कोसी नदी का उद्गम स्थान

Kosi Nadi Ka Udgam Sthan

Gk Exams at  2018-03-25


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Pradeep Chawla on 12-05-2019

कोसी नदी या कोशी नदी नेपाल में हिमालय से निकलती है और बिहार में भीम नगर के रास्ते से भारत में दाखिल होती है। इसमें आने वाली बाढ से बिहार मेंबहुत तबाही होती है जिससे इस नदी को बिहार का अभिशाप कहा जाता है।



इसके भौगोलिक स्वरूप को देखें तो पता चलेगा कि पिछले 250 वर्षों में 120

किमी का विस्तार कर चुकी है। हिमालय की ऊँची पहाड़ियों से तरह तरह से

अवसाद (बालू, कंकड़-पत्थर) अपने साथ लाती हुई ये नदी निरंतर अपने क्षेत्र

फैलाती जा रही है। उत्तरी बिहार के मैदानी इलाकों को तरती ये नदी पूरा क्षेत्र उपजाऊ बनाती है। नेपाल और भारत दोनों ही देश इस नदी पर बाँध बना चुके हैं; हालाँकि कुछ पर्यावरणविदों ने इससे नुकसान की भी संभावना जतायी थी।



यह नदी उत्तर बिहार के मिथिला क्षेत्र की संस्कृति का पालना भी है। कोशी के आसपास के क्षेत्रों को इसी के नाम पर कोशी कहा जाता है।









अनुक्रम



  • 1नाम
  • 2मार्ग
  • 3कोसी बाँध
  • 4इन्हें भी देखें
  • 5सन्दर्भ
  • 6बाहरी कड़ियाँ






नाम

हिन्दू ग्रंथों में इसे कौशिकी नाम से उद्धृत किया गया है। कहा जाता है कि विश्वामित्र ने इसी नदी के किनारे ऋषि का दर्ज़ा पाया था। वे कुशिक ऋषि के शिष्य थे और उन्हें ऋग्वेद में कौशिक भी कहा गया है। सात धाराओं से मिलकर सप्तकोशी नदी बनती है जिसे स्थानीय रूप से कोसी कहा जाता है। महाभारत में भी इसका ज़िक्र कौशिकी नाम से मिलता है।



मार्ग

काठमाण्डू से एवरेस्ट की चढ़ाई के लिए जाने वाले रास्ते में कोसी की चार सहायक नदियाँ मिलती हैं। तिब्बत की सीमा से लगा नामचे बाज़ार कोसी के पहाड़ी रास्ते का पर्यटन के हिसाब से सबसे आकर्षक स्थान है। कमला, बागमती, तथा बूढ़ी गण्डक इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ हैं।



नेपाल में यह कंचनजंघा

के पश्चिम में पड़ती है। नेपाल के हरकपुर में कोसी की दो सहायक नदियाँ

दूधकोसी तथा सनकोसी मिलती हैं। सनकोसी, अरुण और तमर नदियों के साथ त्रिवेणी

में मिलती हैं। इसके बाद नदी को सप्तकोशी कहा जाता है। बराहक्षेत्र में यह

तराई क्षेत्र में प्रवेश करती है और इसके बाद से इसे कोशी (या कोसी) कहा

जाता है। इसकी सहायक नदियाँ एवरेस्ट के चारों ओर से आकर मिलती हैं और यह

विश्व के ऊँचाई पर स्थित ग्लेशियरों (हिमनदों) के जल लेती हैं। त्रिवेणी के

पास नदी के वेग से एक खड्ड बनाती है जो कोई 10 किलोमीटर लम्बी है। भीमनगर

के निकट यह भारतीय सीमा में दाख़िल होती है। इसके बाद दक्षिण की ओर 260

किमी चलकर कुरसेला के पास गंगा में मिल जाती है।



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