Nalanda VishwaVidyalaya Ko Kisne JaLaya नालंदा विश्वविद्यालय को किसने जलाया

नालंदा विश्वविद्यालय को किसने जलाया



GkExams on 14-11-2018


तुर्की के मुस्लिम शासक बख्तियार खिलजी जिसका पूरा नाम इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी था, जब उसका हिंदुस्तान पर राज था तो उसने पुरे नालंदा विश्वविद्यालय जलवा दिया था और यहां के पुस्तकालय में इतनी पुस्तकें थी की पूरे तीन महीने तक आग जलती रही लेकिन खिलजी यहीं नहीं रुका उसने अपनी शैतानियत का परिचय देते हुए यहां के कई धर्माचार्य और बौद्ध भिक्षुओं की भी हत्या करा दी थी .


कई हिस्टोरियन विश्व-प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय में आग लगाने के पीछे जो कारण बताते हैं उसके अनुसार एक बार बख्तियार खिलजी बहुत ज्यादा बीमार पड़ गया और उसके हकीमों ने इसका काफी चिकित्सा की लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ, तब खिजली को नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद शाखा के प्रधान राहुल श्रीभद्रजी से इलाज कराने की सलाह दी गई लेकिन बख्तियार ने इलाज से पहले शर्त लगा दी की वह किसी भारतीय दवा का उपयोग नहीं करेगा और अगर वह स्वस्थ नहीं हुआ तो प्रधान वैद्य को मौत की नींद सुला देगा.


रात भर आचार्य इसके बारे में सोचते गये और उसके पास कुरान लेकर गए और कहा कि कुरान के इतने पन्ने रोज पढिए ठीक हो जाएंगे. वैद्यराज राहुल श्रीभद्र ने कुरान के कुछ पृष्ठों के किनारों पर एक औषधि का लेप लगा दिया था.


वह थूक के साथ केवल दस बीस पृष्ठ चाट गया और स्वस्थ हो गया लेकिन खिजली का घटियापन अब उबाले मारने लगा और अपने ठीक होने की उसे खुशी छोड़ उसे जलन हुई की उसके हकीमों से इन भारतीय चिकित्सको का ज्ञान महान क्यों है, जिसके बाद इस धर्मांध मुस्लिम शासक ने बौद्ध धर्म और आयुर्वेद का एहसान मानने के बदले सन 1199 में नालंदा विश्वविद्यालय में ही आग लगवा दी.


वहां वर्तमान के लेख बताते है की वहां इतनी पुस्तकें थीं कि तीन महीने यह जलता रहा, लेकिन मुस्लिम शासक खिजली की शैतानियत यहाँ भी नहीं रुकी तथा उसने हजारों धर्माचार्यों और बौद्ध भिक्षुओं की हत्या करा दी. उसने इस एहसान का बदला नालंदा को पूर्णतया जलाकर दिया."


"नालंदा उस जमाने में भारत में उच्च विद्या का प्रभावशाली और विश्व विख्यात केन्द्र था. महायान बौद्ध धर्म के इस विद्यालय में हीनयान बौद्धधर्म के साथ ही अन्य धर्मों के तथा अनेक राष्ट्रों के छात्र विद्या ग्रहण करते थे. सातवीं शताब्दी में भारत घुमने के लिए आए चीनी यात्री ह्वेनसांग तथा इत्सिंग के यात्रा वृतान्तो से इस विश्वविद्यालय के बारे में व्यापक से जानकारी मिलती है.


चीनी यात्री ह्वेनसांग ने सातवीं सदी में यहां अपने जीवन का एक साल, एक विद्यार्थी और एक अध्यापक के रूप में बिताया था. प्रसिद्ध 'बौद्ध सारि पुत्र' का जन्म भी यहीं पर हुआ था. इस विश्वविद्यालय को कुमार गुप्त के उत्तराधिकारियों का पूरा सहयोग मिला. गुप्तवंश के पतन के बाद भी आने वाले सभी शासक वंशों ने इसकी समृद्धि में अपना योगदान दिया. इसे सम्राट हर्षवर्द्धन और पाल शासकों का भी संरक्षण मिला.


नालंदा को स्थानीय शासकों और भारत की दूसरी रियासतों के साथ ही कई विदेशी शासकों से भी अनुदान मिलता था. यह विश्व का प्रथम पूर्णतः आवासीय विश्वविद्यालय था. उस समय इसमें विद्यार्थियों की संख्या करीब 10,000 और अध्यापकों की संख्या 2,000 थी.


नालंदा विश्वविद्यालय में भारत से ही नहीं कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे. इस विश्वविद्यालय की नौवीं से बारहवीं सदी तक अंतर्राराष्ट्रीय ख्याति रही थी. विश्वविद्यालय स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना था. इसका पूरा परिसर एक विशाल दीवार से घिरा हुआ था जिसमें प्रवेश के लिए एक मुख्य द्वार था.


उत्तर से दक्षिण की ओर मठों की कतार थी और उनके सामने अनेक भव्य स्तूप और मंदिर थे. मंदिरों में बुद्ध भगवान की मूर्तियां स्थापित थीं. केन्द्रीय विद्यालय में सात बड़े कक्ष थे और इसके अलावा तीन सौ अन्य कमरे थे. इनमें व्याख्यान हुआ करते थे. यहां हुई खुदाई में तेरह मठ मिले हैं. वैसे इससे भी अधिक मठों के होने की संभावना है. मठ एक से अधिक मंजिल के होते थे.


कमरे में सोने के लिए पत्थर की चौकी होती थी. दीपक, पुस्तक इत्यादि रखने के लिए आले बने हुए थे. प्रत्येक मठ के आंगन में एक कुआं बना था. आठ विशाल भवन, दस मंदिर, अनेक प्रार्थना कक्ष तथा अध्ययन कक्ष के अलावा इस परिसर में सुंदर बगीचे तथा झीलें भी थी.


विश्वविद्यालय का प्रबंध कुलपति या प्रमुख आचार्य करते थे जो भिक्षुओं द्वारा निर्वाचित होते थे. कुलपति दो परामर्शदात्री समितियों के परामर्श से सारा प्रबंध करते थे. प्रथम समिति शिक्षा तथा पाठ्यक्रम संबंधी कार्य देखती थी और द्वितीय समिति सारे विश्वविद्यालय की आर्थिक व्यवस्था तथा प्रशासन की देखभाल करती थी. विश्वविद्यालय को दान में मिले दो सौ गांवों से प्राप्त उपज और आय की देखरेख यही समिति करती थी. विश्वविद्यालय में तीन श्रेणियों के आचार्य थे जो अपनी योग्यतानुसार प्रथम, द्वितीय और तृतीय श्रेणी में आते थे."




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