पिता की संपत्ति में विवाहित बेटी की हिस्सेदारी

Pita Ki sampatti Me vivahit Beti Ki Hissedari

Gk Exams at  2018-03-25


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GkExams on 03-02-2019


साल 2005 में संशोधन होने के पहले हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के तहत प्रॉपर्टी में बेटे और बेटियों के अधिकार अलग-अलग हुआ करते थे। इसमें बेटों को पिता की संपत्ति पर पूरा हक दिया जाता था, जबकि बेटियों का सिर्फ शादी होने तक ही इस पर अधिकार रहता था। विवाह के बाद बेटी को पति के परिवार का हिस्सा माना जाता था। हिंदू कानून के मुताबिक हिंदू गैर विभाजित परिवार (एचयूएफ), जिसे जॉइंट फैमिली भी कहा जाता है, सभी लोग एक ही पूर्वज के वंशज होते हैं। एचयूएफ हिंदू, जैन, सिख या बौद्ध को मानने वाले लोग बना सकते हैं। आज हम आपको बताएंगे कि शादीशुदा बेटियों का अब उनके पिता की संपत्ति पर क्या अधिकार हैं:



हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 2005 में बेटियों के ये हैं अधिकार-पहले बेटियों की शादी होने के बाद उनका पिता की संपत्ति में कोई हक नहीं रहता था। कई लोगों को यह महिलाओं के संपत्ति अधिकारों को कुचलने वाला लगा। लेकिन 9 सितंबर 2005 को हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 2005, जो हिंदुओं के बीच संपत्ति का बंटवारा करता है, में संशोधन कर दिया गया। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 2005 के मुताबिक लड़की चाहे कुंवारी हो या शादीशुदा, वह पिता की संपत्ति में हिस्सेदार मानी जाएगी। इतना ही नहीं उसे पिता की संपत्ति का प्रबंधक भी बनाया जा सकता है। इस संशोधन के तहत बेटियों को वही अधिकार दिए गए, जो पहले बेटों तक सीमित थे। हालांकि बेटियों को इस संशोधन का लाभ तभी मिलेगा, जब उनके पिता का निधन 9 सितंबर 2005 के बाद हुआ हो। इसके अलावा बेटी सहभागीदार तभी बन सकती है, जब पिता और बेटी दोनों 9 सितंबर 2005 को जीवित हों।

सहदायिक को भी समान अधिकार: सहदायिक में सबसे बुजुर्ग सदस्य और परिवार की तीन पीढ़ियां आती हैं। पहले इसमें उदाहरण के तौर पर बेटा, पिता, दादा और परदादा आते थे। लेकिन अब परिवार की महिला भी सहदायिक हो सकती है।



-सहदायिकी के तहत, सहदायिक का जन्म से सामंती संपत्ति पर अधिकार होता है। सहदायिक का परिवार के सदस्यों के जन्म और मृत्यु के आधार पर सहदायिकी में दिलचस्पी और हिस्सा ऊपर-नीचे होता रहता है।



-पैतृक और खुद से कमाई हुई प्रॉपर्टी सहदायिक संपत्ति हो सकती है। पैतृक संपत्ति पर सभी लोगों का हिस्सा होता है। जबकि खुद से कमाई हुई संपत्ति में शख्स को यह अधिकार होता है कि वह वसीयत के जरिए प्रॉपर्टी को मैनेज कर सकता है।


-सहदायिकी का सदस्य किसी थर्ड पार्टी को अपना हिस्सा बेच सकता है। हालांकि इस तरह की बिक्री सहदायिकी के अन्य सदस्यों के अग्रक अधिकारों का विषय है। अन्य सदस्यों को यह अधिकार है कि वे संपत्ति में किसी बाहरी शख्स के प्रवेश को मना कर सकते हैं।


-एक सहदायिक (कोई भी सदस्य नहीं) सामंती संपत्ति के बंटवारे के लिए केस फाइल कर सकता है। इसलिए बतौर सहदायिक एक बेटी अब पिता की संपत्ति में बंटवारे की मांग कर सकती है।



Comments Geeta on 12-05-2019

Sir mere pitaji ko gujre do saal ho gaye hain aur hum do behne hi hain unki varish bhai nahi hai.. To kya maa ko ye adhikar hai ki wo ek beti ka hak chinke shirf dusari beti ko puri property dede jisme kuch pustaini hain aur kuch pappa dwara banai hui.aur agar maa samanya roop se faisala karne me asamrath hai aur behkave me aake kadam utha rahi ho to iskeliye kya marg darsahan aap de sakte hain jisse dusari beti ke sath annya na ho


Sangeeta on 12-05-2019

Sir pitaji ke gujar jane ke baad meri bahen ka pati means geeta ka pati jo ghar javai banke papa ke ghar me hi rah raha tha.. Wo papa ke gujar jane ke baad mataji ko behlake sari jamin aur flat ek ek kar beach raha hai to mai sangeeta jo unki dusari beti hoon wo kya itni asahay hai ki agar pitaji ne vasiyat nahi banai to maa apne dusari beti jo geeta hai unke behkave me aake sab unlogo ke naam kar de




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