Jalor Fort जालोर का दुर्ग राजस्थान


REKHA CHAUDHARY at  2016-02-02  at 00:00:00
Jalor Fort जालोर का दुर्ग राजस्थान

Jalore Durg

Jalore Durg Marwar का सुदृढ़ गढ़ है। इसे परमारों ने बनवाया था। यह Durg क्रमश: परमारों, चौहनों और राठौड़ों के आधीन रहा। यह Rajasthan में ही नही अपितु सारे देश में अपनी प्राचीनता, सुदृढ़ता और सोनगरा चौहानों के अतुल शौर्य के कारण प्रसिद्ध रहा है।

Jalore जिले का पूर्वी और दक्षिणी भाग पहाड़ी शृंखला से आवृत है। इस पहाड़ी श्रृंखला पर उस काल में सघन वनावली छायी हुई थी। Arawali की श्रृंखला जिले की पूर्वी सीमा के साथ-साथ चली गई है तथा इसकी सबसे ऊँची चोटी 3253 फुट ऊँची है। इसकी दूसरी शाखा Jalore के केन्द्र भाग में फैली है जो 2498 फुट ऊँची है। इस श्रृंखला का नाम सोनगिरि है। सोनगिरि पर्वत पर ही Jalore का विशाल Durg विद्यमान है। प्राचीन शिलालेखों में Jalore का नाम जाबालीपुर और किले का नाम सुवर्णगिरि मिलता है। सुवर्णगिरि शब्द का अपभ्रंशरुप सोनलगढ़ हो गया और इसी से यहां के चौहान सोनगरा कहलाए।

जहां Jalore Durg की स्थिति है उस स्थान पर सोनगिरि की ऊँचाई 2498 फुट है। यहां पहाड़ी के शीर्ष भाग पर 899 गज लम्बा और 499 गज चौड़ा समतल मैदान है। इस मैदान के चारों ओर विशाल बुजा और सुदृढ़ प्राचीरों से घेर कर Durg का निर्माण किया गया है। गोल बिन्दु के आकार में Durg की रचना है जिसके दोनों पार्श्व भागों में सीधी मोर्चा बन्दी युक्त पहाड़ी पंक्ति है। Durg में प्रवेश करने के लिए एक टेढ़ा-मेढ़ा रास्ता पहाड़ी पर जाता है। अनेक सुदीर्घ शिलाओं की परिक्रमा करता हुआ यह मार्ग किले के प्रथम द्वार तक पहुँचता है। किले का प्रथम द्वार बड़ा सुन्दर है। नीचे के अन्त: पाश्वा पर रक्षकों के निवास स्थल हैं। सामने की तोपों की मार से बचने के लिए एक विशाल प्राचीर धूमकर इस द्वार को सामने से ढक देती है। यह दीवार 25 फुट ऊँची एंव 15 फुट चौड़ी है। इस द्वार के एक ओर मोटा बुर्ज और दूसरी ओर प्राचीर का भाग है। यहां से दोनों ओर दीवारों से घिरा हुआ किले का मार्ग ऊपर की ओर बढ़ता है। ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते हैं नीचे की गहराई अधिक होती जाती है। इन प्राचीरों के पास मिट्टी के ऊँचे स्थल बने हुए हैं जिन पर रखी तोपों से आक्रमणकारियों पर मार की जाती थी। प्राचीरों की चौड़ाई यहां 15-29 फुट तक हो जाती है।

इस सुरक्षित मार्ग पर लगभग आधा मील चढ़ने के बाद किले का दूसरा दरवाजा दृष्टिगोचर होता है। इस दरवाजे का युद्धकला की दृष्टिकोण से विशेष महत्व है। दूसरे दरवाजे से आगे किले का तीसरा और मुख्य द्वार है। यह द्वार दूसरे द्वारों से विशालतर है। इसके दरवाजे भी अधिक मजबूत हैं। यहां से रास्ते के दोनों ओर साथ चलने वाली प्राचीर श्रंखला कई भागों में विभक्त होकर गोलाकार सुदीर्घ पर्वत प्रदेश को समेटती हुई फैल जाती है। तीसरे व चौथे द्वार के मध्य की भूमि बड़ी सुरक्षित है। प्राचीर की एक पंक्ति तो बांई ओर से ऊपर उठकर पहाड़ी के शीर्ष भाग को छू लेती है तथा दूसरी दाहिनी ओर घूमकर मैदानों पर छाई हुई चोटियों को समेटकर चक्राकार घूमकर प्रथम प्राचीर की पंक्ति से आ मिलती है। यहां स्थान-स्थान पर विशाल एंव विविध प्रकार के बुर्ज बनाए गए हैं। कुछ स्वतंत्र बुर्ज प्राचीर से अलग हैं। दोनों की ओर गहराई ऊपर से देखने पर भयावह लगती है।

Jalore Durg का निर्माण Parmar राजाओं ने 19वीं शताब्दी में करवाया था। पश्चिमी Rajasthan में परमारो की शक्ति उस समय चरम सीमा पर थी। धारावर्ष Parmar बड़ा शक्तिशाली था। उसके शिलालेखों से, जो Jalore से प्राप्त हुए हैं, अनुमान लगाया जाता है कि इस Durg का निर्माण उसी ने करवाया था।

वस्तुकला की दृष्टि से किले का निर्माण Hindu शैली से हुआ है। परंतु इसके विशाल प्रांगण में एक ओर मुसलमान संत मलिक Shah की मस्जिद है।

Jalore Durg में जल के अतुल भंड़ार हैं। सैनिकों के आवास बने हुए हैं। Durg के निर्माण की विशेषता के कारण तोपों की बाहर से की गई मार से किले के अन्त: भाग को जरा भी हानि नही पहुँची है। किले में इधर-उधर तोपें बिखरी पड़ी हैं। ये तोपों विगत संघर्षमय युगों की याद ताजा करतीं है।

12वीं शताब्दी तक Jalore Durg अपने निर्माता परमारों के अधिकार में रहा। 12वीं शताब्दी में Gujarat के सोलंकियों ने Jalore पर आक्रमण करके परमारों को कुचल दिया और परमारों ने सिद्धराज जयSingh का प्रभुत्व स्वीकार कर लिया। सिद्धराज की मृत्यु के बाद कीर्कित्तपाल चौहान ने Durg को घेर लिया। कई माह के कठोर प्रतिरोध के बाद कीर्कित्तपाल इस Durg पर अपना अधिकार करने में सफल रहा। कीर्कित्तपाल के पश्चात समर Singh और UdaySingh Jalore के शासक हुए। Uday Singh ने Jalore में 1295 ई9 से 1249 ई9 तक शासन किया।

गुलाम वंश के शासक इल्तुतमिश ने 1211 से 1216 के बीच Jalore पर आक्रमण किया। वह काफी लंबे समय तक Durg का घेरा डाले रहा। Uday Singh ने वीरता के साथ Durg की रक्षा की पंरतु अन्तोगत्वा उसे इल्तुतमिश के सामने हथियार डालने पड़े। इल्लतुतमिश के साथ जो मुस्लिम इतिहासकार इस घेरे में मौजूद थे, उन्होंने Durg के बारे में अपनी राय प्रकट करते हुए कहा है कि यह अत्यधिक सुदृढ़ Durg है, जिनके दरवाजों को खोलना आक्रमणकारियों के लिए असंभव सा है।

Jalore के किले की सैनिक उपयोगिता के कारण सोनगरा चौहान ने उसे अपने राज्य की राजधानी बना रखा था। इस Durg के कारण यहां के शासक अपने आपको बड़ा बलवान मानते थे। जब कान्हड़देव यहां का शासक था, तब 1395 ई9 में अलाउद्दीन खिलजी ने Jalore पर आक्रमण किया। अलाउद्दीन ने अपनी सेना गुल-ए-बहिश्त नामक दासी के नेतृत्व में भेजी थी। यह सेना कन्हड़देव का मुकाबला करने में असमर्थ रही और उसे पराजित होना पड़ा। इस पराजय से दुखी होकर अलाउद्दीन ने 1311 ई9 में एक विशाल सेना कमालुद्दीन के नेतृत्व में भेजी लेकिन यह सेना भी Durg पर अधिकार करने में असमर्थ रही। Durg में अथाह जल का भंड़ार एंव रसद आदि की पूर्ण व्यवस्था होने के कारण राजपूत सैनिक लंबे समय तक प्रतिरोध करने में सक्षम रहते थे। साथ ही इस Durg की मजबूत बनावट के कारण इसे भेदना दुश्कर कार्य था। दो बार की असफलता के बाद भी अलाउद्दीन ने Jalore Durg पर अधिकार का प्रयास जारी रखा तथा इसके चारों ओर घेरा डाल दिया। तात्कालीन श्रोतों से ज्ञात होता है कि जब राजपूत अपने प्राणों की बाजी लगा कर Durg की रक्षा कर रहे थे, विक्रम नामक एक धोखेबाज ने सुल्तान द्वारा दिए गए प्रलोभन में शत्रुओं को Durg में प्रवेश करने का गुप्त मार्ग बता दिया। जिससे शत्रु सेना Durg के भीतर प्रवेश कर गई। कन्हड़देव व उसके सैनिकों ने वीरता के साथ खिलजी की सेना का मुकाबला किया और कन्हड़देव इस संघर्ष में वीर गति को प्राप्त हुआ। कन्हड़देव की मृत्यु के पश्चात भी Jalore के चौहानों ने हिम्मत नही हारी और पुन: संगठित होकर कन्हड़देव के पुत्र वीरमदेव के नेतृत्व में संघर्ष जारी रखा परंतु मुठ्ठी भर राजपूत रसद की कमी हो जाने के कारण शत्रुओं को ज्यादा देर तक रोक नही सके। वीरमदेव ने पेट में कटार भोंककर मृत्यु का वरण किया। इस संपूर्ण घटना का उल्लेख अखेराज चौहान के एक आश्रित लेखक पदमनाथ ने "कन्हड़देव प्रबंध" नामक ग्रंथ में किया है।

Maharana कुंभा के काल (1433 ई9 से 1468 ई9) में Rajasthan में Jalore और Nagore मुस्लिम शासन के केन्द्र थे। 1559 ई9 में Marwar के Rathore शासक मालदेव ने आक्रमण कर Jalore Durg को अल्प समय के लिए अपने अधिकार में ले लिया। 1617 ई9 में Marwar के ही शासक गजSingh ने इस पर पुन: अधिकार कर लिया।

18वीं शताब्दी के अंतिम चरण में जब Marwar राज्य के राज Singhासन के प्रश्न को लेकर Maharaja जसवंत Singh एंव भीम Singh के मध्य संघर्ष चल रहा था तब Maharaja मानSingh वर्षों तक Jalore Durg में रहे।

इस प्रकार 19वीं शताब्दी में भी Jalore Durg Marwar राज्य का एक हिस्सा था। Marwar राज्य के इतिहास में Jalore Durg जहां एक तरफ अपने स्थापत्य के कारण विख्यात रहा है वहीं सामरिक व सैनिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण रहा है।


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