वंशानुक्रम की प्रक्रिया

Vanshanukram Ki Prakriya

Pradeep Chawla on 26-10-2018


वंशानुक्रम का अर्थ व परिभाषाएँ (Meaning and Definition of Heredity) साधारणतया जैसे माता-पिता होते हैं, वैसे ही उनकी सन्तान होती है। उसे अपने माता-पिता के शारीरिक और मानसिक गुण प्राप्त होते है। बालक को न केवल अपने माता-पिता से वरन् उनसे पहले के पूर्वजों से भी अनेक शारीरिक और मानसिक गुण प्राप्त होते है। इसी को हम वंशानुक्रम, वंश-परम्परा, पैतृकता, आनुवांशिकता आदि नामों से पुकारते तैं। बालक में उत्पन्न विशेषताओं के लिये उसके माता-पिता को ही उत्तरदायी नहीं ठहराया जाता है बल्कि उसके सगे सम्बन्धियों को भी।


(1) रूथ बैनेडिक्ट के अनुसार- ‘‘वंशानुक्रम माता-पिता से सन्तान को प्राप्त होने वाले गुणों का नाम है।‘‘


(2) बुडवर्थ के शब्दों में- ‘‘वंशानुक्रम में वे सभी बातें आ जाती हैं, जो जीवन का आरम्भ करते समय, जन्म के समय नहीं वरन् गर्भाधान के समय, जन्म से लगभग नौ माह पूर्व, व्यक्ति में उपस्थित थीं।‘‘


(3) जेम्स ड्रेवर के अनुसार- ‘‘माता-पिता की विशेषताओं का सन्तानों में हस्तान्तरण होना वंशानुक्रम है।‘‘


(4) जे0ए0 थाम्पसन के शब्दों में- ‘‘वंशानुक्रम, क्रमबद्ध पीढि़यों के बीच उत्पत्ति सम्बन्धी, सम्बन्ध के लिये सुविधाजनक शब्द है।‘‘


उपर्युक्त विद्वानों के मतों से स्पष्ट होता है कि वंशानुक्रम की धारण अर्मूत होती है। इसको हम व्यक्ति के व्यवहारों एवं विशेषताओं के द्वारा ही जान सकते हैं। अतः मानव व्यवहार का वह संगठित रूप, जो छात्र में उसके माता-पिता और पूर्वजों द्वारा हस्तान्तरित होता है, को हम वंशानुक्रम कहते हैं।


वंशानुक्रम की प्रक्रिया (Process of Heredity) मानव शरीर कोषों (cells) का योग होता है। शरीर का आरम्भ केवल एक कोष से होता है, जिसे संयुक्त कोष (zygote) कहते हैं। यह कोष 2,4,8,16,32 और इसी क्रम में संख्या में आगे बढ़ता है। संयुक्त कोष दो उत्पादक कोषों का योग होता है। इनमें से एक कोष पिता का होता है, जिसे ‘पितृकोष‘ (sperm) और दूसरा माता का होता है, जिसे ‘मातृकोष‘ (ovum) कहते हैं। ‘उत्पादक कोष‘ भी ‘संयुक्त कोष‘ के समान संख्या में बढ़ते हैं। पुरूष और स्त्री के प्रत्येक कोष में 23-23 गुणसूत्र (chromosomes) होते हैं। इस प्रकार संयुक्त कोष में ‘गुणसूत्रों‘ के 23 जोड़े होते हैं। गुणसूत्रों के सम्बन्ध में मन ने लिखा है- ‘‘हमारी सब असंख्य परम्परागत विशेषताएँ इन 46 गुणसूत्रों में निहित रहती हैं। ये विशेषताएँ गुणसूत्रों में विद्यमान पित्र्यैकों (Genes) में होती है।‘‘ अतः हमें संयुक्त कोष गुणसूत्र तथा पित्रैक के बारे में जानना आवश्यक है-


(1) संयुक्त कोष (Zygote)-ये गाढ़े एवं तरल पदार्थ साइटोप्लाज्म का बना होता है। साइटोप्लाज्म के अन्दर एक नाभिक (न्यूक्लियस) होता है, जिसके भीतर गुणसूत्र (क्रोमोसोम्स) होते हैं।


(2) गुणसूत्र (chromosomes) प्रत्येक कोशिकाओं के नाभिक में डोरों के समान रचना पायी जाती है, जिनको क्रोमोसोम्स कहा जाता है। ये गुणसूत्र सदैव जोड़ों में पाये जाते हैं। एक संयुक्त कोष में गुणसूत्रों के 23 जोड़े होते हैं। जिसमें आधे पिता द्वारा प्राप्त होते हैं और आधे माता द्वारा। प्रत्येक गुणसूत्र में छोटे-छोटे तत्त्व होते हैं, जिनको ‘जीन्स‘ कहते हैं।


(3) पित्रैक (Gene) एक गुणसूत्र के अन्दर वंशानुक्रम के अनेक निश्चयात्मक तत्व पाये जाते हैं, जिनको पित्रैक (जीन) कहा जाता है। जैसा कि एनास्टासी ने लिखा है-‘‘पित्रैक वंशानुक्रम की विशेषताओं का वाहक है, जो किसी न किसी रूप में सदैव हस्तान्तरित होता है।‘‘


अतः अपने माता-पिता और पूर्वजों से जन्मजात विशेषताओं के रूप में हमें जो भी प्राप्त होता है, वह माता-पिता द्वारा प्रदान किये गये पित्रैकों के माध्यम से माँ के गर्भ में जीवन प्रारम्भ होने (शुक्र कीट द्वारा अण्डकोष का निषेचन होने) के समय ही प्राप्त हो जाता है। यह स्वतः ही पीढ़ी में हस्तान्तरित होते रहते हैं।


वंशानुक्रम के सिद्धान्त और नियम (Laws and Theories of Heredity) वंशानुक्रम मनोवैज्ञानिकों तथा जीव वैज्ञानिकों के लिये अत्यन्त रोचक व रहस्यमय विषय है। वंशानुक्रम की प्रक्रिया के सम्बन्ध में विभिन्न परीक्षण एवं प्रयोग किये गये हैं। वंशानुक्रम के स्वरूप को इन्हीं परीक्षणों के आधार पर परिभाषित कर सकते हैं। अतः विभिन्न विद्वानों द्वारा की गयी खोजों को हम सिद्धान्त एवं नियम मानते हैं। इनका वर्णन निम्नलिखित है-


(1) बीजकोष की निरन्तरता का नियम (Law of continuity of Germ Plasm) इस नियम के अनुसार बालक को जन्म देने वाला बीजकोष कभी नष्ट नहीं होता। इस नियम के प्रतिपादक बीजमैन का कथन है- ‘‘बीजकोष का कार्य केवल उत्पादक कोषों (Germ Cells) का निर्माण करना है, जो बीजकोष बालक को अपने माता-पिता से मिलता है, उसे वह अगली पीढ़ी को हस्तान्तरित कर देता है। इस प्रकार बीजकोष पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है।‘‘ परन्तु इसकी आलोचना करते हुए बी0एन0झा0 ने लिखा है -‘‘इस सिद्धान्त के अनुसार माता-पिता, बालक के जन्मदाता न होकर केवल बीजकोष के संरक्षक हैं, जिसे वह अपनी सन्तान को देते हैं। बीजकोष एक पीढ़ी से दूसरी पीढी को इस प्रकार हस्तान्तरित किया जाता है, मानो एक बैंक से निकलकर दूसरे में रख दिया जाता हो। यह मत वंशक्रम की सम्पूर्ण प्रक्रिया की व्याख्या न कर पाने के कारण अमान्य है।


(2) समानता का नियम (Law of Resemblance) इस नियम के अनुसार जैसे माता-पिता होते हैं, वैसी ही उनकी सन्तान होती है। इस नियम को स्पष्ट करते हुए सोरेनसन ने लिखा है- ‘‘बुद्धिमान माता-पिता के बच्चे बुद्धिमान, साधारण माता-पिता के बच्चे साधारण और मन्दबुद्धि माता-पिता के बच्चे मन्दबुद्धि होते हैं। इसी प्रकार शारीरिक रचना की दृष्टि से भी माता-पिता के समान होते हैं।‘‘ यह नियम भी अपूर्ण है क्योंकि प्रायः देखा जाता है कि काले माता-पिता की संतान गोरी या मंदबुद्धि माता-पिता की संतान बुद्धिमान होती है।


(3) विभिन्नता का नियम (Law of Variation) इस नियम के अनुसार बालक अपने माता-पिता के बिल्कुल समान न होकर कुछ भिन्न होते हैं। इसी प्रकार एक ही माता-पिता के बालक एक-दूसरे के समान होते हुए भी बुद्धि, रंग और स्वभाव में एक-दूसरे से भिन्न होते हैं।


भिन्नता का नियम प्रतिपादित करने वालों में डार्विन तथा लैमार्क ने अनेक प्रयोगों और विचारों द्वारा यह मत प्रकट किया है कि उपयोग न करने वाले अवयव तथा विशेषताओं का लोप आगामी पीढि़यों में हो जाता है। नवोत्पत्ति तथा प्राकृतिक चयन द्वारा वंशक्रमीय विशेषताओं का उन्नयन होता है।


(4) प्रत्यागमन का नियम (Law of Regression) इस नियम के अनुसार बालक में अपने माता-पिता के विपरीत गंुण पाये जाते हैं। ‘प्रत्यागमन‘ शब्द का अर्थ विपरीत होता है। जब बालक माता-पिता से विपरीत विशेषताओं वाले विकसित होते हैं,तो यहाँ पर प्रत्यागमन का सिद्धान्त लागू होता है। जैसे -मन्दबुद्धि माता-पिता की सन्तान का प्रखर बुद्धि होना। इस नियम के सन्दर्भ में विद्वानों ने निम्न धारणाएँ प्रस्तुत की हैं-

  • यदि वंश सूत्रों का मिश्रण सही रूप से नहीं हो पाता है तो विपरीत विशेषताओं वाले बालक विकसित होते है।
  • जागृत और सुषुप्त दो प्रकार के गुण वंश को निश्चित करते हैं। विपरीत विशेषताएँ सुषुप्त गुणों का परिणाम होती है।

(5) अर्जित गुणों के संक्रमण का नियम (Inheritance of Acquired Traits) इस नियम के अनुसार माता-पिता द्वारा अपने जीवन-काल में अर्जित किये जाने वाले गुण उनकी सन्तान को प्राप्त नहीं होते हैं। इस नियम को अस्वीकार करते हुए विकासवादी लेमार्क ने लिखा है- ‘‘व्यक्तियों द्वारा अपने जीवन में जो अर्जित किया जाता है, वह उनके द्वारा उत्पन्न किये जाने वाले व्यक्तियों को संक्रमित करता है।‘‘ लैमार्क ने जिराफ की गर्दन का लम्बा होना परिस्थितिवश बताया, लेकिन अब वह वंशानुक्रमीय हो चुका है। लैमार्क के इस कथन की पुष्टि मैक्डूगल और पवलव ने चूहांे पर एवं हैरीसन ने पतंगों पर परीक्षण करके की है। आज के युग में विकासवाद या अर्जित गुणों के संक्रमण का सिद्धान्त स्वीकार नहीं किया जाता है। इस सम्बन्ध में वुडवर्थ ने लिखा है- ‘‘वंशानुक्रम की प्रक्रिया के अपने आधुनिक ज्ञान से संपन्न होने पर यह बात प्रायः असंभव जान पड़ती है कि अर्जित गुणों को संक्रमित किया जा सकें। जैसे यदि आप कोई भाषा बोलना सीख लें, तो क्या आप पित्रैकों द्वारा इस ज्ञान को अपने बच्चे को संक्रमित कर सकते हैं ? इस प्रकार के किसी प्रमाण की पुष्टि नहीं हुई है।


(6) मेण्डल का नियम- इस नियम के अनुसार, वर्णसंकर प्राणी या वस्तुएं अपने मौलिक या सामान्य रूप की ओर अग्रसर होती हैं। इस नियम को चेकोस्लावाकिया के मेण्डल नामक पादरी ने प्रतिपादित किया था। उसने अपने बगीचे में बड़ी और छोटी मटरें बराबर संख्या में मिलाकर बोयी। उगने वाली मटरों में सब वर्णसंकर जाति की थी। मेण्डल ने इस वर्णसंकर मटरों को फिर बोया और इस प्रकार उसने उगने वाली मटरों को कई बार बोया। अन्त में उसे ऐसी मटरें मिलीं, जो वर्णसंकर होने के बजाय शुद्ध थी। जैसा कि निम्नलिखित रेखाचित्र से स्पष्ट है –


इस प्रकार से ‘मेण्डल ने चूहों पर भी प्रयोग किये और पूर्व निष्कर्षों को प्राप्त किया। आपने सफेद और काले चूहों को एक साथ रखा। इनके समागम से पहले काले चूहे उत्पन्न हुए। फिर वर्णसंकर चूहों को एक साथ रखा गया, इनसे सफेद एवं काले दोनों ही प्रकार के चूहे उत्पन्न हुए। मेण्डल के प्रयोगों से निम्न निष्कर्ष प्राप्त होते हैं-

  • मेण्डल का नियम प्रत्यागमन को स्पष्ट करता है।
  • बालक में माता-पिता की ओर से एक-एक गुणसूत्र आता है।
  • गुणसूत्र की अभिव्यक्ति संयोग पर निर्भर करती है।
  • एक ही प्रकार के गुणसूत्र अपने ही प्रकार की अभिव्यक्ति करते हैं।
  • जागृत गुणसूत्र अभिव्यक्ति करता है, सुषुप्त नहीं ।
  • कालान्तर में यह अनुपात 1:2, 2:4, 1:2, 1:2 होता जाता है।

बाल विकास पर वंशानुक्रम का प्रभाव (Influence of Heredity on child Development) बच्चे के व्यक्तित्व के प्रत्येक पहलू पर वंशानुक्रम का प्रभाव पड़ता है। मनोवैज्ञानिकों ने वंशानुक्रम के प्रभाव को रोकने के लिए विभिन्न प्रयोग किये और यह सिद्ध किया कि बालक का विकास वंशानुक्रम से प्रभावित होता है। वंशानुक्रम निम्नलिखित प्रकार से बाल-विकास को प्रभावित करता है –


(1) तन्त्रिका तन्त्र की बनावट (Structure of Nervous system) तन्त्रिका तन्त्र में प्राणी की वृद्धि, सीखना, आदतें विचार और आकांक्षाएं आदि केन्द्रित रहते हैं। तन्त्रिका तन्त्र बालक में वंशानुक्रम से ही प्राप्त होता है। इससे ही ज्ञानेन्द्रियाँ, पेशियाँ तथा ग्रन्थियाँ आदि प्रभावित होती रहती हैं। छात्र की प्रतिक्रियाएँ तन्त्रिका तन्त्र पर निर्भर करती है। अतः हम बालक के तन्त्रिका तन्त्र के विकास को सामान्य, पिछड़ा एवं असामान्य आदि भागों में विभाजित कर सकते हैं। बालक का भविष्य तन्त्रिका तन्त्र की बनावट पर भी निर्भर करता है।


(2) बुद्धि पर प्रभाव (Effect on Intelligence)- मनोवैज्ञानिकों ने अपने प्रयोगों में यह स्पष्ट कर दिया है कि वंशानुक्रम के द्वारा ही छात्र में बुद्धि आती है। अतः बुद्धि को जन्मजात माना जाता है। ‘स्पियरमैन‘ ने बुद्धि में विशिष्ट एवं सामान्य तत्वों को वंशानुक्रम की देन माना है। बालक की बुद्धि वंशानुक्रम से ही निश्चित होती है।


(3) मूल प्रवृत्तियों पर प्रभाव (Effect on Instincts) मूल प्रवृत्ति बालक बालक के व्यवहार को शक्ति प्रदान करती है। इसको हम देख नहीं सकते बल्कि व्यक्ति के व्यवहार को देखकर पता लगाते हैं कि कौन सी मूल प्रवृत्ति जागृत होकर व्यवहार का संचालन कर रही है? मैक्डूगल महोदय ने इनका पता लगाया था और इनको जानने के लिए उन्होंने प्रत्येक मूल प्रवृत्ति के साथ एक संवेग को भी जोड़ दिया, जो मूल प्रवृत्ति का प्रतीक होता है। संवेग को देखकर मूल प्रवृत्ति का पता लगाया जाता है। आपने यह भी स्पष्ट किया है कि ये भी वंश से ही प्राप्त होते हैं। मूल प्रवृत्तियाँ एवं सहयोगी संवेग निम्नवत् हैं-

मूल प्रवृत्तिसंवेग
पलायनभय
निवृत्तिघृणा
जिज्ञासाआश्चर्य
युयुत्साक्रोध
आत्मगौरवसकारात्मक आत्मानुभूति

स्वभाव का प्रभाव (Effect of Nature)- बालक के स्वभाव का प्रकटीकरण उनके माता-पिता के स्वभाव के अनुकूल होता है। यदि बालक के माता-पिता मीठा बोलते हैं तो उसका स्वभाव भी मीठा बोलने वाला होगा। इसी प्रकार से क्रोधी एवं निर्दयी स्वभाव वाले माता-पिता के बालक भी निर्दयी एवं क्रोधी होते हैं। शैल्डन महोदय ने मानव स्वभाव का अध्ययन कर उसे तीन भागों में विभाजित किया हैः

  • विसेरोटोनिया (Viscerotonia) इस स्वभाव के व्यक्ति समाजप्रिय, आरामपसन्द, हँसमुख और स्वादिष्ट भोजन में रुचि रखने वाले होते हैं।
  • सोमेटोटोनिया (Somatotonia) इस प्रकार के स्वभाव के व्यक्ति महत्वाकांक्षी, क्रोधी, निर्दयी, सम्मानप्रिय और दृढ़ प्रतिज्ञ आदि विशेषताओं वाले होते हैं।
  • सेरेब्रोटोेनिया (Cerebrotonia) इस स्वभाव के व्यक्ति चिन्तनशील, एकान्तप्रिय, नियन्त्रण पसन्द एवं विचारशील होते हैं।

(5) शारीरिक गठन (Physical Structure) बालक का शारीरिक गठन एवं शरीर की बनावट उसके वंशजों पर निर्भर करती है। कार्ल पियरसन ने बताया है कि माता-पिता की लम्बाई, रंग एवं स्वास्थ्य आदि का प्रभाव बालकों पर पड़ता है। ‘क्रेश्मर‘ महोदय ने एक अध्ययन कर शारीरिक गठन के आधार पर सम्पूर्ण मानव जाति को तीन भागों में बाँटा है-

  • पिकनिक (Picnic) इस प्रकार का व्यक्ति शरीर से मोटा, कद में छोटा, गोल-मटोल और अधिक चर्बीयुक्त होता है। उसका सीना चैड़ा लेकिन दबा हुआ तथा पेट निकला हुआ होता है।
  • ऐथलैटिक (Athletic) इस प्रकार का व्यक्ति शारीरिक क्षमताओं के आधार से युक्त होता है जैसे-सिपाही या खिलाड़ी।
  • ऐस्थेनिक (Asthenic) इस प्रकार का व्यक्ति दुबला-पतला और शक्तिहीन शरीर का होता है तथा यह संकोची स्वभाव का होता है। यह लोग किसी भी प्रकार से अन्य लोगों को प्रभावित नहीं कर पाते हैं।

(6) व्यावसायिक योग्यता पर प्रभाव (Effect on vocational Ability) बालकों में माता-पिता की व्यावसायिक योग्यता की कुशलता भी हस्तान्तरित होती हैं। ‘कैटेल‘ ने 885 अमेरिकन वैज्ञानिकों के परिवारों का अध्ययन कर पाया कि उनमें से 2/5 व्यवसायी वर्ग, 1/2 भाग उत्पादक वर्ग और केवल 1/4 भाग कृषि वर्ग के थे। अतः स्पष्ट है कि व्यावसायिक कुशलता वंश पर आधारित होती है।


(7) सामाजिक स्थिति पर प्रभाव (Effect on Social status) जो लोग वंश से अच्छा चरित्र, गुण या सामाजिक स्थिति सम्बन्धी विशेषताओं को लेकर उत्पन्न होते हैं, वे ही सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं। ‘विनसिप महोदय का मत है कि ‘‘गुणवान एवं प्रतिष्ठित माता-पिता की सन्तान ही प्रतिष्ठा प्राप्त करती है।‘‘ जैसे ‘रिचर्ड एडवर्ड‘ नामक परिवार के रिचर्ड एक प्रतिष्ठित नागरिक थे। इनकी सन्तानें विधानसभा के सदस्य एवं महाविद्यालयों के अध्यक्ष आदि प्रतिष्ठित पदों पर आसीन हुए। अतः स्पष्ट है कि सामाजिक स्थिति वंशानुक्रमणीय होती है।



Comments

आप यहाँ पर वंशानुक्रम gk, question answers, general knowledge, वंशानुक्रम सामान्य ज्ञान, questions in hindi, notes in hindi, pdf in hindi आदि विषय पर अपने जवाब दे सकते हैं।

Labels: , , , , ,
अपना सवाल पूछेंं या जवाब दें।




Register to Comment