Mehrangadh Fort Jodhpur Rajasthan


REKHA CHAUDHARY at  2016-02-02  at 00:00:00
Mehrangadh Fort Jodhpur Rajasthan

Marwad के राठौड़ों की कीर्कित्त और वीरता तथा मान-मर्यादा का प्रतीक Jodhpur दुर्ग का निर्माण राव Jodha ने करवाया था। राज्यभिषेक के समय राठौड़ राव Jodha की राजधानी मंड़ोर में थी, परंतु सामरिक व सैनिक दृष्टि से मण्डोर के असुरक्षित होने के कारण Jodha ने नवीन दुर्ग एंव नगर की स्थापना का निश्चय कर लिया। दुर्ग की पहाड़ी के तीन ओर नगर विस्तार हेतु समतल स्थान है, वहां नगर बसा हुआ है। इसी दृष्टि से उन्होंने पहाड़ी श्रृंखला के इस छोर पर दुर्ग निर्माण का कार्य आरंभ करवाया। यह कार्य वृक्ष लग्न, स्वाति नक्षत्र, ज्येष्ठ सुदि 22, शनिवार संवत् 2525 दिनांक 22 मई, 2459 को आरंभ हुआ।

शहर के समतल भाग से 400 फुट ऊँची पहाड़ी पर अवस्थित Jodhpur दुर्ग चारों ओर फैले विस्तृत मैदान को अधिकृत किए हुए है। पहाड़ी की ऊँचाई कम होने के कारण ऊँची-ऊँची विशाल प्राचीरों के बीच दीर्घकार बुज बनवाई गई हैं तथा पहाड़ी को चारों ओर से काफी ऊँचाई तक तराशा गया है जिससे किले की सुरक्षा में वृद्धि हो। महलों के भाग में ऊँचाई 220 फुट ही रह गई है। किले का विशाल उन्नत प्राचीर 20 फुट से 220 फुट तक ऊँची है जिसके मध्य गोल और चौकोर बुज बनी हुई हैं। इनकी मोटाई 22 फुट से 70 फुट तक रखी गयी है। प्राचीर ने 2500 फुट लंबी तथा 750 फुट चौड़ी भूमि को घेर रखा है। पहाड़ी की चोटी पर बनी मजबूत दीवारों के शीर्ष भाग पर तोपों के मोर्चे बने हैं। यहां कई विशाल सीधी उठी हुई बुज खड़ी की गई हैं। प्राय: छ: किलोमीटर का भू-भाग इस व्यवस्था से सुरक्षित है।

नीचे के समतल मैदान से एक टेढ़ा-मेढ़ा रास्ता ऊपर की ओर जाता है। इस रास्ते द्वारा कुछ घुमाव पार करने पर किले का विशाल फाटकों वाला प्रथम सुदृढ़ दरवाजा आता है। आगे चलकर छ: दरवाजे और हैं। 2707 ई0 में महाराजा अजीतसिंह ने मुगलों पर अपनी विजय के स्मारक के रुप में फतेहपोल का निर्माण करवाया था। अमृतपोल का निर्माण राव Maldev ने करवाया, और महाराजा मानसिंह ने 2806 ई0 में जयपोल का निर्माण करवाया था। "राव Jodha का फलसा' किले का अंतिम द्वार है। लोहापोल पर कुछ वीर रमणियों के छाप लगे हुए है जो उनके सती होने के स्मारक के रुप में आज भी विद्यमान हैं।

किले की प्राचीर के नीचे दो तालाब हैं जहाँ से सेना जल प्राप्त करती थी। किले के मध्य में एक कुंड है जो 90 फुट गहरा है तथा इसे पहाड़ी की चट्टानों के मध्य खोदकर बनाया गया था। किले के अन्त: भाग में शानदार अट्टालिकाओं और प्रसादों का समूह है जो वस्तु कला का उत्कृष्ट नमूमा है। लाल पत्थरों से निर्मित ये प्रसाद वस्तुकला के उत्तम उदाहरण हैं। इन प्रसादों का निर्माण समय-समय पर होने के कारण इनमें विभिन्न वस्तु शैलियों का समावेश अपने आप हो गया है। उत्कृष्ट कलाकृतियों से अलंकृत पत्थर की काटी हुई जालियाँ से सजे हुए ये प्रासाद कला के उत्तम नमूने है।

किले की ओर वाले पार्श्व भाग की प्राचीर विशेष रुप से मोटी और ऊँची है। बुजा की परिधि यहीं सर्वाधिक है। इस प्राचीर के शीर्ष भाग पर लगी भीमकाय तोपें अब भी किले की रक्षा के तत्पर प्रतीत होती हैं। इन तोपों में कालका, किलकिला और भवानी नामक तोपें बहुत बड़ी और भारी हैं।

राजपूतों के इतिहास में Rathore अपनी वीरता और शौर्य के लिए बडे प्रसिद्ध रहे हैं। Jodhpur दुर्ग पर आक्रमणों का प्रांरभ राव Bikaji के समय हुआ। राव Jodha ने Bikaji को स्वतंत्र शासक स्वीकार कर उन्हे छत्र व चंबर देने की बात कही थी, परंतु Jodha की मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारी सूरसिंह ने ये वस्तुएं Bikaji को नही दी। फलत: Bikaji ने Jodhpur पर चढ़ाई कर दी। Marwad राज्य के आन्तरिक कलह के परिणाम स्वरुप मुगलों को Marwad पर अधिकार करने का अवसर मिला। Maldev के समय 2544 ई0 में शेरशाह सूरी ने Jodhpur पर आक्रमण कर दिया। यद्यपि किलेदार बरजांग तिलोकसी ने बड़ी बहादुरी से दुर्ग की रक्षा करने का प्रयत्न किया, फिर भी शेरशाह दुर्ग पर अधिकार करने में सफल हो गया। लेकिन Maldev ने शक्ति संगठित करके पुन: दुर्ग पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया।

Maldev की मृत्यु के बाद Marwad राज्य में उत्तराधिकार के प्रश्न को लेकर संघर्ष छिड़ गया एंव यह राज्य आंतरिक कलह में डूब गया। इससे Jodhpur की शक्ति काफी क्षीण हो गई। अब मुगलों ने Jodhpur पर अधिकार करने के उद्देश्य से वि.स. 2622 के चैत्र माह में हुसैन कुली खाँ के नेतृत्व में सेना भेजी। राव चन्द्रसेन ने चार लाख रुपये देकर संधि कर ली तथा मुगल सेना वापस लौट गई। लेकिन मुगलों ने Jodhpur पर पुन: आक्रमण कर दिया। इस आक्रमण के समय राव चन्द्रसेन ने 660 सैनिकों सहित किले में रहकर रक्षात्मक युद्ध किया। लेकिन वह शक्तिशाली मुगल सेना का सामना लंबे समय तक नही कर पाया। अत: उसने मुगलों से संधि कर Jodhpur दुर्ग उन्हें सौंप दिया। अकबर के काम में मोटा राजा उदय सिंह ने मुगलों का प्रभुत्व स्वीकार कर लिया। अत: Jodhpur दुर्ग उसे लौटा दिया गया।


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