रूठी रानी उपन्यास

Roothi Rani Upanyas

Gk Exams at  2020-10-15

GkExams on 03-01-2019

मेड़ताके राव विरमदेव और राव जयमल के बारे में पढ़ते हुए आपने जोधपुर के शासक राव मालदेव के बारे में जरुर पढ़ाहोगा | राव मालदेव अपने समय के राजपुताना के सर्वाधिक शक्तिशाली शासकथे वे बहुत शूरवीर व धुनी व्यक्ति थे उन्होंनेजोधपुर राज्य की सीमाओं का काफी विस्तार किया था उनकी सेना में राव जैता व कुंपा नामक शूरवीर सेनापतिथे | यदि मालदेव राव विरमदेव व उनके पुत्र वीर शिरोमणि जयमल से बैर न रखतेऔर जयमल द्वारा प्रस्तावित संधि मान लेतेजिसमे राव जयमल ने शान्ति के लिए अपने पैत्रिक टिकाई राज्य जोधपुर की अधीनता तक स्वीकार करने की पेशकश की थी | जयमल जैसे वीर और जैता कुंपा जैसे सेनापतियों के होते राव मालदेवदिल्ली को फतह करने तक समर्थ हो जाते | रावमालदेव के 31 वर्ष के शासन काल तक पुरे भारत में उनकी टक्कर का कोई राजा नही था |

लेकिन ये परम शूरवीर राजा अपनी एक रूठी रानी को पुरी जिन्दगी मना नही सके और वो रानी मरते दम तकअपने शूरवीर पति राव मालदेव से रूठी रही|
राव मालदेव का विवाह बैसाख सुदी 4वि.स. 1592 को जैसलमेर के शासक रावलुनकरण की राजकुमारी उमादे के साथ हुआ था | उमादेअपनी सुन्दरता व चतुरता के लिए प्रसिद्ध थी | राठोड राव मालदेव की बारात शाही लवाजमेके साथ जैसलमेर पहुँची | राजकुमारी उमादे राव मालदेव जैसाशूरवीर और महाप्रतापी राजाको पति के रूप मेंपाकर बहुत प्रसन्नचित थी | विवाह संपन्न होने के बाद राव मालदेव अपने सरदारों वसम्बन्धियों के साथ महफ़िल में बैठ गए और रानी उमादे सुहाग की सेज पर उनकी राह देखती-देखती थक गई | इस पर रानी ने अपनी खास दासी भारमली जिसे रानी को दहेज़ में दिया गया था को राव जी को बुलाने भेजा | दासी भारमली राव मालदेव जी को बुलानेगई, खुबसूरत दासी को नशे में चूर राव जी ने रानी समझ करअपने पास बिठा लिया काफी वक्त गुजरने के बाद भी भारमली के न आने पर रानी जब राव जी कक्ष में गई और भारमली कोउनके आगोस में देख रानी ने वह आरती वाला थालजो राव जी की आरती के लिए सजा रखा थायह कह कर की अब राव मालदेव मेरे लायक नही रहे उलट दिया | प्रात:काल राव मालदेव जी नशा उतरा तब वे बहुतशर्मिंदा हुए और रानी के पास गए लेकिन तबतक वह रानी उमादे रूठ चुकी थी |
और इस कारण एक शक्तिशाली राजा को बिना दुल्हन के एक दासी को लेकर वापसबारात लानी पड़ी | ये रानी आजीवन राव मालदेव से रूठी ही रही और इतिहास मेंरूठी रानी के नाम से मशहूर हुई |
इस रानी के लिए किले की तलहटी में एक अलगमहल भी बनवाया गया लेकिन वह वहां भी कुछदिन रह कर वापस लौट गई | दो साल पहले जब एक मित्र को जोधपुर काकिला दिखाने ले गया था तब गाइड ने किले केऊपर से ही दूर से उस रूठी रानी का महल दिखायाथा लेकिन कैमरा न होने वजह से उस वक्त उस महल का फोटो नही ले पाया |कार्तिक सुदी 12 वि.स.1619 में जब राव मालदेव जी का निधन हुआ तब यह रानी उनकेपीछे उनकी पगड़ी के साथ जलती चिता मेंप्रवेश कर सती हो गई |
दासी भारमली के अलावा ज्योतिषी चंडू जीभी इस रानी को दहेज़ में दिए गए थे जिन्होंनेअपनी पद्धति से एक पन्चांक बनाया जोचंडू पंचांक के नाम से प्रसिद्ध हुआ | वर्तमानमें चंडू जी की 19 वी. पीढीके पंडित सुरजाराम जी यह पंचांक निकालते है |

इतिहास में रूठी रानी के नाम सेप्रसिद्ध जैसलमेर की उस राजकुमारीउमादे जो उस समय अपनी सुन्दरता व चतुरता के लिए प्रसिद्ध थी को उसका पति जो जोधपुर के इतिहास में सबसेशक्तिशाली शासक रहा ने क्या कभी उसे मनानेकी कोशिश भी की या नहीं और यदि उसने कोई कोशिश की भी तो वे कारण थे कि वह अपनी उस सुन्दर और चतुर रानी कोमनाने में कामयाब क्यों नहीं हुआ |

आज उसी रानी की दासी भारमली उसके प्रेमीबाघ जी के बारे में पढ़ते हुए मेरी इसजिज्ञासा का उत्तर भी मिला कि राव मालदेव अपनी रानी को क्यों नहीं मना पाए | ज्ञात हो इसी दासी भारमली के चलते ही रानी अपने पति राव मालदेव से रूठ गई थी | शादी में रानी द्वारा रूठने के बाद रावमालदेव जोधपुर आ गए और उन्होंनेअपने एक चतुर कवि आशानन्द जी चारण को रूठीरानी उमादे को मना कर लाने के लिए जैसलमेर भेजा | स्मरण रहे चारण जाति के लोग बुद्धि से चतुर व अपनी वाणी से वाक् पटुता वउत्कृष्ट कवि के तौर पर जाने जाते है राजस्थानका डिंगल पिंगल काव्य साहित्य रचने में चारण कवियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है | राव मालदेव के दरबार के कवि आशानन्दचारण बड़े भावुक वनिर्भीक प्रकृति व वाक् पटु व्यक्ति थे|

जैसलमेर जाकर उन्होंने किसी तरह अपनीवाक् पटुता के जरिए उस रूठीरानी उमादे को राजा मालदेव के पास जोधपुर चलनेहेतु मना भी लिया और उन्हें ले कर जोधपुरके लिए रवाना हो गए | रास्ते में एक जगह रानी ने मालदेव वदासी भारमली के बारे में कवि आशानन्द जी सेएक बात पूछी | मस्त कवि कहते है समय व परिणाम की चिंता नहीं करता और उसनिर्भीक व मस्त कवि ने भी बिना परिणाम की चिंता किये रानी को दो पंक्तियों का एक दोहे बोलकर उत्तर दिया -
माण रखै तो पीव तज, पीव रखै तज माण |
दो दो गयंद न बंधही , हेको खम्भु ठाण ||

अर्थात मान रखना है तो पति को त्याग दे और पतिरखना है तो मान को त्याग दे लेकिन दो-दोहाथियों का एक ही स्थान पर बाँधा जाना असंभव है |

अल्हड मस्त कवि के इस दोहे की दो पंक्तियों नेरानी उमादे की प्रसुप्त रोषाग्नि को वापसप्रज्वल्लित करने के लिए धृत का काम किया और कहा मुझे ऐसे पति की आवश्यकता नहीं | और रानी ने रथ को वापस जैसलमेर ले जानेका आदेश दे दिया |
बारहट जी (कवि आशानन्द जी) ने अपने मन मेंअपने कहे गए शब्दों पर विचार किया और बहुतपछताए भी लेकिन वे शब्द वापस कैसे लिए जा सकते थे |
आपने जोधपुर की रूठी रानी के बारे में पढ़तेहुए उसकी दासी भारमली का नाम भी पढ़ा होगा | जैसलमेर की राजकुमारी उमादे जो इतिहास में रूठी रानी के नाम से प्रसिद्ध है अपनी इसी रूपवती दासी भारमली के चलते ही अपने पति जोधपुर के शक्तिशाली शासकराव मालदेव से रूठ गई थी और मालदेव केलाख कोशिश करने के बाद भी वह आजीवन अपने पति से रूठी ही रही |

जोधपुर के राव मालदेव का विवाह जैसलमेर केरावल लूणकरणजी की राजकुमारी उमादे के साथहुआ था | सुहागरात्रि के समय उमादे को श्रृंगारकरते देर हो गई तो उसने अपनीदासी भारमली को कुछ देर के लिए मालदेव जी का जी बहलाने के लिए भेजा | भारमली इतनी सुन्दर थी कि उसके रूपलावण्य को देख नशे में धुत मालदेव जी अपने आप को न बचा सके |

श्रृंगार करने के बाद जब उमादे आई औरउसने मालदेव जी भारमली के साथ देखकर यह कहकरवापस चली गयी कि ये पति मेरे लायक नहींहै | और वो जीवन भर रूठी ही रही | राव मालदेव ने जोधपुर आने के बाद अपने एक कवि आशानन्द जी बारहट को रानीको मनाने भेजा पर वे भी रानी मनाने मेंअसमर्थ रहे | इस पर कवि आशानन्द जी बारहट ने जैसलमेरके रावत लूणकरणजीसे कहा कि अपनी पुत्री का भला चाहते हैतो दासी भारमली को जोधपुर से वापस बुलवालीजिए |

रावत लूणकरण जी ने एसा ही किया औरभारमली को उन्होंने जोधपुरसे जैसलमेर बुलवा भेजा पर स्वयम लूणकरण जी भारमली के रूप और लावण्य पर मुग्ध हो गए जिससे लूणकरण जी कीदोनों रानियाँ ने परेशान होकर भारमली कोजैसलमेर से हटाने की सोची |लूणकरण जी की पहली रानी सोढ़ी जी नेउमरकोट अपने भाइयों से भारमली को ले जाने केलिए कहा लेकिन उमरकोट के सोढों ने लूणकरणजी से इस बात पर शत्रुता लेना उचित नहीं समझा |तबलूणकरण जी की दूसरी रानी जो जोधपुर के मालानी परगनेके कोटडे के शासक बाघ जी राठौड़ की बहनथी ने अपने भाई बाघ जी को बुलाया |
बहन का दुःख मिटाने हेतु बाघजी शीघ्र आये और रानियों के कथनानुसारभारमली को ऊंट पर बैठकर जैसलमेर से छिपकरभाग आये | लूणकरण जी कोटडे पर हमला तो कर नहींसकते थे क्योंकि पहली बाततो ससुराल पर हमला करने में उनकी प्रतिष्ठा घटती और दूसरी बात राव मालदेव जैसा शक्तिशाली शासक मालानी कासंरक्षकथा | अत: रावत लूणकरण जी ने जोधपुर के ही कवि आशानन्द जी बारहट कोकोटडा भेजा कि बाघजी को समझाकर भारमलीको वापस ले आये |

दोनों रानियों ने बाघ जी को पहले हीसन्देश भेजकर सूचित कर दिया कि वे बारहट जी कीबातों में न आना | जब बारहट जी कोटडा पहुंचे तो बाघजी ने उनका बड़ास्वागत सत्कार किया और बारहट जी की इतनीखातिरदारी की कि वे अपने आने का उद्देश्य ही भल गए | एक दिन बाघजी शिकारपर गए ,बारहट जी व भारमली भी साथ थे | भारमली व बाघजी में असीम प्रेम हो गया था अत: वह भी किसी भी हालत मेंबाघजी को छोड़कर जैसलमेर नहीं जाना चाहतीथी | शिकार के बाद भारमली ने सूलें सेंक करखुद विश्राम स्थल पर बारहटजी दी व शराब आदि भी पिलाई | इससेखुश होकर व बाघजी व भारमली के बीच प्रेमदेखकर बारहट जी का भावुक-कवि- हृदय बोलउठा -
जंह गिरवर तंह मोरिया, जंह सरवर तंह हंस |
जंह बाघा तंह भारमली ,जंह दारुतंह मंस |

अर्थात जहाँ पहाड़ होते है वहां मोर होते है ,जहाँ सरवर होता है वहां हंस होते है इसी प्रकार जहाँ बाघ जी है वहीँ भारमलीहोगी ठीक उसी तरह जिस तरह जहाँ दारूहोती है वहां मांस भी होता है |

बारहट की यह बात सुन बाघजी ने झट से कह दिया ,बारहट जी आप बड़े है और बड़े आदमी दीहुई वास्तु को वापिस नहींलेते अत: अब भारमली को मुझसे न मांगना | आशानन्दजी बारहट पर वज्रपात साहो गया लेकिन बाघजी ने बात सँभालते हुए कहा - कि आपसे एक प्रार्थना और है आप भी मेरे यहीं रहिये |
और इस तरह से बाघजी ने कवि आशानन्द जीबारहट को मनाकर भारमली को जैसलमेर ले जाने सेरोक लिया | आशानन्द जी भी कोटडा रहे और उनकी व बाघजी जी की भी इतनीघनिष्ट दोस्ती हुई कि वे जिन्दगी भर बाघजीको भुला ना पाए | एक दिन अकस्मात बाघजी का निधन हो गया , भारमली बाघजी के शव के साथ चिता में बैठकर सतीहो गई और आशानन्द जी अपने मित्र बाघजीकी याद में जिन्दगी भर बैचेन रहे और उन्होंने बाघजी की स्मृति में अपने उदगारों के पीछोले बनाये |
बाघजी और कवि आशानंद जी के बीच इतनी घनिष्ट मित्रता हुई कि आशानन्द जी सोते उठतेबाघजी का नाम ही लेते थे एक बार उदयपुर केमहाराणा ने कवि आशानन्द जी की परीक्षा लेने के लिए कहा कि वे सिर्फ एक रात बाघजी का नाम लिए बिना निकालदे तो मैं आपको चार लाख रूपये दूंगा | कवि पुत्र ने भरपूर कोशिश की कि कवि पिता अपने मित्र बाघजी का नाम कम से कम एक रात्री तो न ले पर कवि मनकहाँ चुप रहने वाला था |





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