राजस्थान के लोक नाट्य pdf

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Rajasthan Ke Lok Natya pdf



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Pradeep Chawla on 13-10-2018


यह मनोरंजन के लिए जनसाधारण के लोगो के द्वारा अभिनय किये जाते हैं।
प्रमुख लोक नाट्य कलाएँ निम्न हैं

1.- ख्याल :- इसका शाब्दिक अर्थ हैं खेल-तमाशा।इसका प्रारम्भ अठारहवी शताब्दी से माना जाता हैं। राजस्थान में लोकनाट्य की सबसे लोकप्रिय विद्या ख्याल हैं।
कुछ प्रमुख ख्याल निम्न हैं

शेखावाटी ख्याल :-

प्रचलन क्षेत्र :- चिड़ावा, खंडेला, जायल ।
प्रवर्तक :- नानूरामजी थे।
विशेष :- हीर-राँझा, ढोला-मरवण, भर्तहरि, आल्हा देव आदि प्रमुख ख्याल है।

हेला (दंगल) ख्याल :-
यह दौसा, लालसोट व सवांई माधोपुर का प्रसिद्ध हैं।
प्रवर्तक:- शायर हेला
विशेष :- नोबत वाद्य यंत्र के साथ लम्बी टेर देकर गाते है।
अलीबख्शी ख्याल :-
यह अलवर का प्रसिद्ध हैं।

तुर्रा कंलगी ख्याल :-

निम्बाहेड़ा,घोसुण्डा, मेवाड़ का प्रसिद्ध हैं।
(तुर्रा:-शिव, कलंगी:- पार्वती)
प्रवर्तक :- शाहअली (कलंगी), तुकनगीर(तुर्रा)
विशेष :- लोकप्रिय एंव व्यावसायिक नाट्य

कुचामनी ख्याल :-

प्रवर्तक :- लच्छीरामजी थे।
प्रचलन नागौर जिला (हास्य विनोद व् लोकगीतों की प्रधानता)
जयपुरी ख्याल :-

जयपुर में प्रचलित।
विशेष :- स्त्री पात्रो की भूमिका स्त्रियां ही करती है।

कन्हैया ख्याल :-

करोली में प्रचलित।
विशेष :- नोबत,घेरा, मंजीरा, वाद्य यंत्रों के साथ प्रस्तुति।

2.- रम्मत :-बीकानेर व जैसलमेर की प्रसिद्ध हैं। रम्मत खेलने वालों को खेलार और रम्मतिये कहते हैं। ‘‘स्वतन्त्र बावनी की रम्मत’’ प्रसिद्ध हैं। पाटा संस्कृति बीकानेर की देन है। रम्मत का मूल स्थान जैसलमेर है,यंहा तेज कवि ने स्वतंत्रता बावनी, मूमल, छेले, भर्तहरि, तम्बोलन आदि रम्मतों को लोकप्रिय बनाया। रम्मत खेलते समय नगाड़े व ढ़ोलक बजाते हैं।

3➡तमाशा :- यह जयपुर का प्रसिद्ध हैं। महाराजा सवाई प्रतापसिंह के समय इसका प्रारम्भ जयपुर से हुआ था। तमाशा खुले मंच पर होता है। पंडित बंशीधर भट्ट ने तमाशेे को नई ऊँचाईयां प्रदान की। तमाशा में संगीत, नृत्य, व गायन तीनो की प्रधानता होती है।

4➡स्वांग :- यह होली के अवसर पर खेले जाते
हैं। इसका प्रारम्भ 13 वी 14 वीं शताब्दी में हुआ था। स्वांग रचने वाले कों स्वांगिया या बहरूपिया कहते हैं। भीलवाड़ा के कलाकार जानकीलाल भांड ने इस नाटक को अंतराष्टीय ख्याति दिलाई। भीलवाड़ा के मांडल में नाहरो का स्वांग बहुत लोकप्रिय है।

5➡गवरी :-भीलों का लोकनृत्य हैं जो नाटिका के रूप में मंचित किया जाता हैं। गवरी को मरू नाट्य के नाम से भी जाना जाता हैं। यह बांसवाड़ा, डुंगरपुर व उदयपुर का प्रसिद्ध हैं।
यह 40 दिनों तक चलने वाला एकमात्र नाट्य हैं, अतः इसे लोकनाट्यों का मेरनाट्य कहते है
इसमें शिव व भष्मासुर की कथा सुनाई जाती हैं।
शिव को पुरिया कहा जाता हैं। राई बुढ़िया(शिव) दो राइया (पार्वती), कुटकटिया(मुख्य सूत्रधार), और पाट भोपा , ये पांचो गवरी के मुख्य पात्र होते है।

6➡ नौटंकी :- राजस्थान के पूर्वी भाग भरतपुर, धौलपुर, अलवर, करौली की प्रसिद्ध हैं। राजस्थान में नोटकी को प्रसिद करने का श्रेय डींग के भूरेलाल को है। इसमें नौ प्रकार के वाद्य यंत्र बजते हैं। ढ़ोलक व सारंगी प्रमुख होते हैं।
मुख्य विषय :- राजा हरिषचन्द्र की कथा
नल दम्पती की कहानी,लैला-मंजनू की कहानी

7➡ भवाई :- भवाई व्यावसायिक लोकनाट्य है इस लोक नृत्य को लोक नाटक के रूप में खेला जाता हैं। इसके जन्मदाता वाघाजी थे, गुजरात के छटे क्षेत्रो में भवाई जाति द्वारा यह नाट्य प्रस्तुत किया जाता है।

8➡ चारबैत शैली :- टोंक में प्रचलित पठानी मूल की इस लोक गायन शैली के जनक अब्दुल करीम खान और खलीफा करीम खान निहंग थे। मुख्य वाद्य यन्त्र ढ़फ होता हैं।
रसिया दंगल :- भरतपुर (ड़ीग) का प्रसिद्ध हैं।

9➡ लीलाए :- श्री कृष्ण से समन्धित रास लीलाओ का प्रमुख केंद्र फुलेरा(जयपुर) है।
श्री राम से समन्धित लीलाओ के लिए बिसाऊ(मूकाभिनय),पाटूदा व भरतपुर प्रसिद है।

10➡इलोजी की सवारी :-होली की शाम जालोर शहर में होलिका के मंगेतर इलोजी की बारात की सवारी बैंड बाजे के साथ नाचते गाते हुए निकली जाती है।
होलिका दहन के पश्चात् इलोजी को बिन ब्याहे लौटना पड़ता है।

राजस्थान के लोकवाद्य यन्त्र -:
■ वाद्ययन्त्र मुख्यतः चार प्रकार के होते हैं ।

1➡तत् वाद्य यन्त्र :- (तार, धागे, या बाल से बने )
प्रमुख तत वाद्य :- सारंगी(यह तत वाद्य में सर्वश्रेष्ठ है) रावणहत्था, जंतर, इकतारा, भपंग(अलवर के जहूर खान मेवाती को भपंग का जादूगर कहते है), कामायचा, दुकाका, सुरिंदा, रवाज, रबाब, चिकारा, अपंग, सुरमंडल, तन्दुरा, कमठ, निशान, केनरा आदि।

2➡सुषिर वाद्य :- (फूंक कर बजाने योग्य)

प्रमुख सुषिर वाद्य :- बांसुरी, अलगोजा, पुंगी, शहनाई(यह सुषिर वाद्य यंत्रों में सर्वश्रेष्ठ और मांगलिक वाद्य यंत्र है) सतारा, करणा, मशक, मोरचंग, तुरही, सुरणाई, नड़,नागफनी आदि है।

3➡ अवनद वाद्य:-(खाल से मढे हुए)

प्रमुख अवनद्ध वाद्य :- मृदंग (पखावज)【यह ताल वाधौ में सबसे महत्वपूर्ण है】मांदल, ढोलक, नोबत, नगाड़ा【नगाड़ा वाद्य युगल में होते है】 खँजरी, चंग, ढप, डप, चंगड़ी, दमामा, डपड़ी, ढोल, ताशा【ताशा➡यह गम में बजाया जाने वाला एक मात्र वाद्य यंत्र है】, माठ, डेरु, ढाक आदि है।

4➡ घन वाद्य :- 【धातु से निर्मित】
प्रमुख घन वाद्य ➡ मंजीरा, झांझ, झालर, खड़ताल (सदीक खा मांगणियार को खड़ताल का जादूगर कहा जाता है) लेजिम, श्रीमण्डल, रमझोल, भरनी, टोकरियां, चिमटा, ताल ,घण्टा, हांकल आदि है।


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