन के लिए उत्तरदायी थे।गाँवों के चारो ओर जो कृषियोग्य भूमि

थी उसे क्षेत्र के रूप में जाना जाता था।यह मनुष्य की व्यक्तिगत संपत्ति

थी।कृषियोग्य भूमि के अतिरिक्त दावयानी चारागाह भी होते थे।इसपर गाँव के

सभी लोगों का अधिकार माना जाता था।गांवों का शासन ग्राम सभा द्वारा चलाया

जाता था।जिसका अध्यक्ष ग्रामभोजक या मुखिया होता था।ग्रामभोजकों का एक

प्रमुख काम ग्रामीण जनता से कर वसूलकर सम्राट को देना होता था।भूमिकर उपज

के छठे भाग से लेकर 12वें भाग तक होता था।इसके अतिरिक्त ग्रामसभा ग्रामीण

भूमि का प्रबंध तथा तत्सम्बन्धी विवादों का निपटारा करती,ग्राम में शान्ति

तथा व्यवस्था कायम रखती तथा नागरिकों के सुख़ सुविधा हेतु सार्वजनिक हित के

कार्य जैसे-सड़कों का निर्माण,सिंचाई के लिए नहर, तालाब,कुँआ आदि का

निर्माण,संस्थागार,धर्मशालाएं आदि बनवाने का कार्य भी किया करती थी।प्रायः

प्रत्येक ग्राम के लोग अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ अपनी ही सीमा में प्राप्त

कर लेते थे।लोगों में सहकारिता की भावना का विकास हो गया था।उनका जीवन

सुखी,सम्पन्न और आडम्बररहित था।अपराध बहुत कम होते थे।गाँवों में ही जरूरत

के हिसाब से कई कुटीर एवं शिल्प उद्योग खड़े कर लिए गए थे।जातक ग्रंथों में

स्पस्ट उल्लेख है कि समान व्यवसाय करनेवाले लोग प्रायः एक ही गाँव में

निवास करते थे।इसप्रकार ग्रामीण अर्थव्यवस्था एक आत्मनिर्भर प्रवृत्ति

अपनाने की ओर तेजी से चल पड़ी थी।

बुद्धकालीन

उत्तर भारत में व्यावसाय तथा उद्योग-धंधे अत्यंत विकसित अवस्था में पहुँच

गये थे।जातक ग्रंथों में 18 प्रकार के उद्योगों का उल्लेख मिलता है।बढ़ई के

लिए बडढकी ग्राम का उल्लेख मिलता है जहाँ फर्नीचर तथा समुद्री जहाजों का

निर्माण किया जाता था।धातुकर्मियों के लिए कम्मामार शब्द का प्रयोग हुआ

है।पत्थर पर काम करनेवाले को पाषाणकोट्टक खा जाता था।अन्य उद्यमियों में

हाथीदाँत की वस्तुएँ बनानेवाले,जुलाहे,हलवाई,स्वर्णकार,कुम्हार,धनुष-बाण

बनानेवाले,मालाकार,वैद्य,ज्योतिषी,नापित,शिकारी आदि का उल्लेख मिलता है।सभी

व्यावसायों का सम्मान नहीं था,कुछ को हीनशिल्प कहा जाता था।इस श्रेणी में

शिकारी,मछुए,बूचड़,कर्मकार,सपेरा,गायक,नर्तक,नायक,जौहरी,नापित,इषुकर,बर्त्तन

बनानेवाले शामिल थे।कुछ गाँव तथा शहर अपने विशिष्ट प्रकार के व्यासायों के

लिए काफी प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके थे।

बुद्धकालीन

गंगाघाटी में जो नगरीय क्रान्ति उत्पन्न हुई उसने देश में समृद्धशाली

व्यापारी वर्ग को जन्म दिया।ये अतिरिक्त उत्पादन को कमिवाले क्षेत्रों में

पहुँचाते थे।विभिन्न स्रोतों से पता चलता है कि इसकाल में आंतरिक तथा वाह्य

दोनों ही व्यापार उन्नति पर था।उत्तरी दक्कन के कई स्थानों से गंगाघाटी के

मिट्टी के विशिष्ट बर्त्तन,जिन्हें उत्तरी काले चमकीले मृदभांड(NBPW)कहा

जाता है, प्राप्त होते है, जो उत्तर और दक्षिण के बीच होनेवाले नियमित

व्यापार को सूचित करते है।इस काल में देश के भीतर अनेक प्रसिद्ध व्यापारिक

नगर अस्तित्व में आ चुके थे।व्यापारियों का कारवाँ गाङियों में माल लादकर

एक स्थान से दूसरे स्थान को व्यापार के निमित्त जाता था।जातक ग्रंथों में

500 से 1000 गाड़ियों के साथ माल लेकर चलनेवाले व्यापारियों के कारवाँ का

उल्लेख मिलता है।श्रावस्ती के धनाढ्य व्यापारी अनाथपिंडक के कारवाँ के

सम्बन्ध में जातकग्रंथ एक व्यापारी मार्ग का उल्लेख करते है जो श्रावस्ती

से प्रारम्भ होकर पूर्व में राजगृह तथा उत्तर-पश्चिम में गंधार जनपद की

राजधानी तक्षशिला तक जाता था।दूसरा व्यापारिक मार्ग श्रावस्ती से

दक्षिण-पश्चिम की ओर प्रतिष्ठान तक जाता था।सुतनिपात से पता चलता है कि

दक्षिण और पश्चिम के व्यापारी मार्ग कौशाम्बी में आकर मिलते थे,जहाँ से

व्यापारी माल लेकर कौशल तथा मगध को जाया करते थे।गंगा तथा यमुना नदियों के

जलमार्ग से होकर भी व्यापारी जाते थे।विनय ग्रंथों से पता चलता है कि पूर्व

से पश्चिम तक गंगा नदी से होकर जानेवाले व्यापारिक मार्ग का अन्तिम स्थल

सहजाति था।सहजाति से यमुना नदी होकर जलीय मार्ग कौशाम्बी तक जाता

था।पश्चिम की ओर व्यापारिक मार्ग सिंध तथा सौवीर तक जाते थे।इसीप्रकार

उत्तर पश्चिम में एक बड़ा स्थलीय व्यापारिक मार्ग भारत से तक्षशिला होते हुए

मध्य तथा पश्चिमी एशिया के देशों को जाता था।इसी से बहुसंख्यक विद्यार्थी

तक्षशिला में शिक्षा प्राप्त करने के लिए आते थे।

जातकग्रंथों

में चंपा से सुवर्णभूमि तथा पाटलिपुत्र से ताम्रलिप्ति होते हुए लंका जाने

का उल्लेख मिलता है।पश्चिम भारत में भृगुकच्छ तथा सोपारा प्रसिद्ध

बन्दरगाह थे जहाँ विभिन्न देशों के व्यापारी अपनी जहाजों में माल लादकर

लाते और ले जाते थे।पेरिप्लस तथा प्लिनी के विवरण से स्पस्ट होता है कि

भारत तथा रोम साम्राज्य के मध्य घनिष्ठ व्यापारिक सम्बन्ध था।नदियों के तट

पर बसे हुए शहर कौशाम्बी,सहजाति, अयोध्या,काशी, मथुरा,पाटन आदि व्यापारियों

के आकर्षण के प्रमुख केंद्र रहे थे।200ई.पूर्व से 400ई. तक बिहार में

चंपा,पाटलिपुत्र,वैशाली,कहरगढ़ और चिरांद की स्थिति शिल्प और व्यापार की

दृष्टि से अच्छी थी।विशेषकर इलाहबाद के पास भीटा और वैशाली में शिल्पियों

और कारीगरों की बहुत सी मुहरें प्राप्त हुई है।

300ई.

के लगभग शहरों का ह्रास होने लगा।इस पतन के लिए कई कारक उत्तरदायी हो सकते

है।भारत और रोम के बीच होने वाले व्यापार में भारी गिरावट को प्रमुख कारण

के रूप में लिया जा सकता है।भारत और अन्य पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने

के कारण रोम का खजाना खाली होने लगा था।इस व्यापार में लोहे के घरेलू

सामान और रेशम जाते थे जिनका दाम रोम में ज्यादा था।रोम के शासकों ने

इसप्रकार के माल के व्यापार पर रोक लगा दी।300ई. तक आते-आते भारत के साथ

रोम का व्यापार बहुत घट गया।इसी समय कुषाण साम्राज्य के अंत होने से मध्य

एशिया के साथ भी भारत के व्यापार को बड़ा धक्का लगा।सिल्क रुट 200ई.के बाद

लगभग वीरान हो गया और फिर यह मंगोलों के आगमन के बाद 14वीं सदी में चालू

हुआ।मथुरा की समृद्धि मध्य एशियाई व्यापार के कारण थी।पर तीसरी शताब्दी का

अंत होते-होते वः समृद्धि समाप्त हो गयी।इसी कारण से तक्षशिला का नगर भी

चौथी के अंत तक पतनोन्मुख हो गया।

राजनीतिक

क्षेत्र में आये बड़े बदलाव नगरों के लिए बड़े अभिशाप के रूप में सामने

आये।300ई.के मध्य में मध्य भारत और दक्कन में सातवाहन साम्राज्य तथा उत्तर

में कुषाण साम्राज्य नष्ट हो गए।बड़ी-बड़ी राजनितिक इकाइयों के होने से शहरी

लोगों को खिलाने-पिलाने के लिए देहातों से कर उगाहकर लाना आसान होता

था।राजनितिक प्रश्रय के कारण शहर में शिल्पों की प्रगति होती है और बड़े

क्षेत्र में अमन चैन कायम रहने से व्यापार में सुविधा होती है।व्यापारियों

को हर जगह छोटे-छोटे राजाओं और सरदारों को चुंगी नहीं देनी पड़ती है।जब तक

सातवाहनों और कुषाणों की सत्ता बनी रही तबतक ये सारे लाभ मिलते रहे।पर जब

इन राज्यों का अंत हुआ उसके थोड़े ही पीछे इन नगरों का भी पत्तन हो

गया।पुरातात्विक शोध से पत्ता चलता है कि आंध्र,कर्नाटक,महाराष्ट्र और

मध्यप्रदेश में बहुत से शहर सातवाहनों के काल में फूलते-फलते रहे और फिर

सातवाहन राज्य के पतन के साथ-साथ उनका भी पतन हो गया।करीब यहीं अवस्था

उत्तर भारत में कुषाणकालीन शहरों की है।

नगरों

के पतन का प्रमुख कारण सामाजिक संकट से सम्बंधित है।प्राचीन समाज में

वैश्य अधिकांशतः खेती में लगे रहते थे और वाणिज्य-व्यापार भी करते थे।साथ

ही वह राजस्व के प्रमुख स्रोत थे।वे चारों वर्णों में एकमात्र करदाता

थे।वर्णसंकर की अवस्था में उच्च वर्णों के आधिपत्य के खिलाफ वैश्यों और

शूद्रों के विद्रोह का आभास मिलता है।इस विद्रोह के कारण क्र वसूल करना

कठिन था और कर वसूल नहीं होने के कारण राज्याधिकारियों और अन्य शहरी लोगों

का,जिसमें ब्राह्मण भी शामिल थे,भरण-पोषण नहीँ हो सकता था।ऐसा लगता है कि

यह विद्रोह मध्यप्रदेश,महाराष्ट्र,आंध्रप्रदेश जैसे क्षेत्रों में हुआ,जहाँ

वर्णाश्रम धर्म की व्यवस्था अधिक जड़े नहीं जमा पाई थी।इसी समस्या के

समाधान के लिए राजाओं ने बड़े पैमाने पर भूमि अनुदान की प्रथा चलाई थी।इन

सबका मिला जूला प्रभाव ही था जिसके कारण बड़े-बड़े शहर धाराशायी हो गए और और

उनके अवशेषों पर सामन्तशाही का उद्भव हुआ।



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